सपा के PDA फॉर्मूले पर भाजपा का पलटवार, पार्षद मनोनयन में चला बड़ा दांव

उत्तर प्रदेश की सियासत में भारतीय जनता पार्टी ने शहरी निकायों के पार्षद मनोनयन के जरिए एक बार फिर बड़ा सामाजिक संकेत दिया है। उत्तर प्रदेश भाजपा ने साफ कर दिया है कि उसकी राजनीतिक रणनीति अब केवल पारंपरिक वोट बैंक के सहारे आगे बढ़ने वाली नहीं है।

PDA पर भाजपा का वार
PDA पर भाजपा का वार
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar18 Mar 2026 09:58 AM
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UP News: उत्तर प्रदेश की सियासत में भारतीय जनता पार्टी ने शहरी निकायों के पार्षद मनोनयन के जरिए एक बार फिर बड़ा सामाजिक संकेत दिया है। उत्तर प्रदेश भाजपा ने साफ कर दिया है कि उसकी राजनीतिक रणनीति अब केवल पारंपरिक वोट बैंक के सहारे आगे बढ़ने वाली नहीं है। नगर निगम, नगर पालिका और नगर पंचायतों में जिन जातियों और सामाजिक तबकों को प्रतिनिधित्व दिया गया है, उनमें कई ऐसे वर्ग शामिल हैं जो लंबे समय से राजनीतिक हिस्सेदारी के केंद्र से दूर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह कदम समाजवादी पार्टी के पीडीए फॉर्मूले के जवाब में भाजपा की नई सामाजिक बिसात के तौर पर देखा जा रहा है।

उत्तर प्रदेश के 914 शहरी निकायों में 2802 पार्षद मनोनीत

लंबे इंतजार के बाद भाजपा ने उत्तर प्रदेश के 914 शहरी निकायों में 2802 पार्षदों के मनोनयन की प्रक्रिया पूरी कर दी है। इस सूची के जरिए पार्टी ने संगठनात्मक स्तर पर कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भरने की कोशिश की है। साथ ही यह संदेश भी देने का प्रयास किया गया है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा आने वाले समय की राजनीतिक जमीन अभी से तैयार कर रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद बदले सामाजिक समीकरणों को देखते हुए भाजपा अब नए सिरे से सामाजिक संतुलन साधने में जुटी है। पार्षद मनोनयन की यह कवायद उसी दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।

छोटी पिछड़ी जातियों पर भाजपा का खास जोर

उत्तर प्रदेश के शहरी निकायों में मनोनीत पार्षदों की सूची पर नजर डालें तो भाजपा ने पिछड़े वर्ग के भीतर उन जातियों को तरजीह दी है, जिन्हें अक्सर राजनीति में सीमित भागीदारी मिलती रही है। इनमें हलवाई, दर्जी, माली, पटवा, कसेरा, गोसाई, ठठेरा, कसौधन, कोष्ठा, कौशल, जोगी, धुरिया, पाटकार, रुहेला, रैकवार, भट्ट और कर्णवाल जैसी कई जातियां शामिल हैं। भाजपा की यह रणनीति साफ तौर पर उत्तर प्रदेश में उन सामाजिक समूहों तक पहुंच मजबूत करने की कोशिश है, जिन्हें अब तक बड़े राजनीतिक विमर्श में ज्यादा स्थान नहीं मिला। माना जा रहा है कि पार्टी ने इन वर्गों को प्रतिनिधित्व देकर सामाजिक विस्तार की नई जमीन तैयार की है।

