अहमद शाह अब्दाली और नादिरशाह के हमलों के बाद उजड़ी हुई, खौफ़ और खामोशी से भरी दिल्ली को मीर ने अपनी आँखों से देखा और वही टूटन उनकी शायरी में शहर की नहीं, इंसान की कहानी बनकर उतर आई।

Mir Taqi Mir : ख़ुदा-ए-सुख़न कहे जाने वाले मुहम्मद तक़ी उर्फ़ मीर तकी “मीर” (1723–20 सितम्बर 1810) उर्दू-फ़ारसी परंपरा के ऐसे शायर थे, जिन्होंने लफ़्ज़ों में दर्द भी रखा और तहज़ीब भी। मीर की खास पहचान यह रही कि उन्होंने फ़ारसी की नफ़ासत और हिन्दुस्तानी की सहजता को एक ही लहज़े में इस तरह पिरोया कि उर्दू ग़ज़ल की ज़बान और रूह दोनों बदल गईं। अहमद शाह अब्दाली और नादिरशाह के हमलों के बाद उजड़ी हुई, खौफ़ और खामोशी से भरी दिल्ली को मीर ने अपनी आँखों से देखा और वही टूटन उनकी शायरी में शहर की नहीं, इंसान की कहानी बनकर उतर आई। उनकी रचनाएँ सिर्फ़ इश्क़ की बातें नहीं करतीं, बल्कि बर्बादी के बीच बची हुई उम्मीद, याद और ज़ख्मों की सच्ची दस्तावेज़ भी लगती हैं।
अब तो जाते हैं बुत-कदे से 'मीर'
फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया

राह-ए-दूर-ए-इश्क़ में रोता है क्या
आगे आगे देखिए होता है क्या

आग थे इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम
अब जो हैं ख़ाक इंतिहा है ये

सिरहाने 'मीर' के कोई न बोलो
अभी टुक रोते रोते सो गया है

दिखाई दिए यूँ कि बे-ख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले