रोजेदार खजूर से ही क्यों खोलते हैं रोजा? क्या आप जानते हैं इसकी हकीकत?

Ramadan Mubarak: रमजान के पाक महीने में मुसलमान रोजा रखते हैं और इफ्तार में खजूर से रोजा खोलते हैं। खजूर खाने के पीछे पैगंबर मोहम्मद (PBUH) की सुन्नत और स्वास्थ्य संबंधी फायदे हैं। यह शरीर को तुरंत ऊर्जा देता है और रोजेदारों को दिनभर की थकान से बचाता है।

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खजूर से ही क्यों खोला जाता है रोजा?
locationभारत
userअसमीना
calendar20 Feb 2026 05:03 PM
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रमजान इस्लामिक कैलेंडर का सबसे पाक महीना है और मुस्लिम समुदाय के लिए यह समय इबादत, दान-पुण्य और आत्म-संयम का होता है। इस दौरान सुबह से लेकर शाम तक रोजेदार भूखे-प्यासे रहते हैं और रोजा रखते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि रोजा खोलते समय मुसलमान सबसे पहले खजूर क्यों खाते हैं? आइए जानते हैं इस परंपरा और इसके पीछे की वजह।

पैगंबर-ए-इस्लाम की सुन्नत

इस्लाम में खजूर से रोजा खोलना सुन्नत माना जाता है। सुन्नत वे कार्य हैं जिन्हें पैगंबर हज़रत मोहम्मद (PBUH) ने किया और लोगों को पालन करने की सलाह दी। कहा जाता है कि पैगंबर हमेशा खजूर खाकर रोजा खोलते थे। यही कारण है कि आज भी दुनिया भर के मुसलमान इस परंपरा का पालन करते हैं।

एक मुबारक फल है खजूर

खजूर को सिर्फ स्वादिष्ट नहीं बल्कि मुबारक (आशीर्वाद) फल भी माना जाता है। इसे खाने से बरकत आती है और यह इबादत का हिस्सा बन जाता है। यदि किसी कारणवश खजूर उपलब्ध न हो तो पानी पीकर भी रोजा खोलना सही माना जाता है।

शरीर को तुरंत एनर्जी देता है खजूर

रोजा रखने के दौरान शरीर का शुगर लेवल कम हो जाता है। खजूर में ग्लूकोज, सुक्रोज और फ्रुक्टोज जैसी नेचुरल शुगर होती है जो शरीर को तुरंत ऊर्जा देती है। इसके अलावा खजूर में फाइबर भी होता है जो पाचन के लिए अच्छा है। इसीलिए खजूर इफ्तार में रोजेदारों को तुरंत थकान से राहत देता है। रमजान केवल भूख और प्यास सहने का महीना नहीं है। यह हमें दान-पुण्य, अनुशासन और दया सिखाता है। खजूर से रोजा खोलना इस बात का प्रतीक भी है कि इबादत के साथ शरीर और आत्मा दोनों को संतुलित रखा जाए।

रोजा खोलने की परंपरा

रोजेदार जब खजूर से रोजा खोलते हैं तो न केवल पैगंबर की सुन्नत का पालन होता है बल्कि यह शरीर को भी तुरंत ताकत देता है। यह परंपरा दिखाती है कि धर्म और स्वास्थ्य एक साथ संतुलित रह सकते हैं।

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रमजान इस्लामिक कैलेंडर का सबसे पाक महीना है। इस दौरान मुसलमान सुबह की सहरी से लेकर शाम के इफ्तार तक रोज़ा रखते हैं। रोज़ा इंसान को अपने आप पर काबू पाने, नफ्स को नियंत्रित करने और गुनाहों से बचने की सीख देता है। हर किसी पर रोज़ा रखना वाजिब नहीं है।

