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प्रदेश की राजनीति के केंद्र रहे मुलायम सिंह यादव के गांव सैफई की एक अनोखी सामाजिक परंपरा इन दिनों फिर चर्चा में है। वजह है उनके छोटे बेटे प्रतीक यादव की तेरहवीं का आयोजन।

UP News : उत्तर प्रदेश की राजनीति के केंद्र रहे मुलायम सिंह यादव के गांव सैफई की एक अनोखी सामाजिक परंपरा इन दिनों फिर चर्चा में है। वजह है उनके छोटे बेटे प्रतीक यादव की तेरहवीं का आयोजन। सैफई गांव में वर्षों से मृत्यु के बाद तेरहवीं भोज न करने की परंपरा रही है। यहां के लोग मानते रहे हैं कि शोक के समय भोज आयोजित करना सामाजिक रूप से उचित नहीं है और इससे गरीब परिवारों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ पड़ता है। यही कारण था कि जब मुलायम सिंह यादव का निधन हुआ था, तब भी परिवार ने तेरहवीं का आयोजन नहीं किया था। उस समय केवल हवन, श्रद्धांजलि सभा और शुद्धि संस्कार किए गए थे। लेकिन अब प्रतीक यादव की तेरहवीं को लेकर जारी कार्ड ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है। भाजपा नेता अपर्णा यादव ने सोशल मीडिया पर तेरहवीं का कार्ड साझा किया, जिसमें उनके साथ परिवार के कई सदस्यों के नाम शामिल हैं। खास बात यह रही कि कार्ड में अखिलेश यादव और उनके परिवार का नाम भी दर्ज है।
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सवाल यही उठ रहा है कि जिस परंपरा को स्वयं मुलायम सिंह यादव के निधन के समय भी नहीं बदला गया, वह अब क्यों बदली जा रही है? स्थानीय लोगों के अनुसार, यह आयोजन पारंपरिक भोज से अधिक श्रद्धांजलि और सामाजिक सहभागिता का रूप हो सकता है। वहीं कुछ लोग इसे बदलते सामाजिक परिवेश और परिवार की व्यक्तिगत इच्छा से जोड़कर देख रहे हैं।
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जानकारी के मुताबिक प्रतीक यादव का निधन 13 मई को हार्ट में ब्लड क्लॉटिंग की वजह से हुआ था। वे लंबे समय से अस्वस्थ बताए जा रहे थे। अगले दिन उनका अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें मुखाग्नि अरविंद सिंह विष्ट ने दी थी। प्रतीक यादव के निधन के बाद शुरुआती कार्यक्रमों में परिवार के कुछ नामों की अनुपस्थिति को लेकर राजनीतिक गलियारों में दूरी की चचार्एं तेज हो गई थीं। हालांकि बाद में हरिद्वार में अस्थि विसर्जन कार्यक्रम के दौरान परिवार के कई सदस्य एक साथ नजर आए। अब तेरहवीं के कार्ड में अखिलेश और उनके बच्चों के नाम शामिल होने से यह संकेत मिल रहा है कि दुख की इस घड़ी में यादव परिवार एकजुट दिखाई देना चाहता है।
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सैफई की यह परंपरा केवल एक रस्म का विरोध नहीं थी, बल्कि सामाजिक समानता और आर्थिक संतुलन का संदेश मानी जाती थी। गांव के बुजुर्गों का मानना था कि मृत्यु के बाद बड़े भोज की होड़ समाज में दिखावा और दबाव बढ़ाती है। इसलिए यहां वर्षों पहले सामूहिक सहमति से तेरहवीं भोज बंद कर दिया गया था। अब देखना होगा कि प्रतीक यादव की तेरहवीं केवल एक अपवाद साबित होती है या फिर सैफई की सामाजिक परंपराओं में बदलाव की नई शुरुआत।
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