संभल हिंसा मामला : पुलिस अधिकारियों पर एफआईआर के आदेश को चुनौती देने की तैयारी
संभल के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार बिश्नोई ने बताया कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की जाएगी और आदेश को निरस्त कराने की मांग की जाएगी।

UP News : संभल में हुई हिंसा से जुड़े मामले में तत्कालीन क्षेत्राधिकारी अनुज चौधरी और तत्कालीन कोतवाली प्रभारी अनुज तोमर सहित 22 पुलिसकर्मियों के खिलाफ अब तक मुकदमा दर्ज नहीं हो सका है। अदालत के आदेश के बावजूद पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने के बजाय इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देने का निर्णय लिया है।
हाईकोर्ट में अपील दायर की जाएगी
संभल के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार बिश्नोई ने बताया कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की जाएगी और आदेश को निरस्त कराने की मांग की जाएगी। उनका कहना है कि हिंसा के दौरान पुलिस की ओर से गोली नहीं चलाई गई थी और जिस युवक के घायल होने की बात कही जा रही है, उसे लगी गोली पुलिस की नहीं है। पुलिस के अनुसार घायल युवक के पिता द्वारा लगाए गए आरोप तथ्यहीन हैं। एसपी ने यह भी स्पष्ट किया कि जिस समय घटना हुई, उस इलाके में तीन स्तर की सुरक्षा व्यवस्था तैनात थी। ऐसे में किसी ठेले का जामा मस्जिद क्षेत्र तक पहुंचना संभव नहीं था।
जिसको गोली लगी उसे ही आरोपी बना दिया
उधर, शिकायतकर्ता यामीन ने तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी और कोतवाली प्रभारी अनुज तोमर को नामजद करते हुए आरोप लगाया है कि हिंसा के दौरान पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें उनके बेटे आलम को तीन गोलियां लगीं। यामीन का कहना है कि उनका बेटा बिस्किट बेचने का काम करता है और घटना वाले दिन भी रोज की तरह सुबह ठेला लेकर निकला था। परिवार का आरोप है कि गोली लगने के बाद आलम का इलाज छिपकर कराया गया, जिससे उसकी जान बच सकी। बाद में पुलिस ने उसे ही मामले में आरोपी बना दिया। हालांकि जिला प्रशासन और पुलिस अधिकारियों ने इन सभी आरोपों को खारिज किया है।
पहले से दिव्यांग है घायल युवक
22 वर्षीय आलम की बहन रजिया ने बताया कि उसका भाई पहले से ही दिव्यांग है और तीन पहिया ठेले से बिस्किट बेचकर परिवार की मदद करता था। गोली लगने के बाद उसकी हालत बेहद कमजोर हो गई है। परिवार की आर्थिक स्थिति पहले ही खराब थी, अब इलाज के चलते कर्ज़ तक लेना पड़ा है। रजिया का आरोप है कि जब अधिकारियों से कोई सुनवाई नहीं हुई तो उनके पिता को न्याय के लिए अदालत का सहारा लेना पड़ा। उन्होंने कहा कि बीते एक साल से उनका परिवार मानसिक दबाव में है। पुलिस द्वारा बार-बार घर आकर डराने-धमकाने का आरोप भी लगाया गया है। भय के कारण परिवार के कुछ सदस्य घर छोड़कर चले गए हैं और पूरा परिवार दहशत में जीवन जी रहा है।
UP News : संभल में हुई हिंसा से जुड़े मामले में तत्कालीन क्षेत्राधिकारी अनुज चौधरी और तत्कालीन कोतवाली प्रभारी अनुज तोमर सहित 22 पुलिसकर्मियों के खिलाफ अब तक मुकदमा दर्ज नहीं हो सका है। अदालत के आदेश के बावजूद पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने के बजाय इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देने का निर्णय लिया है।
हाईकोर्ट में अपील दायर की जाएगी
संभल के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार बिश्नोई ने बताया कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की जाएगी और आदेश को निरस्त कराने की मांग की जाएगी। उनका कहना है कि हिंसा के दौरान पुलिस की ओर से गोली नहीं चलाई गई थी और जिस युवक के घायल होने की बात कही जा रही है, उसे लगी गोली पुलिस की नहीं है। पुलिस के अनुसार घायल युवक के पिता द्वारा लगाए गए आरोप तथ्यहीन हैं। एसपी ने यह भी स्पष्ट किया कि जिस समय घटना हुई, उस इलाके में तीन स्तर की सुरक्षा व्यवस्था तैनात थी। ऐसे में किसी ठेले का जामा मस्जिद क्षेत्र तक पहुंचना संभव नहीं था।
जिसको गोली लगी उसे ही आरोपी बना दिया
उधर, शिकायतकर्ता यामीन ने तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी और कोतवाली प्रभारी अनुज तोमर को नामजद करते हुए आरोप लगाया है कि हिंसा के दौरान पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें उनके बेटे आलम को तीन गोलियां लगीं। यामीन का कहना है कि उनका बेटा बिस्किट बेचने का काम करता है और घटना वाले दिन भी रोज की तरह सुबह ठेला लेकर निकला था। परिवार का आरोप है कि गोली लगने के बाद आलम का इलाज छिपकर कराया गया, जिससे उसकी जान बच सकी। बाद में पुलिस ने उसे ही मामले में आरोपी बना दिया। हालांकि जिला प्रशासन और पुलिस अधिकारियों ने इन सभी आरोपों को खारिज किया है।
पहले से दिव्यांग है घायल युवक
22 वर्षीय आलम की बहन रजिया ने बताया कि उसका भाई पहले से ही दिव्यांग है और तीन पहिया ठेले से बिस्किट बेचकर परिवार की मदद करता था। गोली लगने के बाद उसकी हालत बेहद कमजोर हो गई है। परिवार की आर्थिक स्थिति पहले ही खराब थी, अब इलाज के चलते कर्ज़ तक लेना पड़ा है। रजिया का आरोप है कि जब अधिकारियों से कोई सुनवाई नहीं हुई तो उनके पिता को न्याय के लिए अदालत का सहारा लेना पड़ा। उन्होंने कहा कि बीते एक साल से उनका परिवार मानसिक दबाव में है। पुलिस द्वारा बार-बार घर आकर डराने-धमकाने का आरोप भी लगाया गया है। भय के कारण परिवार के कुछ सदस्य घर छोड़कर चले गए हैं और पूरा परिवार दहशत में जीवन जी रहा है।

















