
उत्तर प्रदेश की सियासत में आजम खान का नाम हमेशा ही प्रभावशाली माना जाता रहा है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक समय था जब आजम खान की बात बिना सुने कोई कदम नहीं उठाया जाता था। समाजवादी पार्टी में उनकी मर्जी के बिना कोई भी फैसला नहीं होता था और मुलायम सिंह यादव की नजर में वह पार्टी के सबसे भरोसेमंद नेता माने जाते थे। लेकिन अब यह तस्वीर बदल चुकी है। लेकिन मंगलवार को 23 महीने की जेल की सजा पूरी कर सीतापुर जेल से रिहा होने के बाद आजम खान बाहर आए, लेकिन उनके स्वागत के लिए न तो सपा के बड़े नेता दिखे और न ही यादव परिवार का कोई सदस्य। इस दौरान उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी प्रमुख अखिलेश यादव लखनऊ में एक शोरूम के उद्घाटन में व्यस्त थे। 88 किलोमीटर की दूरी के बावजूद इस खामोशी ने सवाल खड़े कर दिए कि क्या आजम खान को लेकर सपा की राजनीति बदल गई है? आजम की चुप्पी और उनके चेहरे पर दिखते भाव यही संकेत दे रहे थे कि अब सत्ता के समीकरण पहले जैसे नहीं रहे। UP News
आजम खान जेल से बाहर आए तो भले ही बड़े सपा नेता उनके स्वागत के लिए मौजूद नहीं थे, लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं ने उन्हें उतनी ही गर्मजोशी और सम्मान के साथ रिसीव किया। 88 किलोमीटर दूर लखनऊ से अखिलेश यादव ने संदेश भेजा और कहा कि “आजम खान की रिहाई न्याय की जीत है। हमें पूरा विश्वास था कि अदालत सही फैसला देगी। सपा की सरकार बनने पर उनके खिलाफ दर्ज सभी झूठे मुकदमे वापस लिए जाएंगे। सपा महासचिव शिवपाल सिंह यादव ने भी कहा कि बीजेपी ने आजम को गलत मुकदमों में फंसाया, लेकिन अदालत ने उन्हें राहत दी। उन्होंने जोर देकर कहा कि सपा आजम खान के साथ पूरी ताकत से खड़ी है और उन्हें हर संभव मदद दी जा रही है। जेल से बाहर आने के बाद, सीतापुर से लेकर रामपुर तक पार्टी कार्यकर्ताओं ने जगह-जगह उनके स्वागत की झांकी पेश की। रामपुर तक उनके समर्थकों के गाड़ियों के काफिले ने पूरे रास्ते राजनीतिक उत्साह और जज्बा बिखेरा। UP News
आजम खान की जेल से रिहाई पर अखिलेश यादव भले ही सीतापुर नहीं पहुंचे, लेकिन उन्होंने इसे न्याय की जीत बताया और भरोसा दिलाया कि सपा की सरकार बनने पर आजम पर दर्ज सभी मुकदमे वापस लिए जाएंगे। वहीं, सपा महासचिव शिवपाल सिंह यादव ने स्पष्ट किया कि पार्टी आजम के साथ पूरी ताकत से खड़ी है। जब यह बात आजम तक पहुँची, तो उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ ही प्रतिक्रिया दी, लेकिन उनके लहजे में छुपा दर्द साफ झलक रहा था।
मीडिया ने जब आजम से पूछा कि आप सपा और मुस्लिम समाज के बड़े नेता माने जाते हैं, तो उन्होंने पहले मुस्कुराया और फिर कहा, “हम बड़े नेता नहीं हैं। अगर बड़े नेता होते तो कोई बड़ा नेता उन्हें लेने आता। बड़े को बड़ा लेने आता, छोटे को कौन लेने आता?” इस बार जेल से रिसीव करने के लिए मुरादाबाद से सांसद रुचि वीरा ही पहुंचीं, जो आजम की करीबी मानी जाती हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या पार्टी ने यह कदम किसी राजनीतिक रणनीति के तहत उठाया या कोई मजबूरी थी। UP News
आजम खान समाजवादी पार्टी के उन चुनिंदा नेताओं में से हैं, जिन्होंने मुलायम सिंह यादव के साथ मिलकर पार्टी की नींव रखी और इसे उत्तर प्रदेश की राजनीति में बुलंदियों तक पहुँचाया। मुलायम के साथ उनका जुड़ाव इतना मजबूत था कि उन्हें अपनी “आंखों का तारा” कहा जाता था। एम-वाई समीकरण के सहारे ही सपा ने तीन बार सत्ता हासिल की और एक बार अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। 2017 में योगी सरकार के आने के बाद आजम खान पर कानूनी शिकंजा कसना शुरू हुआ और उनके खिलाफ एक के बाद एक सैकड़ों मुकदमे दर्ज हो गए। पहली बार 27 महीने और दूसरी बार 23 महीने जेल में रहने के दौरान अखिलेश यादव सिर्फ दो बार उनसे मिलने गए। प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए सवाल जरूर उठाए गए, लेकिन कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं हो सका। UP News