दलित समाज के भीतर भी व्यापक सामाजिक संतुलन

उत्तर प्रदेश में भाजपा ने दलित समाज के भीतर भी केवल पारंपरिक जातीय समीकरणों पर भरोसा नहीं किया, बल्कि अपेक्षाकृत हाशिए पर मानी जाने वाली जातियों को भी प्रतिनिधित्व देकर बड़ा संदेश देने की कोशिश की है। वाल्मीकि, जाटव, कोरी, खटीक, पासी, धानुक और धोबी के साथ-साथ वंशकार, भेला, भुईयार, बेलदार, बहेलिया, नट, गोंड, बंजारा, मुसहर, बाथम, धनकर, तुरहा, खरवार, कोल और कंजर जैसी जातियों को भी शहरी निकायों में जगह दी गई है। इस कदम को उत्तर प्रदेश में भाजपा की उस रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है, जिसमें पार्टी छोटे और बिखरे सामाजिक समूहों को एक व्यापक राजनीतिक छतरी के नीचे लाने की कोशिश करती रही है।

अल्पसंख्यकों और अगड़े वर्गों को भी दिया संतुलित प्रतिनिधित्व

भाजपा ने उत्तर प्रदेश के निकाय मनोनयन में केवल पिछड़े और दलित समाज पर ही फोकस नहीं किया, बल्कि अगड़े वर्गों और अल्पसंख्यकों को भी प्रतिनिधित्व देकर सामाजिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है। अगड़े वर्गों में ब्राह्मण, वैश्य और क्षत्रिय समाज को हिस्सेदारी दी गई है, जबकि अल्पसंख्यक वर्ग में मुस्लिम, सिख, जैन और ईसाई समुदाय को भी जगह मिली है। इससे साफ है कि भाजपा उत्तर प्रदेश में बहुस्तरीय सामाजिक समीकरण बनाकर चलना चाहती है, ताकि किसी एक वर्ग की नाराजगी राजनीतिक चुनौती न बन सके। सूत्रों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश भाजपा नेतृत्व ने इस पूरी प्रक्रिया को काफी सावधानी और गोपनीयता के साथ पूरा किया। प्रदेश स्तर पर संगठन ने सामाजिक, क्षेत्रीय और राजनीतिक समीकरणों का सूक्ष्म अध्ययन करने के बाद सूची को अंतिम रूप दिया। इस कवायद का उद्देश्य केवल नाम घोषित करना नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में पार्टी के सामाजिक आधार को और अधिक मजबूत बनाना भी है।

सहयोगी दलों को भी दिया सम्मानजनक हिस्सा

भाजपा ने उत्तर प्रदेश में अपने सहयोगी दलों को भी इस प्रक्रिया में नजरअंदाज नहीं किया। पार्षद मनोनयन में सहयोगी दलों को भी हिस्सेदारी देकर भाजपा ने गठबंधन राजनीति का संतुलन साधने का प्रयास किया है। जानकारी के अनुसार, सहयोगी दलों को कुल 80 पद मिले हैं। इनमें राष्ट्रीय लोकदल को सबसे ज्यादा 39 सीटें मिली हैं। अपना दल को 25, निषाद पार्टी को 9 और सुभासपा को 7 पद दिए गए हैं। इससे यह भी संकेत मिलता है कि भाजपा उत्तर प्रदेश में गठबंधन सहयोगियों को साथ लेकर आगे बढ़ने की रणनीति पर कायम है।

जातिवार आंकड़े क्या बताते हैं

उत्तर प्रदेश के शहरी निकायों में मनोनीत पार्षदों के वर्गवार आंकड़े भाजपा की सामाजिक रणनीति की साफ तस्वीर पेश करते हैं। नगर निगमों में सामान्य वर्ग के 79, ओबीसी के 59, एससी के 24 और अल्पसंख्यक वर्ग के 8 प्रतिनिधियों को जगह दी गई है। वहीं नगर पालिकाओं में सामान्य वर्ग के 430, ओबीसी के 374, एससी के 163, अल्पसंख्यक वर्ग के 31 और एसटी वर्ग के 2 सदस्यों का मनोनयन हुआ है। सबसे दिलचस्प तस्वीर नगर पंचायतों में दिखती है, जहां सामान्य वर्ग के 591 के मुकाबले ओबीसी वर्ग के 709 प्रतिनिधियों को मौका मिला है। इसके अलावा एससी के 299, अल्पसंख्यक वर्ग के 29 और एसटी के 4 सदस्यों को भी शामिल किया गया है। इन आंकड़ों से साफ संकेत मिलता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा ने इस बार अपनी सामाजिक बिसात खास तौर पर पिछड़े वर्ग, विशेषकर गैर-प्रमुख ओबीसी जातियों के इर्द-गिर्द बिछाई है, ताकि जमीनी स्तर पर नए सामाजिक समीकरण अपने पक्ष में खड़े किए जा सकें।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में क्या है इस फैसले का संदेश

