समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान की कानूनी मुश्किलों और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई ने एक बार फिर भारतीय राजनीति में राजनीतिक प्रतिशोध और सरकारी संस्थाओं की स्वतंत्रता पर बहस छेड़ दी है।

लेखक: रवि अरोड़ा
वरिष्ठ पत्रकार एवं प्रसिद्ध व्यंग्य लेखक
चेतना मंच | दृष्टिकोण
Editorial : भारतीय राजनीति में विरोधियों को सबक सिखाने की परंपरा अब कोई नई बात नहीं रह गई है। सत्ता बदलती है तो राजनीतिक समीकरण बदलते हैं, चेहरे बदलते हैं, सरकारें बदलती हैं, लेकिन एक चीज अक्सर नहीं बदलती। वह है राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ सरकारी तंत्र के इस्तेमाल को लेकर उठने वाले सवाल। आजम खान का मामला इसी राजनीतिक परिपाटी की एक और कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता आजम खान की रिहाई और उसके तुरंत बाद प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई ने एक बार फिर देश की राजनीति में कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत से राहत मिलने के बाद जेल से बाहर आए आजम खान को दोबारा हिरासत में लिया जाना केवल एक नेता की कानूनी मुश्किलों का मामला नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक राजनीतिक व्यवस्था पर बहस का विषय है जिसमें कानून, जांच एजेंसियों और सत्ता के संबंधों को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। राजनीतिक परिस्थितियों को समझने वाले लोगों के लिए इस घटनाक्रम में आश्चर्य से ज्यादा चिंता का विषय है। हाल ही में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की जेल में आजम खान से मुलाकात और उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच यह घटनाक्रम राजनीतिक चर्चाओं को और तेज करने वाला है। आजम खान के खिलाफ दर्ज मुकदमों और उनके कानूनी संघर्ष को लेकर उनके समर्थक लंबे समय से सवाल उठाते रहे हैं। कुछ कानूनी जानकारों और राजनीतिक समर्थकों की नजर में उनके साथ हुई कार्रवाई उसकी गंभीरता और अनुपात को लेकर बहस पैदा करती है। हालांकि किसी भी मामले में दोष अथवा निर्दोष होने का अंतिम निर्धारण अदालत का अधिकार है, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया के साथ निष्पक्षता और समानता का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। Editorial
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दरअसल, बात सिर्फ आजम खान की नहीं है। सवाल उस राजनीतिक परंपरा का है जिसमें सत्ता में बैठे लोग अपने विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई को शासन का स्वाभाविक हिस्सा मानने लगते हैं। देश की राजनीति में शायद ही कोई ऐसा बड़ा नेता होगा जिसे विपक्ष में रहते हुए जांच, मुकदमों और गिरफ्तारी की परिस्थितियों का सामना न करना पड़ा हो। इसी तरह सत्ता में आने के बाद अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई तेज करने के आरोप भी बार-बार लगते रहे हैं। विडंबना यह है कि सरकार बदलते ही कई मामलों में जांच की दिशा बदल जाती है। कुछ मुकदमों में राहत मिल जाती है, कुछ मामलों में आरोपपत्र कमजोर पड़ जाते हैं और कुछ मामलों में कार्रवाई आगे नहीं बढ़ती। राजनीतिक दल बदलने वाले नेताओं के मामलों में भी अक्सर ऐसी परिस्थितियां देखने को मिलती हैं जिन पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यह सिलसिला केवल आज की राजनीति तक सीमित नहीं है। आपातकाल के दौर से लेकर वर्तमान समय तक राजनीतिक प्रतिशोध के आरोप भारतीय लोकतंत्र का पीछा करते रहे हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि समय के साथ जांच एजेंसियों और सरकारी संस्थाओं की भूमिका को लेकर बहस अधिक व्यापक हो गई है। Editorial
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किसे याद नहीं कि गुजरात की राजनीति में अमित शाह को भी अपने राजनीतिक विरोधियों के दौर में कानूनी कार्रवाई और राज्य से बाहर रहने जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था। बाद में केंद्र में सत्ता परिवर्तन के पश्चात तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम की गिरफ्तारी और लगभग दो महीने तक जेल में रहने का मामला भी देश की राजनीति में चर्चा का विषय बना। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक अतीत भी इस बहस से अछूता नहीं है। वर्ष 2007 में तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार के दौरान उनके खिलाफ हुई कार्रवाई और उनके राजनीतिक संघर्ष का उल्लेख आज भी किया जाता है। उस दौर में योगी आदित्यनाथ ने संसद में अपनी पीड़ा व्यक्त की थी। बाद में 2017 में प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के पश्चात उनके खिलाफ दर्ज कुछ मामलों को समाप्त करने अथवा वापस लेने की प्रक्रिया भी चर्चा में रही। इसी तरह दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन तथा कर्नाटक के डीके शिवकुमार जैसे नेताओं के मामले भी राजनीतिक और कानूनी बहस का हिस्सा बने रहे हैं। इन उदाहरणों का उल्लेख किसी नेता को दोषी या निर्दोष घोषित करने के लिए नहीं, बल्कि इस सवाल को समझने के लिए जरूरी है कि क्या देश में जांच और कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया राजनीतिक परिस्थितियों से पूरी तरह स्वतंत्र रह पाती है? Editorial