Ramzan Mubarak
रोजा कौन नहीं रख सकता?
locationभारत
userअसमीना
calendar20 Feb 2026 04:01 PM
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रमजान (Ramadan) इस्लामी कैलेंडर का सबसे पाक महीना है जिसे मुसलमान बड़े ध्यान और इबादत के साथ मनाते हैं। इस दौरान सुबह की सहरी से लेकर शाम के इफ्तार तक रोज़ेदारों के लिए हर दिन खास होता है। रोज़ा इंसान को अपने आप पर काबू पाने, नफ्स को नियंत्रित करने और गुनाहों से बचने की सीख देता है लेकिन हर किसी पर रोज़ा रखना वाजिब नहीं है। इस आर्टिकल में जानिए रमजान के रोज़े के नियम और किसे छूट मिलती है।

रमजान का महत्व

इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार, साल का 9वां महीना रमजान होता है। इस महीने में रोज़े रखना और नमाज़ पढ़ना वाजिब है। रमजान की शुरुआत उस दिन होती है जब चांद नजर आता है। भारत में 19 फरवरी 2026 से रमजान शुरू हुआ। पूरे महीने में रोज़ेदारों को सहरी और इफ्तार का समय पालन करना अनिवार्य है। रोज़ा रखने का मकसद केवल भूख और प्यास सहना नहीं है बल्कि यह आत्मानुशासन, धैर्य और खुदा से करीबी बनाने की इबादत है।

रोज़े में किसे छूट है?

रोज़ा हर उस व्यक्ति पर वाजिब है जो शारीरिक रूप से स्वस्थ और सक्षम है लेकिन कुछ लोगों को इस्लामी कानून के अनुसार रोज़ा रखने से छूट मिलती है।

बीमार और बुजुर्ग: जो लोग गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं या बुजुर्ग हैं उन्हें रोज़ा रखने की जरूरत नहीं है।

बच्चे: छोटे बच्चे रोज़ा नहीं रखते।

लंबी यात्रा पर जाने वाले: यात्रा के दौरान रोज़ा रखने से छूट है लेकिन यात्रा के बाद इसे पूरा करना जरूरी है।

लंबी बीमारी: अगर किसी को लगातार बीमारी है तो उसे रोज़ा रखने से छूट मिलती है और वो आवश्यकता अनुसार रोज़ा की कजा कर सकता है। ध्यान रखें कि ऐसे लोगों के लिए पेट भरकर खाना मकरूह माना गया है यानी जरूरत से ज्यादा खाना नहीं खाना चाहिए।

रोज़े में क्या करें और क्या नहीं?

  • रोज़ा सिर्फ भूख और प्यास सहने का नाम नहीं है। इसे इबादत के रूप में देखा जाता है।
  • कुरान-ए-मजीद पढ़ें और मज़हबी किताबों का अध्ययन करें।
  • नेक बातें और नसीहत सुनें और दुआओं में मशगूल रहें।
  • रोज़ा रखने के दौरान सांस लेना भी इबादत का हिस्सा है।

रोज़ा रखते हुए ऑफिस जाएं तो क्या करें?

ऑफिस जाने से रोज़े पर कोई असर नहीं पड़ता। रोज़ा और रोजगार दोनों इबादत के रूप में स्वीकार हैं। इसलिए ऑफिस में काम करते हुए भी रोज़ा जारी रखा जा सकता है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। चेतना मंच इसकी पुष्टि नहीं करता है।)

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Taraweeh: रमज़ान का महीना इस्लाम धर्म में सबसे पाक और पवित्र माना जाता है। इस दौरान मुसलमान अल्लाह की इबादत करते हैं और रोज़ा रखते हैं। रमज़ान में तरावीह की नमाज़ पढ़ना विशेष महत्व रखता है। यह नमाज़ ईशा की नमाज़ के बाद अदा की जाती है और इसमें कुल 20 रकात होती हैं।

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तरावीह कैसे पढ़ें
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userअसमीना
calendar19 Feb 2026 01:14 PM
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रमज़ान (Ramadan) इस्लाम धर्म का सबसे पाक महीना माना जाता है। रमज़ान के पाक महीने में मुसलमान अल्लाह की इबादत करते हैं और रोज़ा रखते हैं। रमज़ान सिर्फ भूख और प्यास सहने का महीना नहीं है बल्कि यह आत्मा की सफाई और खुदा के करीब जाने का खास मौका भी है। माह-ए-रमज़ान में लोग अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं और अल्लाह की बरकत पाने के लिए रोज़ाना नमाज़ और तरावीह पढ़ते हैं।

क्या होती है तरावीह?

