रमजान इस्लामिक कैलेंडर का सबसे पाक महीना है। इस दौरान मुसलमान सुबह की सहरी से लेकर शाम के इफ्तार तक रोज़ा रखते हैं। रोज़ा इंसान को अपने आप पर काबू पाने, नफ्स को नियंत्रित करने और गुनाहों से बचने की सीख देता है। हर किसी पर रोज़ा रखना वाजिब नहीं है।

रमजान (Ramadan) इस्लामी कैलेंडर का सबसे पाक महीना है जिसे मुसलमान बड़े ध्यान और इबादत के साथ मनाते हैं। इस दौरान सुबह की सहरी से लेकर शाम के इफ्तार तक रोज़ेदारों के लिए हर दिन खास होता है। रोज़ा इंसान को अपने आप पर काबू पाने, नफ्स को नियंत्रित करने और गुनाहों से बचने की सीख देता है लेकिन हर किसी पर रोज़ा रखना वाजिब नहीं है। इस आर्टिकल में जानिए रमजान के रोज़े के नियम और किसे छूट मिलती है।
इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार, साल का 9वां महीना रमजान होता है। इस महीने में रोज़े रखना और नमाज़ पढ़ना वाजिब है। रमजान की शुरुआत उस दिन होती है जब चांद नजर आता है। भारत में 19 फरवरी 2026 से रमजान शुरू हुआ। पूरे महीने में रोज़ेदारों को सहरी और इफ्तार का समय पालन करना अनिवार्य है। रोज़ा रखने का मकसद केवल भूख और प्यास सहना नहीं है बल्कि यह आत्मानुशासन, धैर्य और खुदा से करीबी बनाने की इबादत है।
रोज़ा हर उस व्यक्ति पर वाजिब है जो शारीरिक रूप से स्वस्थ और सक्षम है लेकिन कुछ लोगों को इस्लामी कानून के अनुसार रोज़ा रखने से छूट मिलती है।
बीमार और बुजुर्ग: जो लोग गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं या बुजुर्ग हैं उन्हें रोज़ा रखने की जरूरत नहीं है।
बच्चे: छोटे बच्चे रोज़ा नहीं रखते।
लंबी यात्रा पर जाने वाले: यात्रा के दौरान रोज़ा रखने से छूट है लेकिन यात्रा के बाद इसे पूरा करना जरूरी है।
लंबी बीमारी: अगर किसी को लगातार बीमारी है तो उसे रोज़ा रखने से छूट मिलती है और वो आवश्यकता अनुसार रोज़ा की कजा कर सकता है। ध्यान रखें कि ऐसे लोगों के लिए पेट भरकर खाना मकरूह माना गया है यानी जरूरत से ज्यादा खाना नहीं खाना चाहिए।
ऑफिस जाने से रोज़े पर कोई असर नहीं पड़ता। रोज़ा और रोजगार दोनों इबादत के रूप में स्वीकार हैं। इसलिए ऑफिस में काम करते हुए भी रोज़ा जारी रखा जा सकता है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। चेतना मंच इसकी पुष्टि नहीं करता है।)