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। ऐसे में भाजपा का यह कदम केवल निकाय स्तर की नियुक्ति नहीं, बल्कि आगामी राजनीतिक लड़ाइयों की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है। समाजवादी पार्टी जहां पीडीए के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वोट बैंक को एकजुट करने की कोशिश कर रही है, वहीं भाजपा ने उत्तर प्रदेश में उसी सामाजिक आधार में सेंध लगाने की रणनीति अपनाई है। छोटे सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व देकर भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि उत्तर प्रदेश की सत्ता और संगठन में उनकी हिस्सेदारी सुनिश्चित की जा रही है। UP News

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उत्तर प्रदेश में दुनिया का पहला दिव्यांग विश्वविद्यालय, अद्भुत है कुलपति की प्रतिभा

चित्रकूट में स्थित जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग विश्वविद्यालय आज देश ही नहीं, बल्कि दुनिया में एक अनोखी पहचान बना चुका है। यह संस्थान विशेष रूप से दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए समर्पित है, जहां उन्हें उच्च शिक्षा के साथ आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिलता है।

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चित्रकूट में स्थित जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग विश्वविद्यालय
locationभारत
userयोगेन्द्र नाथ झा
calendar17 Mar 2026 06:49 PM
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UP News : उत्तर प्रदेश के चित्रकूट में स्थित जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग विश्वविद्यालय आज देश ही नहीं, बल्कि दुनिया में एक अनोखी पहचान बना चुका है। यह संस्थान विशेष रूप से दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए समर्पित है, जहां उन्हें उच्च शिक्षा के साथ आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिलता है।

दुनिया का पहला दिव्यांग विश्वविद्यालय

इस विश्वविद्यालय की स्थापना 27 जुलाई 2001 को इसके संस्थापक जगद्गुरु रामभद्राचार्य द्वारा की गई थी। बाद में इसे आधिकारिक मान्यता भी मिली और वर्ष 2022 में वर्ल्ड रिकॉर्ड्स यूनियन ने इसे दुनिया का पहला दिव्यांग विश्वविद्यालय घोषित किया। इस संस्थान का उद्देश्य दिव्यांग छात्रों को ऐसी शिक्षा देना है, जिससे वे समाज की मुख्यधारा में सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर सकें।

शिक्षा के साथ आत्मनिर्भरता की दिशा में पहल

यह विश्वविद्यालय केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां छात्रों को रहने, सीखने और आगे बढ़ने के लिए विशेष सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।

* छात्रावास और आवास की व्यवस्था

* दिव्यांग अनुकूल संसाधन

* व्यावसायिक और उच्च शिक्षा के अवसर

इसी कारण देशभर से छात्र यहां शिक्षा लेने पहुंचते हैं।

कुलपति की अद्भुत प्रतिभा

विश्वविद्यालय के कुलपति जगद्गुरु रामभद्राचार्य की प्रतिभा अपने आप में असाधारण मानी जाती है।

* कहा जाता है कि उन्हें 22 भाषाओं का ज्ञान है

* उन्होंने 80 से अधिक ग्रंथों की रचना की है

* उनकी स्मरण शक्ति इतनी तेज है कि लोग इसे कंप्यूटर से भी तेज बताते हैं। 

सबसे प्रेरणादायक बात यह है कि बचपन में ही उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी, लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से असंभव को संभव कर दिखाया।