तरावीह की नमाज़ ईशा के बाद अदा की जाती है और इसका मकसद सिर्फ अल्लाह की इबादत करना नहीं बल्कि कुरआन की तिलावत करना और दिल को सुकून देना भी है। पुरुषों के लिए तरावीह 20 रकात होती है जबकि महिलाओं के लिए 10 रकात सही मानी जाती हैं। इस नमाज़ में हर 2-4 रकात के बाद दुआ पढ़ना जरूरी माना जाता है ताकि इसका सवाब पूरा मिल सके।

तरावीह की दुआ पढ़ना बेहद जरूरी

तरावीह की दुआ का पढ़ना भी उतना ही अहम है जितना रोज़े की दुआ का पढ़ना। दुआ बिना पढ़े तरावीह का सवाब कम हो जाता है और इसे सही तरीके से पढ़ने का महत्व भी कम हो जाता है। इस दौरान अल्लाह से अपने दिल की इच्छाओं और जरूरतों की प्रार्थना करना चाहिए ताकि वह हमारी इबादत को स्वीकार करें और हमें बरकत दें।

तरावीह की दुआ हिंदी में (Taraweeh ki Dua in Hindi)

सुबहान ज़िल मुल्कि वल मलकूत, सुब्हान ज़िल इज्ज़ति वल अज़मति वल हय्बति वल कुदरति वल किबरियाई वल जबरूत, सुबहानल मलिकिल हैय्यिल लज़ी ला यनामु वला यमुतू सुब्बुहून कुददुसुन रब्बुना व रब्बुल मलाइकति वर रूह, अल्लाहुम्मा अजिरना मिनन नारि या मुजीरू या मुजीरू या मुजीर।

Taraweeh ki Dua in Urdu

سبحان ذي الملك و الملكوت سبحان ذي العزة و الجبروت سبحان الحي الذي لا يموت

سبحان الذي خضعت لعظمته الرقاب سبحان الذي ذلت لجبروته الصعاب سبحان رب الأرباب مسبب الأسباب

तरावीह की नमाज़ की नियत कैसे करें?

तरावीह की नमाज़ की नियत पुरुषों और महिलाओं के लिए थोड़ी अलग होती है। पुरुषों को यह कहते हुए पढ़ना चाहिए:

"मैं दो रकात सुन्नत तरावीह अल्लाह तआला के वास्ते पढ़ रहा हूं, वक्त ईशा का, मुंह काबा की तरफ, अल्लाहु अकबर"।

महिलाओं के लिए नियत होती है-

"मैं दो रकात सुन्नत तरावीह अल्लाह तआला के वास्ते पढ़ रही हूं, वक्त ईशा का, मुंह काबा की तरफ, अल्लाहु अकबर"।

यह नियत मन और इरादे दोनों को तैयार करती है ताकि नमाज़ सही तरीके से अदा हो। घर पर पढ़ते समय हर 2 रकात में कुरान की 10 सूरतें पढ़ी जा सकती हैं। अगर मस्जिद में पढ़ रहे हैं तो इमाम (नमाज़ पढ़ाने वाला) कुरआन पढ़ता है और पीछे वाले उसका पालन करते हैं। महिलाओं के लिए घर पर पढ़ना ही सबसे सही माना गया है। इस नमाज़ को रोजाना पढ़ना चाहिए ताकि पूरे रमज़ान का सवाब मिले।

तरावीह नमाज़ के फायदे क्या है?

तरावीह की नमाज़ के फायदे भी बहुत हैं। कुरआन की तिलावत से दिल को सुकून मिलता है और पढ़ते समय इंसान खुद को अल्लाह के करीब महसूस करता है। इफ्तार के बाद तरावीह पढ़ना शरीर को हल्की व्यायाम भी देता है और रात के समय मन और शरीर दोनों को ताजगी मिलती है।

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