उत्तर प्रदेश में आउटसोर्सिंग निगम और ठेकेदारी व्यवस्था के खिलाफ विरोध तेज। कानपुर में जल संस्थान बेनाझाबर में हुई बैठक में कर्मचारियों ने स्थायी नियुक्ति और नौकरी सुरक्षा की मांग उठाई।

UP News: उत्तर प्रदेश में सरकारी विभागों में आउटसोर्सिंग व्यवस्था और ठेकेदारी प्रथा को लेकर कर्मचारियों के बीच असंतोष अब धीरे-धीरे संगठित विरोध का रूप लेता दिखाई दे रहा है। स्थायी रोजगार की जगह आउटसोर्सिंग के माध्यम से कर्मचारियों की तैनाती किए जाने के विरोध में कानपुर में एक महत्वपूर्ण बैठक हुई, जिसमें कर्मचारी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष तेज करने का संकल्प लिया। कानपुर के जल संस्थान बेनाझाबर स्थित कार्यालय में 13 सितंबर 2026 को आयोजित बैठक में वक्ताओं ने आरोप लगाया कि आउटसोर्सिंग व्यवस्था के विस्तार से कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा, भविष्य और सामाजिक सम्मान पर गंभीर असर पड़ रहा है। बैठक में यह सवाल भी उठाया गया कि यदि सरकारी विभागों में स्थायी पदों पर नियुक्तियों की जगह लगातार आउटसोर्सिंग के माध्यम से कर्मचारियों की तैनाती होती रही तो उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले युवाओं के सामने भी स्थायी रोजगार के अवसर लगातार कम होते जाएंगे।
बैठक में मौजूद लोगों ने आउटसोर्सिंग व्यवस्था को लेकर तीखा विरोध दर्ज कराया। वक्ताओं का कहना था कि सरकार की ओर से आउटसोर्सिंग सेवा निगम जैसी व्यवस्था खड़ी करने के बजाय सरकारी विभागों में रिक्त पदों पर स्थायी नियुक्तियों की व्यवस्था मजबूत की जानी चाहिए। बैठक में यह आरोप भी लगाया गया कि आउटसोर्सिंग के माध्यम से कर्मचारी वर्षों तक सेवाएं देने के बावजूद स्थायी कर्मचारी का दर्जा हासिल नहीं कर पाते। इससे उनके सामने नौकरी की सुरक्षा, वेतन, सामाजिक सुरक्षा और भविष्य की अनिश्चितता बनी रहती है।
वक्ताओं ने कहा कि ठेकेदारी प्रथा केवल कर्मचारियों का मुद्दा नहीं बल्कि पूरे समाज और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल है।
बैठक में युवाओं के भविष्य को लेकर भी गंभीर चिंता व्यक्त की गई। वक्ताओं ने कहा कि आज परिवार अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए वर्षों तक संघर्ष करते हैं। बच्चे उच्च शिक्षा हासिल करते हैं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, लेकिन यदि सरकारी रोजगार के क्षेत्र में स्थायी नियुक्तियों की जगह आउटसोर्सिंग का रास्ता ही प्रमुख होता गया तो शिक्षित युवाओं के सामने भी अस्थायी और असुरक्षित रोजगार ही बच सकता है।
बैठक में कहा गया कि ऐसी व्यवस्था को केवल कर्मचारी हित के नजरिए से नहीं बल्कि देश और समाज की अगली पीढ़ी के रोजगार के भविष्य से जोड़कर देखना होगा।
बैठक में ठेकेदारी प्रथा को लेकर भी तीखी टिप्पणी की गई। वक्ताओं ने कहा कि ठेकेदारी व्यवस्था के कारण कर्मचारी और श्रमिक वर्ग लंबे समय से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है। उनका कहना था कि जब कर्मचारी सीधे विभाग के अधीन काम करता है तो उसके अधिकारों और जवाबदेही का एक स्पष्ट ढांचा होता है, जबकि ठेकेदारी व्यवस्था में कर्मचारी और मूल नियोक्ता के बीच एक मध्यस्थ व्यवस्था खड़ी हो जाती है। कर्मचारी संगठनों की ओर से समय-समय पर समान कार्य के लिए समान वेतन, नौकरी की सुरक्षा, ईपीएफ-ईएसआई, नियमितीकरण और ठेकेदारी व्यवस्था समाप्त करने जैसी मांगें उठती रही हैं।
