UP Elections 2022 नोटा की रही कई प्रत्याशियों को हराने में अहम भूमिका

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UP Elections 2022
locationभारत
userचेतना मंच
calendar11 Mar 2022 07:08 PM
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UP Elections 2022 : सहारनपुर। विधानसभा चुनाव (UP Elections 2022) में नोटा की कई प्रत्याशियों को हराने में खास अहम भूमिका रही। (UP Elections 2022) वीआईपी सीट कहे जाने वाली नकुड़ पर नोटा की खास अहमियत रही। क्योंकि इस सीट पर हार-जीत का अंतर महज 155 का रहा। जबकि यहां 710 मतदाताओं ने प्रत्याशियों को स्वीकार नहीं किया। अगर नोटा न दबता और हारने या जीतने वाले के पक्ष में डालता तो हार जीत में काफी फर्क पड़ सकता था। रिजल्ट भी बदल सकता था और जीत का अंतर को बढ़ा सकता था।

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सहारनपुर में सभी सात सीटों पर 71 प्रत्याशी चुनावी मैदान में थे। सबसे ज्यादा सहारनपुर देहात विस क्षेत्र में 14 तो गंगोह में सबसे कम सात प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे थे। आखिर में नोटा का नंबर था। सामान्य शब्दों में नोटा का मतलब यह होता है कि अगर मतदाता किसी प्रत्याशी को पसंद नहीं करता है तो वह नोटा का बटन दबाए। यह एक तरह का विरोध होता है कि मतदाता किसी भी प्रत्याशी को पसंद नहीं करता है। नोटा की बात करें तो ईवीएम पर 5482 लोगों ने नोटा दबाया। हॉट सीट नकुड़ पर भाजपा के मुकेश चौधरी, सपा से डॉ. धर्मसिंह सैनी के बीच हार-जीत का अंतर खासा कम रहा। इस सीट पर प्रत्याशियों को पसंद न करते हुए 710 लोगों ने नोटा दबाया है। हर सीट पर आम आदमी पार्टी के सभी प्रत्याशियों से ऊपर नोटा रहा।

प्रदेश की नंबर एक सीट नहीं खिला कमल प्रदेश की नंबर एक सीट बेहट पर भाजपा का सूखा इस बार भी खत्म नहीं हुआ। भाजपा ने इस बार बेहट से कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए मौजूदा विधायक नरेश सैनी पर दांव लगाया था। जबकि, सपा से उमर अली खान और बसपा से रईस मलिक चुनावी मैदान में थे। सपा के उमर अली खान ने नरेश सैनी को 38 हजार वोटों से मात दी।

मुस्लिम बाहुल्य होने के कारण बेहट में भाजपा की राह हमेशा ही मुश्किल रही है। इस बार भी बेहट में जीत दर्ज करना चुनौतीपूर्ण था। माहौल को देखकर लग भी रहा था कि शायद भाजपा इस बार बेहट में जीत दर्ज कर पाए। राजनीतिक पंड़ितों का मानना था कि सपा और बसपा से मुस्लिम प्रत्याशी होने के कारण मुस्लिम वोटों में बिखराव होगा। लेकिन, चुनाव के समय ऐसा नहीं हुआ। एक पक्ष के वोट बसपा की बजाय सपा के पक्ष में चले गए। जिसका नतीजा यह रहा कि 96,389 वोट प्राप्त करने के बावजूद भी नरेश सैनी चुनाव में हार गए। उन्हें सपा के उमर अली खान ने 38,007 वोटों से पराजित किया।

एएसटी सेंटर ने दिलाई भाजपा को जीत इस्लामिक शिक्षा के केंद्र देवबंद में लगातार दूसरी बार भाजपा को जीत मिली तो इसकी गूंज सियासी हलकों में महसूस की जा रही है। यह जीत भी कई मायनों में खास भी है। इस बार भाजपा को देवबंद में कड़ी चुनौती मिल रही थी। चुनाव से पहले भाजपा प्रत्याशी का जमकर विरोध भी हुआ था। लेकिन, सरकार ने देवबंद में एटीएस सेंटर का शिलान्यास कर पासा पलट दिया।

वर्ष 2017 में देवबंद में भाजपा के कुंवर बृजेश को जीत मिली थी। लेकिन वर्ष 2022 आते-आते देवबंद की स्थिति बदलने लगी थी। भाजपा विधायक का कहीं दबी जबान तो कहीं पर खुलकर विरोध होने लगा था। वहीं सपा और बसपा की ओर से भाजपा को कड़ी चुनौती मिल रही थी। देवबंद का संदेश देश ही नहीं विदेश तक भी पहुंचता है। जिस कारण भाजपा ने भी देवबंद पर ध्यान केंद्रित किया। चुनाव से ठीक पहले देवबंद में एटीएस सेंटर स्थापित करने की घोषणा कर दी। यही नहीं एटीएस सेंटर का शिलान्यास भी किया था। जिसके बाद माहौल भाजपा के पक्ष में बनाता गया और अंत में भाजपा को जीत मिली।