दिव्यांग छात्रों के लिए वरदान बना संस्थान

भारत में बड़ी संख्या में ऐसे छात्र हैं, जो शारीरिक चुनौतियों के कारण उच्च शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। ऐसे में यह विश्वविद्यालय उनके लिए एक नई उम्मीद बनकर उभरा है। यहां से पढ़ाई करने वाले छात्र आज विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रहे हैं और समाज के लिए प्रेरणा बन रहे हैं। जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग विश्वविद्यालय ने यह साबित कर दिया है कि अगर सही दिशा और अवसर मिले, तो कोई भी व्यक्ति अपनी सीमाओं को पार कर सकता है। चित्रकूट का यह अनोखा विश्वविद्यालय न केवल शिक्षा का केंद्र है, बल्कि यह आत्मविश्वास, संघर्ष और सफलता की एक जीवंत मिसाल भी है।



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यूपी में कब दिखेगा ईद का चांद? बड़ा ऐलान, 21 मार्च को मनाई जा सकती है ईद

पूरे देश में ईद-उल-फितर को लेकर उत्साह बढ़ता जा रहा है। इस बीच लखनऊ के जाने-माने इस्लामी विद्वान मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने चांद को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है, जिससे ईद की संभावित तारीख को लेकर तस्वीर साफ होने लगी है।

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ईद-उल-फितर
locationभारत
userयोगेन्द्र नाथ झा
calendar17 Mar 2026 06:19 PM
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UP News : उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश में ईद-उल-फितर को लेकर उत्साह बढ़ता जा रहा है। इस बीच लखनऊ के जाने-माने इस्लामी विद्वान मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने चांद को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है, जिससे ईद की संभावित तारीख को लेकर तस्वीर साफ होने लगी है।

19 मार्च को देखा जाएगा ईद का चांद

मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली के अनुसार, 19 मार्च की शाम को ईद का चांद देखने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। इस दिन देशभर में चांद दिखने की पुष्टि के बाद ही ईद की तारीख का आधिकारिक ऐलान किया जाएगा। उन्होंने बताया कि अगर 19 मार्च को चांद नजर आ जाता है, तो अगले दिन यानी 20 मार्च को ईद मनाई जाएगी।

21 मार्च को ईद मनने की ज्यादा संभावना

अगर 19 मार्च की शाम को चांद दिखाई नहीं देता है, तो रमजान का महीना 30 दिनों का पूरा होगा और इसके बाद 21 मार्च को ईद मनाई जाएगी। फिलहाल अनुमान यही लगाया जा रहा है कि इस बार 21 मार्च को ईद मनाई जा सकती है।

ईद का त्योहार: इबादत और इंसानियत का संदेश

ईद-उल-फितर इस्लाम धर्म के सबसे अहम त्योहारों में से एक है, जो पवित्र रमजान महीने के समापन पर मनाया जाता है। यह पर्व सिर्फ खुशियां मनाने का नहीं, बल्कि संयम, दया और भाईचारे का संदेश देने का अवसर भी होता है। इस दिन लोग सुबह ईदगाह और मस्जिदों में विशेष नमाज अदा करते हैं और अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं।

जकात और फितरा का विशेष महत्व

ईद से पहले मुस्लिम समुदाय के लोग जरूरतमंदों की मदद के लिए जकात और फितरा अदा करते हैं। इसका उद्देश्य समाज में समानता और सहयोग की भावना को मजबूत करना है, ताकि हर व्यक्ति ईद की खुशियों में शामिल हो सके। ईद के दिन घरों में खास पकवान बनाए जाते हैं, जिनमें सेवइयां सबसे प्रमुख होती हैं। लोग नए कपड़े पहनकर अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से मिलते हैं और एक-दूसरे को ईद की मुबारकबाद देते हैं। फिलहाल सबकी नजरें 19 मार्च की शाम पर टिकी हैं, जब आसमान में दिखने वाला चांद तय करेगा कि ईद-उल-फितर 20 मार्च को मनाई जाएगी या 21 मार्च को। लेकिन मौजूदा अनुमानों के अनुसार 21 मार्च को ईद मनाए जाने की संभावना अधिक जताई जा रही है।