उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में अगर ऐसी सलामी “आस्था” के नाम पर बांटी जाने लगे, तो यह वही खतरनाक प्रवृत्ति है जिसमें धीरे-धीरे संविधान को पीछे और धर्म को कानून से ऊपर बैठाने की कोशिश नजर आती है।

UP News : उत्तर प्रदेश में एक कथावाचक को पुलिस द्वारा गार्ड ऑफ ऑनर (परेड व सलामी) दिए जाने की घटना अब सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन चुकी है। उत्तर प्रदेश के नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद ने इसे लेकर ‘एक्स’ पर तीखी प्रतिक्रिया दी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ-साथ उत्तर प्रदेश पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाए। चंद्रशेखर ने पोस्ट में साफ कहा कि भारत कोई मठ नहीं, बल्कि संवैधानिक गणराज्य है और उत्तर प्रदेश जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्य तंत्र किसी धर्म-विशेष का प्रतीक बनकर नहीं चल सकता। उनके मुताबिक, कथावाचक पुंडरीक गोस्वामी को सलामी देना महज़ “प्रोटोकॉल” का मामला नहीं, बल्कि संविधान की भावना और सरकारी संस्थाओं की तटस्थता पर सीधा असर डालने वाला कदम है।
सांसद चंद्रशेखर आजाद ने लिखा कि गार्ड ऑफ ऑनर और परेड कोई साधारण औपचारिकता नहीं, बल्कि राज्य की संप्रभु शक्ति और अनुशासन का प्रतीक है। यह सम्मान संविधान, राष्ट्र और शहीदों के प्रति कृतज्ञता का संदेश देता है किसी कथावाचक, बाबा या धर्मगुरु की प्रतिष्ठा बढ़ाने का मंच नहीं। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में अगर ऐसी सलामी “आस्था” के नाम पर बांटी जाने लगे, तो यह वही खतरनाक प्रवृत्ति है जिसमें धीरे-धीरे संविधान को पीछे और धर्म को कानून से ऊपर बैठाने की कोशिश नजर आती है।
चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि यह प्रकरण इशारा करता है कि उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक तंत्र अपनी संवैधानिक जवाबदेही से ज्यादा “धार्मिक प्रभाव” के आगे झुकता दिखाई दे रहा है। उन्होंने इसे एक “खतरनाक परंपरा” की शुरुआत बताते हुए चेताया कि ऐसे कदम राज्य के संवैधानिक चरित्र और संस्थागत तटस्थता को कमजोर करते हैं। सांसद ने पोस्ट में कई तीखे सवाल भी उठाए पुंडरीक गोस्वामी आखिर हैं कौन, वे कौन-सा संवैधानिक पद संभालते हैं, किस नियम या प्रोटोकॉल के तहत उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया, और क्या उत्तर प्रदेश में अब धार्मिक पहचान ही नया सरकारी प्रोटोकॉल तय करने लगी है?
चंद्रशेखर आज़ाद ने मुख्यमंत्री को टैग करते हुए अपनी पोस्ट में संविधान के हवाले से सीधे सवाल खड़े किए। उन्होंने लिखा कि भारत की प्रस्तावना देश को एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य घोषित करती है किसी एक धर्म या धार्मिक पहचान का “सेवक” नहीं। सांसद के मुताबिक, अनुच्छेद 15 की भावना यह कहती है कि धर्म के आधार पर विशेषाधिकार देना संविधान के विरुद्ध है। वहीं अनुच्छेद 25 से 28 तक राज्य और धर्म के बीच आवश्यक दूरी की बात करते हैं यानी उत्तर प्रदेश में शासन-प्रशासन का काम “आस्था की चरणवंदना” नहीं, बल्कि कानून के दायरे में रहकर निष्पक्षता बनाए रखना है।
इस घटनाक्रम के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया विवाद तेज़ी से आकार लेता दिख रहा है। विपक्ष इसे संविधान, धर्मनिरपेक्षता और प्रशासनिक मर्यादा का सवाल बताकर सरकार पर हमलावर है। वहीं सरकार और पुलिस प्रशासन के सामने भी दबाव बढ़ेगा कि गार्ड ऑफ ऑनर जैसी औपचारिकताओं को लेकर कौन-से नियम लागू होते हैं, किस स्तर पर अनुमति मिलती है और जवाबदेही किसकी तय होती है । UP News