अखिलेश ने न सिर्फ बसपा के साथ संबंधों में मजबूती और गहराई की बात कही, बल्कि मायावती के कभी बेहद भरोसेमंद रहे नसीरुद्दीन सिद्दीकी को सपा में शामिल कराकर यूपी की सियासत में नई चर्चा छेड़ दी।

UP News : उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर नए मोड़ पर खड़ी दिख रही है। होली के शुभ पर्व से पहले राजधानी लखनऊ के राजनीतिक गलियारों में नई दोस्ती की चर्चाएं तेज हो गई है। दरअसल, राजधानी लखनऊ में समाजवादी पार्टी के मंच से अखिलेश यादव के ताजा संकेतों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सपा और बसपा के बीच रिश्तों की बर्फ पिघल रही है? अखिलेश ने न सिर्फ बसपा के साथ संबंधों में मजबूती और गहराई की बात कही, बल्कि मायावती के कभी बेहद भरोसेमंद रहे नसीरुद्दीन सिद्दीकी को सपा में शामिल कराकर यूपी की सियासत में नई चर्चा छेड़ दी।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आयोजित ‘PDA प्रेम प्रसार समारोह’ में अखिलेश यादव पूरे कॉन्फिडेंस में नजर आए। पार्टी दावा कर रही है कि कार्यक्रम में करीब 15 हजार से ज्यादा लोग अलग-अलग दलों को छोड़कर सपा के साथ जुड़े। जनसभा को संबोधित करते हुए अखिलेश ने कहा कि सपा–बसपा के रिश्ते लगातार मजबूत हो रहे हैं और आने वाले वक्त में यह मजबूती और बढ़ेगी। उत्तर प्रदेश के राजनीतिक माहौल में यह बयान सिर्फ एक लाइन नहीं, बल्कि आने वाले चुनावी मौसम की दिशा बताने वाला संकेत माना जा रहा है। अखिलेश ने PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) को उत्तर प्रदेश की प्रगति और सामाजिक न्याय की धुरी बताते हुए जोर दिया कि सामाजिक एकता ही सकारात्मक राजनीति की असली ताकत है। दिलचस्प यह है कि अखिलेश अब PDA को केवल वोटों की जोड़-घटाव की भाषा में नहीं, बल्कि एक लंबे सामाजिक अभियान की तरह पेश कर रहे हैं। कार्यक्रम की सबसे बड़ी सियासी सुर्खी बनी पूर्व मंत्री नसीरुद्दीन सिद्दीकी की सपा में एंट्री। बसपा के पुराने और प्रभावशाली चेहरों में गिने जाने वाले सिद्दीकी कभी मायावती के करीबी माने जाते थे और बसपा शासन में कई बार मंत्री रहे। 2017 के बाद बसपा से बाहर होने के बाद अब उनका सपा में आना उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में नई हलचल के तौर पर देखा जा रहा है।
उत्तर प्रदेश में सपा–बसपा का रिश्ता कभी भी सीधी रेखा नहीं रहा। 1993 में दोनों दल साथ आए और भाजपा के उभार को रोकने की कोशिश हुई, लेकिन 1995 के चर्चित गेस्ट हाउस प्रकरण ने भरोसे की ऐसी दीवार खड़ी कर दी कि लंबे समय तक दोनों एक-दूसरे के सबसे बड़े विरोधी बने रहे। 2019 में लोकसभा चुनाव में “फिर साथ” का प्रयोग जरूर हुआ, मगर नतीजे उम्मीदों के मुताबिक नहीं आए तो गठबंधन भी बिखर गया। अब अखिलेश यादव के ताजा संकेतों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में वही पुराना सवाल फिर जिंदा कर दिया है—क्या 2027 से पहले पुरानी कड़वाहट पिघलेगी या यह सिर्फ रणनीति का संकेत भर है? अतीत की बात करें तो उत्तर प्रदेश में सपा पर यादव वर्चस्व के आरोप लगते रहे, जिसका असर दलित वोटरों पर भी पड़ा। लेकिन अब अखिलेश की राजनीति में दलित-आधार को लेकर नई सक्रियता दिख रही है। PDA की लगातार चर्चा और दलित चेहरों को आगे लाने की कोशिश को सपा की री-ब्रांडिंग रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। UP News