अचानक आई गिरावट से निवेशकों के करीब 14 लाख करोड़ रुपये साफ हो गए। बाजार में आई इस बड़ी गिरावट के पीछे कई वैश्विक और आर्थिक कारण जिम्मेदार हैं। आइए जानते हैं कि आखिर कौन-सी सात वजहें हैं जिनकी वजह से बाजार में इतनी बड़ी हलचल देखने को मिली।

आज सुबह शेयर बाजार के लिए काफी भारी साबित हुई। बाजार खुलते ही कुछ ही मिनटों में ऐसा लगा मानो निवेशकों के पैरों तले जमीन खिसक गई हो। चारों तरफ लाल निशान दिखाई देने लगे और निवेशकों की संपत्ति तेजी से कम होती चली गई। सेंसेक्स लगभग 2400 अंक टूट गया जबकि निफ्टी 700 अंकों से ज्यादा गिर गया। इस अचानक आई गिरावट से निवेशकों के करीब 14 लाख करोड़ रुपये साफ हो गए। बाजार में आई इस बड़ी गिरावट के पीछे कई वैश्विक और आर्थिक कारण जिम्मेदार हैं। आइए जानते हैं कि आखिर कौन-सी सात वजहें हैं जिनकी वजह से बाजार में इतनी बड़ी हलचल देखने को मिली।
सोमवार को बाजार खुलते ही निवेशकों को बड़ा झटका लगा। कुछ ही मिनटों में सेंसेक्स करीब 2400 अंक गिरकर 76,424 के स्तर तक पहुंच गया जबकि निफ्टी 50 भी लगभग 700 अंक टूटकर 23,750 के आसपास कारोबार करता नजर आया। इस गिरावट का असर कई बड़ी कंपनियों के शेयरों पर भी पड़ा। एयरलाइन कंपनी इंडिगो के शेयर लगभग 8 प्रतिशत तक गिर गए वहीं टाटा स्टील, एलएंडटी, एसबीआई और मारुति सुजुकी के शेयरों में भी करीब 5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। सरकारी बैंकों के शेयरों में तो सबसे ज्यादा दबाव देखा गया।
शेयर बाजार में गिरावट की सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की तेजी रही। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण तेल की सप्लाई को लेकर डर पैदा हो गया है। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड और WTI की कीमतें लगभग 118 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। जब तेल महंगा होता है तो भारत जैसे आयात करने वाले देशों की आर्थिक चिंता बढ़ जाती है जिसका असर सीधे शेयर बाजार पर दिखाई देता है।
मिडिल ईस्ट में चल रहा संघर्ष भी बाजार की घबराहट का बड़ा कारण बना है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है और हालात युद्ध जैसे बन गए हैं। इन घटनाओं ने वैश्विक निवेशकों के मन में अनिश्चितता पैदा कर दी है। जब दुनिया में युद्ध या राजनीतिक तनाव बढ़ता है तो निवेशक जोखिम लेने से बचते हैं जिससे शेयर बाजारों में गिरावट देखने को मिलती है।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर भारतीय मुद्रा पर भी पड़ा है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होकर लगभग 92.19 के स्तर तक पहुंच गया। जब रुपया कमजोर होता है तो विदेशी निवेशकों का भरोसा थोड़ा कम हो जाता है और वे अपना पैसा बाजार से निकालने लगते हैं। इससे बाजार पर और ज्यादा दबाव बन जाता है।
अमेरिका में सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाला रिटर्न बढ़ गया है। 10 साल के अमेरिकी बॉन्ड की यील्ड 4.2 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई है। जब बॉन्ड पर सुरक्षित और अच्छा रिटर्न मिलने लगता है तो कई निवेशक शेयर बाजार से पैसा निकालकर बॉन्ड में निवेश करना पसंद करते हैं। यही वजह है कि बाजार से पूंजी निकलने लगी है।
भारतीय शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशक यानी FIIs की भूमिका काफी बड़ी होती है। पिछले कुछ दिनों से वे लगातार भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। मार्च के शुरुआती दिनों में ही विदेशी निवेशकों ने करीब 16,000 करोड़ रुपये के शेयर बेच दिए। इतनी बड़ी बिकवाली से बाजार में दबाव और बढ़ गया।
यह गिरावट सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रही। एशिया के कई बड़े बाजारों में भी भारी गिरावट देखने को मिली। जापान का निक्केई इंडेक्स लगभग 6 प्रतिशत गिर गया जबकि दक्षिण कोरिया का कोस्पी करीब 8 प्रतिशत तक टूट गया। अमेरिका और यूरोप के बाजार भी पिछले कारोबारी सत्र में कमजोरी के साथ बंद हुए थे।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं तो भारत में महंगाई बढ़ सकती है। पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे और इसका असर रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर भी पड़ेगा। अगर महंगाई बढ़ती है तो केंद्रीय बैंक के लिए ब्याज दरें कम करना मुश्किल हो जाता है। इससे लोन सस्ते होने में देरी हो सकती है और आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।
बाजार में डर को मापने वाला इंडेक्स इंडिया VIX भी तेजी से बढ़ा है जो निवेशकों की चिंता को दिखाता है। हालांकि बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे हालात अक्सर अस्थायी होते हैं। इतिहास बताता है कि युद्ध या वैश्विक तनाव के कारण बाजार में गिरावट आती है लेकिन लंबे समय में बाजार फिर संभल भी जाता है। इसलिए निवेशकों को घबराकर फैसले लेने से बचना चाहिए और लंबी अवधि की रणनीति पर ध्यान देना चाहिए।
डिस्क्लेमरः चेतना मंच यूजर्स को सलाह देता है कि वह कोई भी निवेश निर्णय लेने के पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह लें।