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UP Deputy CM इस बार कौन बनेगा उप मुख्यमंत्री, इन नामों पर हो रही चर्चा

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UP Deputy CM
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userचेतना मंच
calendar11 Mar 2022 06:47 PM
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UP Deputy CM : उत्तर प्रदेश (UP Deputy CM) में चुनाव सम्पन्न हो चुका है और नतीजे भी आ चुके हैं। कुछ ही दिनों में नई सरकार शपथ लेने वाली है लेकिन क्या आपको पता है कि इस बार यूपी का डिप्टी सीएम कौन होगा। क्या केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा को दोबारा दोबारा योगी मंत्रिमंडल में मिलेगी जगह या इनकी जगह दो नए चेहरे तलाशे जा रहे हैं जो इनकी जगह ले सकते हैं। बीजेपी के आला कमान ने इस बारे में भी सोचना शुरू कर दिया है। यूपी में बीजेपी में प्रचंड जीत मिलने के बाद दो ऐसे चेहरे सामने आए हैं जिन्हें बतौर डिप्टी सीएम योगी कैबिनेट में जगह मिल सकती है।

UP Deputy CM 2022

उत्तर प्रदेश में जिस तरह से बीजेपी ने प्रचंड जीत हासिल की है उससे बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह का कद बढ़ना पूरी तरह से तय है। अब सवाल इस बात का है कि उन्हें योगी कैबिनेट में जगह मिलेगी तो किस रूप में। बीजेपी के सूत्रों का दावा है कि प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते स्वतंत्रदेव सिंह को बतौर डिप्टी सीएम अहम जिम्मेदारी दी जा सकती है। स्वतंत्रदेव सिंह एक तो ओबीसी चेहरा हैं और दूसरे बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष हैं। पिछले कुछ समीकरणों पर गौर करें तो ये तस्वीर साफ होती नजर आ रही है। 2017 में जब बीजेपी की सरकार बनी थी तब केशव मौर्य बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष थे। तब बीजेपी को प्रचंड जीत का इनाम उनको मिला था। उन्हें एक ओबीसी चेहरे के तौर पर सरकार में जगह दी गई थी वही स्थिति स्वतंत्रदेव के साथ दोहरायी जा सकती है।

यूपी में आगरा से चुनाव जीतने वाली बेबीरानी मौर्य भी यूपी की डिप्टी सीएम के तौर पर सरकार में दिखायी दे सकती हैं। बताया जा रहा है कि उत्तराखंड की राज्यपाल रहीं बेबीरानी मौर्य को रणनीति के तौर पर यूपी ले आया गया था। यूपी लाने के बाद उन्हें बीजेपी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया था और बाद में उन्हें बीजेपी ने एक दलित चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट किया था। बेबीरानी मौर्य भी उसी जाटव समाज से आती हैं जिससे मायावती ताल्लुक रखती हैं।

बीजेपी की रणनीति बेबीरानी को एक दलित चेहरे को आगे करके मायावती के कोर वोट बैंक में सेंध लगाने की है। इस बार के नतीजे बता रहे हैं कि बीजेपी ने दलित वोट बैंक में अच्छी सेंधमारी की है। लिहाजा 2024 चुनाव से पहले इसमें और धार देने के लिए बेबीरानी को बतौर डिप्टी सीएम सरकार में शामिल किया जा सकता है। ऐसा करके बीजेपी जाटव और खासतौर से दलित समाज को आसानी से साध सकती है।

वर्तमान में योगी सरकार में दो डिप्टी सीएम काम कर रहे हैं। एक केशव मौर्य तो दूसरे डॉ दिनेश शर्मा। शर्मा को यूपी में एक ब्राह़मण चेहरे के तौर पर सरकार में शामिल किया गया था। लेकिन पिछले पांच साल के कामकाज पर नजर डालें तो उनको लेकर संगठन के पास फीडबैक अच्छी नहीं है। जनता के बीच उनको लेकर एक निगेटिव छवि बनी है। इसीलिए बहुत कम संभावना है कि नए मंत्रिमंडल में उनके नाम पर विचार किया जाए।

इसी तरह दूसरे डिप्टी सीएम का दावा तो बेहद खराब हो चुका है। मौर्य तो सिराथू से चुनाव ही हार चुके हैं। चुनाव हारने के बाद वैसे भी उनपर दबाव ज्यादा है और सरकार में रहने या न रहने का फैसला पूरी तरह से आलाकमान ही तय करेगा। केशव मौर्य एक बड़े नेता हैं ऐसे में बीजेपी उनके लिए विकल्प तलाश सकती है और उन्हें राज्यसभा भी भेजा सकता है। वहां रहकर वो अपने समाज का प्रतिनिधित्व भी कर सकते हैं।

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UP Politics 2022 यूपी में क्यों नहीं चल पाया प्रियंका गांधी का जादू, कहां हुई चूक