सितंबर 2022 में प्रकाशित द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट ने इस बहस को आंकड़ों के जरिए सामने रखा था। अदालतों के दस्तावेजों, सरकारी रिकॉर्ड और जांच एजेंसियों के बयानों के आधार पर तैयार इस विश्लेषण में करीब 200 प्रमुख नेताओं से जुड़े मामलों का अध्ययन किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2004 से 2014 के बीच यूपीए सरकार के दस वर्षों में सीबीआई की जांच के दायरे में आए 72 नेताओं में 43 विपक्षी दलों से जुड़े थे। वहीं वर्ष 2014 से 2022 के बीच एनडीए सरकार के पहले आठ वर्षों में जांच के दायरे में आए 124 नेताओं में 118 विपक्षी दलों से संबंधित थे। इस तरह जांच के दायरे में आए नेताओं में विपक्षी दलों से जुड़े लोगों का अनुपात लगभग 60 प्रतिशत से बढ़कर 95 प्रतिशत तक पहुंच गया था। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया था कि भाजपा में शामिल होने वाले कई नेताओं के खिलाफ जांच की स्थिति में बाद में बदलाव आया। इनमें असम के हिमंत बिस्वा सरमा, महाराष्ट्र के अजित पवार और प्रफुल्ल पटेल तथा पश्चिम बंगाल के शुभेंदु अधिकारी जैसे नेताओं के मामले राजनीतिक बहस का हिस्सा बने। इन आंकड़ों को किसी व्यक्ति के अपराध अथवा निर्दोष होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। लेकिन जांच के चयन, कार्रवाई के समय और अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में एजेंसियों के व्यवहार को लेकर सवाल उठाने के लिए ये आंकड़े निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं। Editorial
आज देश की संसद से लेकर विधानसभाओं तक ऐसे जनप्रतिनिधियों की संख्या कम नहीं है जिनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। संसद में लगभग 42 प्रतिशत सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होने का आंकड़ा भी इस बहस को गंभीर बनाता है। हालांकि किसी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दर्ज होना और उसका अपराध सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। लोकतंत्र में कानून का शासन तभी मजबूत होता है जब कानून सबके लिए समान हो। किसी विपक्षी नेता के खिलाफ शिकायत मिलते ही जांच एजेंसियां सक्रिय हो जाएं और सत्ता पक्ष के किसी नेता के मामले में कार्रवाई की गति धीमी पड़ जाए तो संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या सीबीआई, ईडी, आयकर विभाग और पुलिस जैसी संस्थाएं राजनीतिक दबाव से पूरी तरह मुक्त होकर काम कर रही हैं? क्या सत्तारूढ़ दल के नेताओं के खिलाफ भी उसी तत्परता से जांच होती है जिस तत्परता से विपक्षी नेताओं के खिलाफ होती है? क्या चुनाव से ठीक पहले होने वाली गिरफ्तारियों का समय महज संयोग है? क्या गिरफ्तारी से लेकर आरोपपत्र और मुकदमे की सुनवाई तक की प्रक्रिया निर्धारित समयसीमा में पूरी होती है? इन सवालों का जवाब केवल राजनीतिक बयानबाजी से नहीं मिल सकता। इसके लिए संस्थाओं की पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्ष कार्यप्रणाली जरूरी है। Editorial
भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि सत्ता स्थायी नहीं होती। आज जो दल सत्ता में है, कल उसे विपक्ष में भी बैठना पड़ सकता है। आज जिन नेताओं के हाथ में सरकारी मशीनरी है, कल उन्हें भी उसी व्यवस्था के सामने खड़ा होना पड़ सकता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राजनीति इसी तरह चलती रहेगी? क्या हर सरकार अपने कार्यकाल में पिछली सरकार के नेताओं के खिलाफ कार्रवाई को अपनी राजनीतिक उपलब्धि मानती रहेगी? क्या सत्ता परिवर्तन के साथ जांच एजेंसियों की प्राथमिकताएं भी बदलती रहेंगी? आजम खान का मामला इसी बड़ी बहस का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आया है। उनके खिलाफ दर्ज मामलों का फैसला अदालतों को करना है, लेकिन उनके मामले के बहाने देश की जांच व्यवस्था और राजनीतिक संस्कृति पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा है। आखिर लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव जीतना और सरकार बनाना नहीं है। लोकतंत्र का असली अर्थ संस्थाओं की स्वतंत्रता, कानून के समक्ष समानता और राजनीतिक विरोधियों के अधिकारों की रक्षा भी है और अंत में एक सवाल, जो आज की राजनीति के गलियारों में गूंज रहा है। यदि आने वाले समय में सत्ता का पहिया फिर घूमता है, तो क्या आज राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई करने वाले चेहरे भी उसी तरह जांच और मुकदमों के घेरे में आएंगे? क्या तब भी यही सवाल उठेंगे कि कानून अपना काम कर रहा है या राजनीतिक हिसाब-किताब पूरा किया जा रहा है? सवाल अनेक हैं। जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं। लेकिन लोकतंत्र के हित में इतना जरूरी है कि कानून किसी सरकार, पार्टी या नेता का औजार नहीं, बल्कि देश के हर नागरिक के लिए समान न्याय का माध्यम बना रहे। Editorial
— रवि अरोड़ा
वरिष्ठ पत्रकार एवं प्रसिद्ध व्यंग्य लेखक
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