SIR के ताज़ा आंकड़े साफ इशारा कर रहे हैं कि उत्तर प्रदेश की शहरी सियासत में कोई बड़ा बदलाव चुपचाप पक रहा है। लखनऊ, वाराणसी, गाजियाबाद, नोएडा, आगरा, मेरठ, कानपुर जैसे बड़े शहरी केंद्रों के साथ–साथ यूपी के दर्जनों टियर–2 शहरों में SIR फॉर्म जमा कराने की रफ्तार उम्मीद के मुकाबले काफी ढीली रही।

UP News : उत्तर प्रदेश में चल रही मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया ने भारतीय जनता पार्टी के लिए अप्रत्याशित चुनौती खड़ी कर दी है। आमतौर पर शहरी वोट बैंक पर मज़बूत पकड़ रखने वाली बीजेपी इस बार उसी जमीन पर फिसलती नजर आ रही है। वजह है– शहरों में रहने वाले लाखों मतदाताओं का अपने वोट को उत्तर प्रदेश के पुश्तैनी गांवों में शिफ्ट करना और बड़ी तादाद में SIR फॉर्म का अब तक वापस न आना। सूत्रों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में लगभग 2.45 करोड़ मतदाता अब तक अपना SIR फॉर्म जमा नहीं कर पाए हैं, जिसके चलते लखनऊ, प्रयागराज, गाजियाबाद जैसे बड़े शहरों से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल के कई शहरी इलाकों तक वोट कटने का खतरा साफ दिख रहा है। बीजेपी के रणनीतिकारों के सामने यह भरोसा बनाए रखना कठिन हो रहा है कि उत्तर प्रदेश के शहरों में उसका जो ‘सुरक्षित गढ़’ था, वह आने वाले चुनावों में भी उतना ही अडिग रहेगा।
SIR प्रक्रिया के तहत निर्वाचन आयोग ने साफ नियम बना दिया है कि अब कोई भी मतदाता दो नाव पर सवारी नहीं कर सकेगा – वोटर लिस्ट में नाम सिर्फ एक ही पते पर रहेगा। यानी पहले की तरह शहर और पुश्तैनी गांव, दोनों जगह वोटर बने रहने की पुरानी सुविधा अब इतिहास बन चुकी है। जैसे ही यह प्रावधान लागू हुआ, उत्तर प्रदेश के शहरों में डुप्लीकेट वोटरों की बड़े पैमाने पर छंटनी शुरू हो गई और लोगों के सामने यह सीधा सवाल खड़ा हो गया कि उनका ‘असल घर’ कौन–सा है – महानगर की बहुमंज़िला कॉलोनी या यूपी के गांव की खपरैल वाली बस्ती? यहीं से उत्तर प्रदेश का पूरा चुनावी गणित अप्रत्याशित मोड़ लेता दिखा। उम्मीद के विपरीत, भारी संख्या में मतदाताओं ने शहर की चमक–दमक की बजाय अपने गांव को ही स्थायी पता मानते हुए वहीं की वोटर लिस्ट में नाम बचाए रखना चुना। वजहें भी साफ हैं गांव में पुश्तैनी जमीन–जायदाद और पीढ़ियों से जुड़ी सामाजिक पहचान, पंचायत चुनावों में हर घर की सीधी हिस्सेदारी, कल को जमीन–मकान के किसी विवाद में आधिकारिक रिकॉर्ड के तौर पर गांव की वोटर लिस्ट का महत्व, और दूसरी तरफ शहरों में किराए के घर, ट्रांसफरेबल नौकरी या अस्थायी पढ़ाई–लिखाई वाली ज़िंदगी, जिसमें स्थायित्व की मिट्टी ही कहीं खो जाती है। यही कारण है कि लखनऊ, प्रयागराज, गाजियाबाद जैसे बड़े शहरी केंद्रों में काम, व्यापार या नौकरी के लिए बसे हजारों–लाखों लोग SIR फॉर्म भरने से जानबूझकर कतराते रहे, ताकि गांव वाली सूची से उनका नाम न कटे। नतीजा यह निकला कि उत्तर प्रदेश के गांवों की मतदाता सूची पहले से ज्यादा मजबूत और घनी होती चली गई, जबकि शहरों की वोटर संख्या में लगातार गिरावट दर्ज होने लगी। यूपी का वोटर मानो यह संदेश दे रहा हो कि रोजगार भले शहर का हो, लेकिन जड़ें अब भी गांव की मिट्टी में ही गड़ी हैं।