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UP Politics
locationभारत
userचेतना मंच
calendar01 Dec 2025 03:29 PM
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UP Politics : उत्तर प्रदेश में विधानसभा (UP Politics) चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं और उसके नतीजे भी आ गए हैं। विधानसभा चुनाव कांग्रेस (UP Politics) के लिए भी उत्साहजनक नहीं है। यूपी में कांग्रेस को खड़ा करने के लिए यूपी की प्रभारी और कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी ने काफी मेहनत की थी। आधी आबादी पर दांव खेलने वाली प्रियंका को वहां भी निराशा मिली। प्रियंका ने कांग्रेस में महिलाओं को चालीस फीसदी टिकट दिए जाने की शुरूआत की। इस अभियान के तहत ही कांग्रेस ने यूपी में 159 महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था लेकिन इनमें से सिर्फ एक ही जीत पाईं। कांग्रेस की हालत यह है कि वह केवल दो सीटों पर सिमटकर रह गई है।

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राज्य में कांग्रेस का प्रदर्शन सबसे खराब रहा है। राज्य में कांग्रेस ने केवल दो सीटें जीती हैं और इस बार उसका वोट शेयर भी पिछले चुनाव की तुलना में गिर गया है। कांग्रेस राज्य में प्रियंका गांधी के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही थी। लेकिन उनके नेतृत्व में पार्टी प्रदर्शन नहीं कर पाई और पार्टी के सिर्फ दो विधायक ही विधानसभा की दहलीज पार कर पाए। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू भी विधानसभा चुनाव हार गए हैं। पार्टी को केवल दो सीटों पर विजय मिली है जिसमें एक फरेंदा सीट और दूसरी प्रतापगढ़ जिले की रामपुर खास सीट हैं।

राज्य में कांग्रेस की ताकत विधानसभा में कमजोर होती जा रही है। जहां 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 28 सीटों पर जीत हासिल की थी। वहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में यह आंकड़ा 7 पर पहुंच गया था। जबकि राज्य में 2017 के चुनाव में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया था और इस बार पार्टी ने अपने दम पर चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में कांग्रेस को करीब 6.5 फीसदी वोट मिले थे। मौजूदा विधानसभा चुनाव में कुछ खास प्रदर्शन नहीं हो सका। कांग्रेस के रिकॉर्ड पर नजर डालें तो बीजेपी को छोड़कर पार्टी राज्य के सभी राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन करने में सफल रही है। फिलहाल प्रियंका गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की यह दूसरी बड़ी हार है। इससे पहले 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस एक सीट पर सिमट गई थी।

पार्टी केवल रायबरेली की सीट जीतने में सफल रही और अमेठी की सीट पर उसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा। कई दशकों तक उत्तर प्रदेश की सत्ता पर राज करने वाली कांग्रेस अब महज दो विधायकों तक सिमट कर रह गई है। प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की रामपुर खास सीट से वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी की बेटी आराधना मिश्रा मोना चुनाव जीतने में सफल रही हैं। मोना मिश्रा ने बीजेपी प्रत्याशी नागेश प्रताप को हराकर दूसरी बार विधायक बने हैं।

गौरतलब है कि रामपुर खास प्रमोद तिवारी का गढ़ माना जाता है, वह यहां से लगातार नौ बार विधायक रह चुके हैं। इसके साथ ही महाराजगंज की फरेंदा सीट पर पार्टी ने वीरेंद्र चौधरी पर दांव खेला था। वह चुनाव जीतने में सफल रहे और उन्होंने चुनाव में भाजपा उम्मीदवार को हराया। कांग्रेस उम्मीदवार वीरेंद्र सिंह को 85,181 वोट मिले जबकि बीजेपी उम्मीदवार बजरंग बहादुर सिंह को 83,935 वोट मिले. हालांकि, वीरेंद्र पिछला चुनाव हार गए और बजरंग बहादुर सिंह से हार गए। तो इस चुनाव में उन्होंने बदला ले लिया है।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की कमान जब से प्रियंका गांधी के हाथों में आई है तब से यह दूसरा चुनाव है जिसमें कांग्रेस को बुरी हार का सामना करना पड़ा है। इससे पहले 2019 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस को करारी हार मिली थी। इसके बाद भी प्रियंका पिछले तीन वर्षों से कांग्रेस को खड़ा करने में दिन रात एक किए हुए थीं लेकिन परिणाम आए तो सारी उम्मीदें धराशायी हो गईं। अब कांग्रेस के समाने चुनौती काफी बड़ी है।

मिशन 2024 में जीत हासिल करने के लिए कांग्रेस के साथ ही प्रियंका को भी नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। कांग्रेस के भीतर से ही अब प्रियंका के रवैये को लेकर आवाज भी उठने लगी है। कई पदाधिकारियों का आरोप है कि वह वामपंथियों से इतनी घिर गई हैं कि पार्टी के हित में सही फैसले नहीं ले पा रही हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रियंका को समय रहते ही कांग्रेस के साथ ही अपनी कमियों को भी दूर करना होगा नहीं तो कांग्रेस की ऐसी स्थिति बार बार आती रहेगी।