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Muharram: वजह सिर्फ यह नहीं थी कि सत्ता किसके हाथ में जाएगी बल्कि असल सवाल यह था कि क्या एक ऐसा निज़ाम स्वीकार किया जाए जो इंसाफ, अमानतदारी और दीन की बुनियादी रूह से दूर जाता दिख रहा था।

Muharram History: मुहर्रम का महीना आते ही पूरी दुनिया के मुसलमानों के दिलों में कर्बला की याद ताज़ा हो जाती है। 10 मुहर्रम, जिसे आशूरा कहा जाता है, इस्लामी तारीख़ का वह दिन है जो सिर्फ एक जंग की याद नहीं दिलाता बल्कि सब्र, कुर्बानी, इंसाफ और हक़ पर डटे रहने का सबसे बड़ा पैग़ाम भी देता है। कर्बला का वाक़िआ (घटना) इसलिए इतना अहम है क्योंकि यह किसी सल्तनत, दौलत या जमीन के टुकड़े की लड़ाई नहीं थी। यह एक ऐसे उसूल (सिद्धांत) की हिफाज़त (रक्षा) की जंग थी जिसमें इमाम हुसैन ने ज़ुल्म के आगे झुकने के बजाय शहादत को चुना। आज भी जब कर्बला का नाम लिया जाता है तो सिर्फ एक तारीखी जंग याद नहीं आती बल्कि वह मंज़र सामने आ जाता है जब रेगिस्तान की तपती रेत पर एक छोटा-सा काफ़िला (दल) प्यास, तकलीफ़ और घेराबंदी के बावजूद अपने उसूलों से पीछे नहीं हटा। यही वजह है कि 10 मुहर्रम का दिन करोड़ों लोगों के लिए गहरे ग़म, इबरत (सीख) और रूहानी पैग़ाम का दिन माना जाता है।
कर्बला को समझने के लिए उसके पीछे की सियासी (राजनीतिक) और दीनी (धार्मिक) पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है। हजरत अली के दौर के बाद इस्लामी दुनिया में सत्ता को लेकर बड़ा बदलाव आया। बाद में मुआविया का शासन स्थापित हुआ। इतिहास में यह बात दर्ज मिलती है कि उनके बाद उनके बेटे यज़ीद को उत्तराधिकारी बनाया गया। यहीं से विवाद और गहरा हो गया क्योंकि इस्लाम के शुरुआती दौर में नेतृत्व का सवाल मशवरे और रज़ामंदी से जुड़ा माना जाता था। इमाम हुसैन, जो हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि (वसल्लम) के नवासे थे, उन्होंने यज़ीद की बैअत यानी राजनीतिक निष्ठा स्वीकार नहीं की। वजह सिर्फ यह नहीं थी कि सत्ता किसके हाथ में जाएगी बल्कि असल सवाल यह था कि क्या एक ऐसा निज़ाम स्वीकार किया जाए जो इंसाफ, अमानतदारी और दीन की बुनियादी रूह से दूर जाता दिख रहा था। इमाम हुसैन का मौक़िफ़ (रुख) साफ था अगर हक़ और बातिल (सत्य और असत्य) के बीच फर्क मिटने लगे तो खामोशी भी एक तरह की हामी बन जाती है।
इसी दौरान इराक के कूफा से इमाम हुसैन के पास कई खत पहुंचे। इन खतों में लोगों ने उनसे गुजारिश की कि वे आएं और उन्हें यज़ीद की हुकूमत के खिलाफ राह दिखाएं। इन पैग़ामों के बाद इमाम हुसैन अपने अहल-ए-खाना (परिवार) और वफ़ादार साथियों के साथ सफर पर निकले लेकिन हालात तेजी से बदल गए। कूफा में यज़ीद की तरफ से तैनात हुक्मरानों ने ऐसा माहौल बना दिया कि जिन लोगों ने इमाम को बुलाया था उनमें से बड़ी संख्या पीछे हट गई। सफर के दौरान इमाम हुसैन के काफ़िले को रोका गया और आखिरकार उन्हें कर्बला के मैदान में ठहरने पर मजबूर कर दिया गया। यही वह जगह थी जहां आगे चलकर इस्लामी इतिहास का सबसे दर्दनाक वाक़िआ पेश आया।
कर्बला पहुंचने के बाद इमाम हुसैन और उनके साथियों को एक ऐसे मैदान में रोक दिया गया जहां हालात दिन-ब-दिन मुश्किल होते चले गए। रिवायतों के मुताबिक, इमाम के साथ बहुत कम लोग थे जबकि सामने की फौज संख्या में कहीं ज्यादा थी। यही असमानता कर्बला की कहानी को और गहरा बना देती है एक तरफ ताकत, हथियार और सत्ता थी दूसरी तरफ एक छोटा-सा काफ़िला जो अपने यक़ीन और उसूल पर खड़ा था। मुहर्रम के शुरुआती दिनों में तनाव बढ़ता गया। फिर वह मोड़ भी आया जब फरात के पानी तक पहुंच रोक दी गई। कर्बला की दास्तां में प्यास का जिक्र सिर्फ एक हालात बताने के लिए नहीं आता बल्कि यह उस जुल्म की शिद्दत (तीव्रता) को दिखाता है जो इमाम हुसैन के खेमे पर ढाया गया। बच्चों की प्यास, औरतों की बेचैनी और साथियों की तकलीफ़ यह सब कर्बला की याद को और दर्दनाक बना देता है।
