
कथावाचकों पर दर्ज FIR को लेकर भी शंकराचार्य ने प्रशासन पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई पहले दिन ही हो जानी चाहिए थी। दोनों को तुरंत हिरासत में लिया जाना चाहिए था, पर उन्हें जाने दिया गया। अब जब जनता में आक्रोश है, तब मामला दर्ज किया गया। उन्होंने कथावाचकों द्वारा आधार कार्ड और नाम को लेकर की गई कथित गड़बड़ी पर भी चिंता जताई। गांव के लोग कह रहे हैं कि गलत पहचान बताकर कथा सुनाई गई। आखिर दो-दो आधार कार्ड की सच्चाई क्या है? शंकराचार्य ने यह भी कहा कि कथावाचक 'पंडित' उपनाम से आए थे, लेकिन उच्चारण में त्रुटियों से उनकी जाति पर संदेह हुआ, जिसके बाद असली पहचान सामने आई।
शंकराचार्य ने स्पष्ट शब्दों में कहा, यदि कथावाचकों ने गलत जानकारी दी, तो वह निंदनीय है। लेकिन गाँववालों द्वारा की गई मारपीट भी किसी तरह से जायज़ नहीं ठहराई जा सकती। दोनों पक्षों से चूक हुई है और दोनों क्षम्य हैं — बशर्ते सुधार की भावना हो। उन्होंने कहा कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देकर जातीय ध्रुवीकरण का हथियार बनाया जा रहा है।
बिना किसी का नाम लिए शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने तीखा प्रहार करते हुए कहा कि कुछ राजनीतिक चेहरे केवल अपने हित साधने के लिए सामाजिक तनाव को हवा दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि दोनों वर्गों को आमने-सामने खड़ा कर, संघर्ष का मंच बनाना और फिर उससे राजनीतिक लाभ उठाना अपने आप में एक गहन नैतिक अपराध है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि कोई व्यक्ति या समूह इस घटना को बहाना बनाकर समाज में अशांति, जातीय घृणा या हिंसा फैलाने की कोशिश कर रहा है, तो ऐसे तत्वों पर भी कानून की कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।
जब उनसे पूछा गया कि क्या किसी भी जाति का व्यक्ति कथावाचक बन सकता है, तो शंकराचार्य ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने कहा - कुछ परंपराएं विशिष्ट जातियों को ही यह अधिकार देती हैं, जबकि कुछ आधुनिक दृष्टिकोण सभी के लिए खुलापन चाहते हैं। दोनों पक्षों के विचारों का सम्मान होना चाहिए और वर्तमान समाज को सामंजस्य की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। इटावा की घटना के बाद कथावाचकों को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किए जाने की तस्वीरों पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा - हमने पहली बार ऐसा दृश्य देखा कि कोई व्यक्ति मार खाकर लौट रहा है और मंच पर सम्मानित हो रहा है। संवेदना और न्याय की मांग तो समझ में आती है, लेकिन यह अभिनंदन क्या संदेश दे रहा है?
उन्होंने कहा कि एक पक्ष यदि अपमान का आरोप लगा रहा है, तो दूसरा पक्ष धोखे की शिकायत कर रहा है। "अगर दोनों के आरोप गंभीर हैं, तो फिर कानून दोनों पर समान रूप से लागू होना चाहिए। किसी भी पक्ष को छूट देना सामाजिक और कानूनी न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। UP News