13 सितंबर की बैठक को इसी बढ़ते असंतोष की महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा है। बैठक में मौजूद लोगों ने एकमत होकर आउटसोर्सिंग व्यवस्था का विरोध करने और कर्मचारियों के अधिकारों की लड़ाई को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। बैठक में यह भावना प्रमुखता से सामने आई कि यदि अभी इस मुद्दे पर आवाज नहीं उठाई गई तो भविष्य में सरकारी रोजगार का स्वरूप ही बदल सकता है और स्थायी सरकारी रोजगार के अवसर और अधिक सीमित हो सकते हैं।
गौरतलब है कि कानपुर में इससे पहले भी आउटसोर्सिंग व्यवस्था को लेकर कर्मचारी संगठनों की बैठकों में सवाल उठते रहे हैं। मई 2026 में जल संस्थान बेनाझाबर में हुई एक बैठक में नगर निगम की सफाई व्यवस्था को निजी कंपनी को दिए जाने का विरोध किया गया था और आउटसोर्सिंग सेवा निगम के माध्यम से कर्मचारियों को सुविधाएं देने तथा उनके हितों की रक्षा की मांग उठाई गई थी। इससे साफ है कि कानपुर में आउटसोर्सिंग और ठेकेदारी का मुद्दा अब केवल एक विभाग तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि कर्मचारी संगठनों के बीच यह व्यापक बहस का विषय बनता जा रहा है।
आउटसोर्सिंग के खिलाफ कर्मचारियों की आवाज केवल कानपुर तक सीमित नहीं है। अगस्त 2026 में अमेठी में दैनिक वन कर्मियों ने आउटसोर्सिंग भर्ती के विरोध में प्रदर्शन किया था। कर्मचारियों ने वर्षों से विभाग में कार्यरत कर्मियों को भर्ती में प्राथमिकता और सेवा सुरक्षा की मांग उठाई। मुरादाबाद में भी आउटसोर्सिंग एवं संविदा कर्मचारियों ने नौकरी की सुरक्षा, समान वेतन, ठेकेदारी प्रथा समाप्त करने, सीधे भुगतान, ईपीएफ, ईएसआई और लंबे समय से कार्यरत कर्मचारियों को सेवा अवधि के आधार पर नियमितीकरण का लाभ देने जैसी मांगें उठाई थीं। यानी उत्तर प्रदेश में आउटसोर्सिंग व्यवस्था को लेकर कर्मचारियों की चिंताएं अलग-अलग विभागों में अलग-अलग रूप में सामने आ रही हैं। UP News:
कानपुर में आयोजित बैठक में शेखर भारतीय, देव कबीर, बृजमोहन दास, रामप्रसाद भारतीय, अजीत खोटे, राज नारायण बौद्ध, प्रदीप वाल्मीकि, अर्जुन वाल्मीकि, अमित कुमार, पंडित जितेन वाल्मीकि, सुरेश बक्शी, धर्मेंद्र रघुवंशी, धर्मेंद्र भारती, सुशील सागर, राजा वाल्मीकि सहित अन्य लोग मौजूद रहे।
बैठक की अध्यक्षता सुनील सुमन ने की, जबकि संचालन चमन खन्ना ने किया।
आउटसोर्सिंग व्यवस्था को लेकर कर्मचारी संगठनों की आपत्तियां लगातार सामने आने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार इस व्यवस्था को किस रूप में आगे बढ़ाती है।
क्या आउटसोर्सिंग के जरिए सरकारी विभागों में काम करने वाले कर्मचारियों को दीर्घकालिक नौकरी सुरक्षा मिलेगी? क्या समान कार्य के लिए समान वेतन और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था प्रभावी रूप से लागू होगी? क्या वर्षों से काम कर रहे आउटसोर्सिंग एवं संविदा कर्मचारियों के नियमितीकरण पर कोई ठोस नीति बनेगी? और सबसे बड़ा सवाल—क्या सरकारी विभागों में स्थायी नियुक्तियों के रास्ते फिर से पर्याप्त रूप से खोले जाएंगे? कानपुर की बैठक ने इन सवालों को एक बार फिर उत्तर प्रदेश की राजनीति, प्रशासन और कर्मचारी संगठनों के सामने ला खड़ा किया है।
13 सितंबर की बैठक में लिया गया विरोध का संकल्प यदि आगे प्रदेश के विभिन्न कर्मचारी संगठनों से जुड़ता है तो आने वाले समय में आउटसोर्सिंग निगम और ठेकेदारी व्यवस्था उत्तर प्रदेश में एक बड़ा कर्मचारी आंदोलन का मुद्दा बन सकता है। फिलहाल कानपुर से उठी आवाज का संदेश साफ है—सरकारी विभागों में काम करने वाले कर्मचारियों को केवल काम करने वाला हाथ नहीं, बल्कि अधिकारों और भविष्य वाला कर्मचारी माना जाए। कर्मचारी संगठनों की यह लड़ाई अब केवल नौकरी की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के भविष्य की लड़ाई के रूप में सामने आ रही है। UP News:
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