SIR के ताज़ा आंकड़े साफ इशारा कर रहे हैं कि उत्तर प्रदेश की शहरी सियासत में कोई बड़ा बदलाव चुपचाप पक रहा है। लखनऊ, वाराणसी, गाजियाबाद, नोएडा, आगरा, मेरठ, कानपुर जैसे बड़े शहरी केंद्रों के साथ–साथ यूपी के दर्जनों टियर–2 शहरों में SIR फॉर्म जमा कराने की रफ्तार उम्मीद के मुकाबले काफी ढीली रही। सूत्रों के मुताबिक अनुमान है कि अकेले लखनऊ में करीब 2.2 लाख, प्रयागराज में लगभग 2.4 लाख, गाजियाबाद में करीब 1.6 लाख और सहारनपुर में लगभग 1.4 लाख वोट कटने की आशंका है। यह वही शहरी पट्टी है, जहां बीते चुनावों में बीजेपी को उत्तर प्रदेश का सबसे ठोस और भरोसेमंद समर्थन मिलता रहा है। ऐसे में लाखों शहरी वोटों की संभावित कटौती सिर्फ तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि सीधे–सीधे बीजेपी के पूरे चुनावी गणित और यूपी की शहरी रणनीति पर बड़ा सवालचिह्न लगाती दिख रही है।
भारतीय जनता पार्टी के लिए उत्तर प्रदेश के शहर महज़ नक्शे पर बने डॉट नहीं हैं, बल्कि उसकी हर बड़ी जीत की असली धुरी रहे हैं। पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में यूपी के शहरी इलाकों से मिली रिकॉर्ड वोटिंग और लाखों के मार्जिन वाली बढ़त ने बीजेपी को सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ने में सबसे ज़्यादा ताकत दी। लेकिन SIR प्रक्रिया ने पहली बार इसी मजबूत किले की बुनियाद पर सवाल खड़ा कर दिया है।
अब हालात ऐसे हैं कि SIR के बाद बीजेपी के सामने एक साथ तीन बड़ी दुविधाएँ खड़ी हो गई हैं –
नौकरीपेशा, व्यापारी, मध्यम वर्ग और युवा – यह पूरा तबका अब तक बीजेपी का भरोसेमंद कोर वोटर माना जाता रहा है, खासकर उत्तर प्रदेश के बड़े शहरों में। लेकिन अगर किसी एक शहर से ही 2–3 लाख मतदाता वोटर लिस्ट से बाहर हो जाएँ या अपना नाम गाँव की सूची में ट्रांसफर कर दें, तो सीधे–सीधे सीट के जीत–हार का मार्जिन हिल सकता है। यूपी की शहरी सीटों पर जहाँ बीजेपी अब तक आराम से आगे रहती थी, वहीं अब हर कटते हुए नाम के साथ समीकरण टाइट होता नज़र आ रहा है।
उत्तर प्रदेश के गांव, शहरों की तरह सिर्फ विकास और ब्रांड इमेज पर वोट नहीं करते। यहाँ जातीय संतुलन, स्थानीय चेहरे, पंचायत की राजनीति और पुराने सामाजिक रिश्ते ज़्यादा असर दिखाते हैं। ऐसे में यह मान लेना आसान नहीं कि जो वोटर नोएडा, गाजियाबाद, लखनऊ या कानपुर में बीजेपी का पक्का समर्थक रहा है, वह अपने पुश्तैनी गांव की कुर्सी पर बैठकर भी उतनी ही मजबूती से बीजेपी के पक्ष में बटन दबाएगा। पश्चिमी यूपी से लेकर पूर्वांचल तक, गांवों का राजनीतिक मानस शहरी यूपी से कहीं ज़्यादा उलझा हुआ और बहुआयामी है – यहीं पर पार्टी के लिए सबसे बड़ा अनिश्चितता वाला ज़ोन बन रहा है।