सियासी संकट की इन घड़ियों में आजम खान को खुलकर समर्थन नहीं मिलने के आरोप लगातार उठते रहे। मंगलवार को जब 23 महीने बाद जेल की सलाखों से बाहर आए, तो अखिलेश यादव लखनऊ में शोरूम उद्घाटन में व्यस्त थे। यही वजह थी कि आजम ने अखिलेश का जिक्र आते ही खामोशी साध ली और कहा, “अगर वह वास्तव में बड़े नेता होते, तो कोई बड़ा नेता रिसीव करने आता। बड़े को बड़ा लेने आता, छोटे को कौन लेने आता?” इस एक लाइन में ही आजम की मायूसी और सियासी दूरी दोनों साफ झलक रही थी। UP News
सपा के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि आजम खान का अखिलेश यादव के प्रति सम्मान अब भी बरकरार है, लेकिन राजनीतिक परिदृश्य बदल चुका है। पार्टी अब खुलकर उनके साथ खड़ी नहीं दिखना चाहती, क्योंकि इससे बीजेपी को धार्मिक ध्रुवीकरण का मौका मिल सकता है। मुलायम सिंह यादव के दौर में आजम खान को सियासी अहमियत इसलिए भी मिलती थी क्योंकि यादव-मुस्लिम समीकरण मजबूत था, लेकिन अब चुनावी रणनीति पूरी तरह बदल चुकी है। एम-वाई समीकरण अब चुनाव जीतने के लिए पर्याप्त नहीं रहा, इसलिए अखिलेश ने पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले पर भरोसा करना शुरू किया। वहीं, बीजेपी चाहती है कि सपा आजम के मुद्दे पर सक्रिय दिखे और धार्मिक ध्रुवीकरण करे, क्योंकि आजम की छवि एक कट्टर मुस्लिम नेता की है। खुलकर उनके साथ खड़े होने पर सपा को राजनीतिक लाभ की बजाय नुकसान हो सकता है।
सपा के रणनीतिकार मानते हैं कि आजम को अधिक सियासी तवज्जो देने से दलित और ओबीसी वोटरों का संतुलन बिगड़ सकता है। पार्टी के पोस्टरों और बैनरों से भी धीरे-धीरे आजम का नाम कम होता गया। जेल में रहते हुए आजम की अनुपस्थिति में ही सपा ने 37 सीटें जीत लीं और मुस्लिम वोटर उनके समर्थन में मजबूत रहे। अखिलेश अब फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं और जेल से बाहर आने के बाद भी सीधे मिलने नहीं गए, या खुद दूरी बनाए रखी। आजम खान और उनका कुनबा अब अखिलेश के लिए राजनीतिक चुनौती बन चुके हैं।
नगर निकायों के चुनाव में रामपुर में आजम के प्रचार के बावजूद उनकी उम्मीदवार हार गई, जबकि लोकसभा में मोहिबुल्लाह नदवी ने उनका विरोध किया। यह साफ संकेत है कि आजम का मामला अब केवल मुस्लिम वोटर का सेंटीमेंट बनकर रह गया है। मुस्लिम सियासत के जानकार मुफ्ती ओसामा नदवी कहते हैं कि सपा ने आजम को राजनीतिक मझधार में छोड़ दिया है। मुस्लिम वोट चाहिए, लेकिन मुस्लिम नेतृत्व नहीं खड़ा करना चाहती। अखिलेश ने बीजेपी के दबाव में अपने परिवार को बचाया, लेकिन आजम को अकेला छोड़ दिया। न केवल आजम, बल्कि मुस्लिम समुदाय के कई मुद्दों पर भी पार्टी अब खड़ी नहीं है। वहीं, सपा विधायक अताउर्रहमान बताते हैं कि पार्टी आजम खान के साथ मजबूती से खड़ी है। कानूनी लड़ाई के लिए टीम तैयार है और सरकार आने पर उनके खिलाफ दर्ज सभी मुकदमे खत्म किए जाएंगे। UP News
अखिलेश का आजम के साथ संबंध सियासी नहीं, बल्कि पारिवारिक और भावनात्मक हैं। आजम के परिवार को इसका पूरा एहसास है। सीतापुर जेल से बाहर निकलने के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं ने हर जगह आजम का उत्साहपूर्ण स्वागत किया। इस लिहाज से यह कहना गलत होगा कि सपा उनके साथ खड़ी नहीं है। हालांकि, यूपी की राजनीति बदल चुकी है। बीजेपी जिस धार्मिक ध्रुवीकरण का जाल बुन रही है, उसे सपा समझ रही है और इसमें फंसने वाली नहीं है। 2027 में सत्ता से बाहर करना ही सपा का स्पष्ट लक्ष्य है। UP News