Mathura News: करीब आठ वर्षों तक कानूनी अड़चनों में फंसी रहने के बाद हाईकोर्ट की अनुमति मिलने पर शुरू हुआ निर्माण कार्य अब तेजी से आगे बढ़ रहा है लेकिन इसके साथ पर्यावरण और यमुना संरक्षण को लेकर बहस भी तेज हो गई है।

ठाकुर बांके बिहारी की नगरी वृंदावन में यमुना तट के केशीघाट समेत आठ ऐतिहासिक घाटों को भव्य स्वरूप देने के लिए 177 करोड़ रुपये की लागत से प्रस्तावित रिवर फ्रंट परियोजना एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। करीब आठ वर्षों तक कानूनी अड़चनों में फंसी रहने के बाद हाईकोर्ट की अनुमति मिलने पर शुरू हुआ निर्माण कार्य अब तेजी से आगे बढ़ रहा है लेकिन इसके साथ पर्यावरण और यमुना संरक्षण को लेकर बहस भी तेज हो गई है।
सिंचाई विभाग के निर्देशन में यूपीपीसीएल द्वारा पिछले छह माह से लगातार निर्माण कराया जा रहा है। वर्तमान में घाटों की सीढ़ियों के आगे लेंटर का बेस तैयार कर प्लेटफॉर्म बनाया जा रहा है जिससे यमुना तट को नया स्वरूप देने की तैयारी है। 2016 में याचिका, रुक गया था पूरा प्रोजेक्ट रिवर फ्रंट की योजना वर्ष 2014 में तैयार हुई थी। शुरुआती चरण में कटान रोकने और बाढ़ के पानी का दबाव कम करने के लिए सीमेंट की सुरक्षा दीवार बनाई गई थी। इसी दौरान अंडरग्राउंड सीवर लाइन और इंटरसेप्टर पाइप डालने का कार्य भी शुरू हुआ लेकिन वर्ष 2016 में सामाजिक कार्यकर्ता महंत मधु मंगल शरण दास शुक्ल ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सवाल उठाया कि जब तक वृंदावन के गंदे नालों का प्रदूषित पानी यमुना में गिरना बंद नहीं होगा, तब तक रिवर फ्रंट का क्या औचित्य है? याचिका के बाद हाईकोर्ट ने परियोजना पर रोक लगा दी थी। पहले नाले टेप, फिर मिली हाईकोर्ट से हरी झंडी बाद में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के निर्देश पर जल निगम ने नालों की टैपिंग का कार्य शुरू किया। मथुरा-वृंदावन के 23 नालों में से 19 नालों की टैपिंग पूरी हो चुकी है जबकि एक नाले का कार्य पूर्ण और एक का आंशिक कार्य अभी जारी है।
सिंचाई विभाग ने हाईकोर्ट में शपथपत्र देकर भरोसा दिलाया कि रिवर फ्रंट निर्माण पूरा होने से पहले शेष नालों की टैपिंग भी कर दी जाएगी। इसके बाद हाईकोर्ट ने परियोजना पर लगा स्टे हटाकर निर्माण कार्य को मंजूरी दे दी। यमुना किनारे करोड़ों रुपये खर्च कर रिवर फ्रंट बन रहा है लेकिन सवाल अब भी वही है, क्या बिना 100 प्रतिशत नाला टैपिंग के यमुना वास्तव में प्रदूषण मुक्त हो पाएगी? क्या यह परियोजना केवल सौंदर्यीकरण तक सीमित रहेगी या यमुना को भी स्वच्छ बनाने में मील का पत्थर साबित होगी? वृंदावन की आस्था, यमुना का अस्तित्व और 177 करोड़ की यह महत्वाकांक्षी परियोजना अब प्रशासन की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुकी है। जनता की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि विकास के साथ-साथ यमुना संरक्षण के वादे जमीन पर कितने पूरे होते हैं।
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