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Jagannath Temple Mystery: यह परंपरा है नवकलेवर जिसमें कुछ वर्षों के अंतराल पर भगवान जगन्नाथ समेत चारों प्रतिमाओं को बदल दिया जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी पूरी श्रद्धा और गोपनीयता के साथ निभाई जाती है।

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक मानी जाती है। हर साल लाखों श्रद्धालु ओडिशा के पुरी पहुंचकर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा के दर्शन करते हैं और रथ यात्रा में शामिल होते हैं लेकिन जगन्नाथ मंदिर की एक ऐसी परंपरा भी है जिसके बारे में जानकर लोग हैरान रह जाते हैं। यह परंपरा है नवकलेवर जिसमें कुछ वर्षों के अंतराल पर भगवान जगन्नाथ समेत चारों प्रतिमाओं को बदल दिया जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी पूरी श्रद्धा और गोपनीयता के साथ निभाई जाती है। आइए जानते हैं कि आखिर भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां क्यों बदली जाती हैं और इस अनुष्ठान से जुड़े कौन-कौन से रहस्य लोगों के बीच चर्चा का विषय बने रहते हैं।
'नवकलेवर' का अर्थ होता है नया शरीर। इस परंपरा के तहत भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र, माता सुभद्रा और सुदर्शन चक्र की पुरानी लकड़ी की प्रतिमाओं की जगह नई प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। चूंकि ये प्रतिमाएं लकड़ी से बनी होती हैं इसलिए समय के साथ उनमें प्राकृतिक बदलाव आना सामान्य माना जाता है। इसी वजह से निर्धारित धार्मिक परंपरा के अनुसार नई प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। यह केवल मूर्तियां बदलने की प्रक्रिया नहीं बल्कि एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है जिसमें कई वैदिक और पारंपरिक नियमों का पालन किया जाता है।
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नवकलेवर हर साल नहीं होता। यह तब आयोजित किया जाता है जब हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ महीने में अधिकमास (मलमास) आता है। आमतौर पर यह स्थिति लगभग 12 से 19 साल के बीच एक बार बनती है। इसी दौरान नई प्रतिमाओं का निर्माण और स्थापना की जाती है। इसलिए कई बार लोग इसे 12 साल का चक्र कहते हैं जबकि वास्तविक अंतर पंचांग की गणना के अनुसार बदल सकता है।
भगवान जगन्नाथ और अन्य प्रतिमाओं के निर्माण के लिए सामान्य लकड़ी का उपयोग नहीं किया जाता। परंपरा के अनुसार विशेष गुणों वाले नीम के पेड़ों का चयन किया जाता है। इन पेड़ों की पहचान मंदिर से जुड़े विशेष सेवायत और पुजारी धार्मिक नियमों के अनुसार करते हैं। माना जाता है कि चयनित पेड़ स्वस्थ होने चाहिए और उनमें कोई बड़ा दोष नहीं होना चाहिए। इसके बाद धार्मिक विधि-विधान के साथ लकड़ी काटी जाती है और नई प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं।
नवकलेवर से जुड़ी सबसे चर्चित और रहस्यमयी प्रक्रिया पुरानी प्रतिमा से एक पवित्र तत्व को नई प्रतिमा में स्थानांतरित करना मानी जाती है। मंदिर की परंपरा में इसे 'ब्रह्म पदार्थ' या 'ब्रह्म तत्व' कहा जाता है। इस अनुष्ठान को बेहद गोपनीय रखा जाता है और इसकी पूरी प्रक्रिया केवल चुनिंदा सेवायतों की मौजूदगी में संपन्न होती है। मंदिर प्रशासन भी इस प्रक्रिया के बारे में सार्वजनिक रूप से विस्तृत जानकारी साझा नहीं करता।
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धार्मिक परंपरा के अनुसार ब्रह्म तत्व के स्थानांतरण की प्रक्रिया रात में की जाती है। इस दौरान मंदिर परिसर में बाहरी लोगों का प्रवेश पूरी तरह बंद रहता है। लोकप्रिय मान्यताओं के अनुसार उस समय पूरे क्षेत्र में अंधेरा रखा जाता है और केवल अधिकृत सेवायत ही इस अनुष्ठान में शामिल होते हैं। हालांकि इस प्रक्रिया से जुड़ी कई बातें लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं जिनकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
जगन्नाथ मंदिर से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध मान्यताओं में से एक यह है कि पुरानी प्रतिमा के भीतर मौजूद ब्रह्म तत्व को नई प्रतिमा में स्थापित किया जाता है। कई धार्मिक कथाओं में इसे भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ा दिव्य तत्व माना गया है। कुछ सेवायतों के अनुभवों का उल्लेख भी समय-समय पर सामने आता रहा है जिनमें उन्होंने इस प्रक्रिया को बेहद आध्यात्मिक बताया है। हालांकि मंदिर प्रशासन ने कभी भी इस ब्रह्म तत्व की वास्तविक प्रकृति के बारे में आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। इसलिए इसे धार्मिक आस्था और परंपरा के रूप में ही देखा जाता है।
पुरी का जगन्नाथ मंदिर दुनिया के उन चुनिंदा मंदिरों में शामिल है जहां भगवान की लकड़ी की प्रतिमाओं की पूजा की जाती है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा की प्रतिमाओं का स्वरूप भी अन्य मंदिरों से अलग है। यही विशेषता जगन्नाथ धाम को विश्वभर के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का एक अनूठा केंद्र बनाती है। हर वर्ष रथ यात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए पुरी पहुंचते हैं।
रथ यात्रा भगवान जगन्नाथ के सबसे बड़े उत्सवों में से एक है। इस दिन भगवान अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विशाल रथों में विराजमान होकर गुंडिचा मंदिर की यात्रा करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस यात्रा में श्रद्धा से शामिल होने या भगवान के रथ के दर्शन करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक शांति मिलती है। इसी कारण हर साल देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु इस पर्व का हिस्सा बनने पुरी पहुंचते हैं।
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।
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