10 मुहर्रम की सुबह यानी आशूरा के दिन कर्बला का मैदान उस आखिरी मोड़ पर पहुंच चुका था जहां अब पीछे लौटने का रास्ता नहीं था। इमाम हुसैन ने आखिरी लम्हों तक कोशिश की कि लोगों को समझाया जाए कि वे किसके खिलाफ खड़े हैं। उन्होंने अपने नसब (वंश), अपने मक़सद और दीन की असल रूह को याद दिलाया। कर्बला की रिवायतों में यह बात बार-बार सामने आती है कि इमाम हुसैन की जंग सत्ता हासिल करने के लिए नहीं थी बल्कि इस बात की गवाही थी कि जुल्म को जुल्म कहा जाए चाहे कीमत कितनी ही बड़ी क्यों न हो। आशूरा के दिन एक-एक कर इमाम हुसैन के साथी मैदान में उतरे। उनके कई करीबी अज़ीज़ (प्रियजन), रिश्तेदार और साथी शहीद हुए। कर्बला की सबसे दर्दनाक यादों में हजरत अब्बास की वफ़ादारी, अली अकबर की शहादत और मासूम अली असगर का जिक्र शामिल है। यही वे लम्हे हैं जिनकी वजह से कर्बला सिर्फ इतिहास की किताबों में दर्ज एक घटना नहीं बल्कि एक जीती-जागती रूहानी याद बन गई।
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कर्बला की दास्तां में एक मंज़र ऐसा भी है जिसे याद करते ही आंखें नम हो जाती हैं। रिवायतों में आता है कि जब प्यास अपनी इंतिहा (चरम) पर पहुंच गई तो इमाम हुसैन अपने छह महीने के बेटे अली असगर को लेकर सामने आए। उन्होंने पानी की गुहार की लेकिन इसके जवाब में जो हुआ उसने कर्बला के ग़म को हमेशा के लिए और गहरा कर दिया। यही वजह है कि अली असगर का जिक्र कर्बला के सबसे दर्दनाक हिस्सों में किया जाता है। यहां कर्बला हमें सिर्फ एक जंग नहीं दिखाती बल्कि यह बताती है कि जब सत्ता इंसाफ से दूर हो जाए तो उसका जुल्म किन हदों तक जा सकता है। यही वह बिंदु है जहां कर्बला सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना नहीं रहती बल्कि इंसानियत के ज़मीर (अंतरात्मा) को झकझोर देने वाली मिसाल बन जाती है।
दिन ढलते-ढलते इमाम हुसैन के लगभग सभी साथी शहीद हो चुके थे। कर्बला की रिवायतों में यह दिन सब्र, बहादुरी और अटूट यक़ीन की इंतिहा के रूप में याद किया जाता है। आखिरकार वह लम्हा आया जब इमाम हुसैन खुद मैदान में रह गए। उन्होंने जुल्म के आगे सिर झुकाने के बजाय शहादत को चुना। 10 मुहर्रम 61 हिजरी, यानी 680 ईस्वी, का यही वह लम्हा है जिसने कर्बला को हमेशा के लिए इंसाफ और कुर्बानी की सबसे बड़ी मिसाल बना दिया। इमाम हुसैन की शहादत के बाद मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। रिवायतों के मुताबिक खेमों पर हमला हुआ, सामान लूटा गया और अहल-ए-बैत की औरतों और बच्चों को कैद की सूरत में आगे ले जाया गया।
अगर कर्बला की कहानी सिर्फ 10 मुहर्रम के मैदान तक सीमित रह जाती तो शायद उसका असर इतना दूर तक न जाता। लेकिन कर्बला के बाद जो कुछ हुआ, उसमें बीबी ज़ैनब और इमाम ज़ैनुलआबिदीन का किरदार बेहद अहम माना जाता है। उन्होंने ग़म, कैद और मुश्किल हालात के बावजूद कर्बला के पैग़ाम को ज़िंदा रखा। यह वही मरहला (चरण) था जहां शहादत की कहानी एक खामोश मातम बनकर नहीं रह गई बल्कि एक खुली गवाही बन गई कि जुल्म चाहे कुछ वक्त के लिए ताकतवर दिखे उसकी उम्र हमेशा लंबी नहीं होती। कर्बला के बाद दिए गए खुत्बों (भाषणों) और संदेशों ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर किया कि आखिर हक़ किसके साथ था और सत्ता किस रास्ते पर चल पड़ी थी। यही वजह है कि इमाम हुसैन की शहादत को सिर्फ एक दुखद घटना के तौर पर नहीं बल्कि इस्लामी इतिहास के नैतिक मोड़ के रूप में भी देखा जाता है।
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। चेतना मंच इनकी पुष्टि नहीं करता है।)
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