जैसे ही SIR फॉर्म की रफ्तार कई शहरों में सुस्त पड़ने लगी, बीजेपी के प्रदेश संगठन से लेकर सत्ता के गलियारों तक अलर्ट मोड ऑन हो गया। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष, संगठन महामंत्री – सबने मिलकर MPs और विधायकों को साफ संदेश दिया है कि किसी भी शहरी विधानसभा में एक भी पात्र वोटर सूची से मिस नहीं होना चाहिए। नतीजा यह हुआ कि बूथ स्तर पर मॉनिटरिंग, डेली मीटिंग, रिव्यू और फॉलो–अप अब यूपी बीजेपी की रोज़मर्रा की राजनीति का हिस्सा बन चुके हैं।
उत्तर प्रदेश में निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े जानकारों का साफ कहना है कि पिछले 20–25 साल में मतदाता सूची की इतनी गहरी और चौतरफा “स्क्रीनिंग” पहले कभी नहीं देखी गई। इस बार SIR के बहाने यूपी की वोटर लिस्ट को लगभग एक्स–रे मशीन की तरह खंगाला जा रहा है, जहाँ एक ही समय पर नाम काटने, संशोधन करने और डुप्लीकेट एंट्री साफ करने की प्रक्रिया साथ–साथ चल रही है।
इसके पीछे तीन बड़ी वजहें साफ दिखती हैं –
1. बड़े पैमाने पर पलायन का असर
आईटी, शिक्षा, निजी नौकरी, फैक्टरी–उद्योग और सर्विस सेक्टर की वजह से लाखों लोग यूपी के एक शहर से दूसरे शहर या फिर राज्य के बाहर बस गए, लेकिन मतदाता सूची में उनका “पुराना पता” जस का तस बना रहा। अब SIR के दौरान पहली बार यह mismatch बड़े पैमाने पर पकड़ में आ रहा है।
2. मृत मतदाताओं के नामों की सफाई
पिछले दो दशकों में स्वाभाविक रूप से बड़ी संख्या में मतदाता अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन वोटर लिस्ट में उनके नाम आज भी दर्ज थे। इस बार उत्तर प्रदेश में SIR के ज़रिए ऐसे मृत मतदाताओं के नाम व्यवस्थित तरीके से हटाए जा रहे हैं, ताकि सूची जमीन की हकीकत से मेल खा सके।
3. फर्जी और डुप्लीकेट वोटरों पर सर्जिकल स्ट्राइक
पहली बार यूपी में इतने व्यापक स्तर पर उन नामों की तलाश हो रही है, जो दो जगह दर्ज हैं या संदिग्ध दस्तावेज़ों के आधार पर जोड़े गए थे। इन्हीं की पहचान और सफाई ने इस पुनरीक्षण को सिर्फ रूटीन काम नहीं, बल्कि एक बड़े चुनावी शुद्धिकरण अभियान में बदल दिया है। इसी पूरी कवायद के बीच जो सबसे नया और चौंकाने वाला ट्रेंड उभरकर सामने आया है, वह यह कि उत्तर प्रदेश का शहरी मतदाता खुद अपने वोट को वापस गांव की ओर मोड़ रहा है। यही बदलाव बीजेपी के लिए सबसे असहज करने वाला है, क्योंकि यह मामला अब महज़ तकनीकी संशोधन का नहीं, बल्कि यूपी की सामाजिक सोच और राजनीतिक दिशा में बदलते संकेतों का भी आईना बनता जा रहा है।
इतनी बड़ी संख्या में SIR फॉर्म जमा न होने के बाद निर्वाचन आयोग भी सतर्क हो गया है। संकेत मिल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में SIR फॉर्म जमा करने की अंतिम तारीख को एक सप्ताह तक बढ़ाया जा सकता है, ताकि जो मतदाता किसी वजह से फॉर्म नहीं भर पाए, उन्हें आखिरी मौका मिल सके। आयोग भी समझ रहा है कि लगभग 2.45 करोड़ लोगों के नाम अचानक मतदाता सूची से हटना उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद खड़ा कर सकता है। UP News