स्थानों तथा योजनाओं के नाम बदलकर क्या साबित कर रही है सरकार

भारत सरकार ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के प्रचलित नाम को बदलकर सेवा तीर्थ कर दिया है। ऐसे में यह सवाल उठना जरूरी है कि नाम बदलने से क्या होगा? भारत सरकार के नाम बदलने वाले अभियान का हमने पूरा विश्लेषण किया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar14 Jan 2026 04:14 PM
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Name Change Policy of Modi Government : भारत में स्थानों, सडक़ों, शहरों, सरकारी दफ्तरों, रेलवे स्टेशनों तथा सरकारी योजनाओं का नाम बदलने का बड़ा अभियान चल रहा है। भारत सरकार ने तो ऐतिहासिक स्थानों के नाम बदलने का रिकार्ड ही कायम कर डाला है। भारत सरकार ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के प्रचलित नाम को बदलकर सेवा तीर्थ कर दिया है। ऐसे में यह सवाल उठना जरूरी है कि नाम बदलने से क्या होगा? भारत सरकार के नाम बदलने वाले अभियान का हमने पूरा विश्लेषण किया है।

आपको समझाने के लिए कम शब्दों में पूरा विश्लेषण

भारत सरकार के नाम बदलने वाले अभियान के पीछे क्या सोच है। स्थानों तथा योजनाओं के नाम बदलने के विषय में भारत सरकार की क्या सोच है? नाम बदलने को लेकर विपक्षी दल क्या सोचते हैं? भारत सरकार द्वारा नाम बदलने के अभियान के विषय में भारत के आम नागरिकों की क्या सोच है? इन सभी सवालों के विषय में हमने पूरा विश्लेषण किया है। यह पूरा विश्लेषण हम बेहद कम शब्दों में आप तक पहुंचा रहे हैं।

नाम बदलने की राजनीति या नई प्रशासनिक सोच?

मोदी सरकार की ‘नेम चेंज पॉलिसी’ का गहन विश्लेषण

भारत में स्थानों, इमारतों और संस्थानों के नाम बदलने की परंपरा नई नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यह प्रक्रिया एक स्पष्ट वैचारिक नीति के रूप में उभर कर सामने आई है। राजपथ से कर्तव्य पथ, रेसकोर्स रोड से लोक कल्याण मार्ग और अब प्रधानमंत्री कार्यालय से सेवा तीर्थ—ये सभी बदलाव केवल नाम नहीं, बल्कि शासन की सोच और दिशा को दर्शाने वाले प्रतीक बन गए हैं।

1. ‘सत्ता’ से ‘सेवा’ की ओर: नामों के पीछे का दर्शन

मोदी सरकार का दावा है कि ये नाम परिवर्तन औपनिवेशिक और शासक-केंद्रित सोच से हटकर लोक-सेवा और कर्तव्य-बोध की भावना को मजबूत करने के लिए किए गए हैं।

        PMO ➝ सेवा तीर्थ

यह संदेश देता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय सत्ता का केंद्र नहीं, बल्कि जनता की सेवा का तीर्थ है।

      राजपथ ➝ कर्तव्य पथ

सत्ता के प्रदर्शन के मार्ग को जिम्मेदारी और कर्तव्य के प्रतीक में बदला गया।

    रेसकोर्स रोड ➝ लोक कल्याण मार्ग

शासक की निजी सुविधा से जनता के कल्याण की प्राथमिकता का संकेत।

👉 विश्लेषण:

यह बदलाव एक तरह से प्रशासनिक शब्दावली को value-driven governance से जोड़ने की कोशिश है।

2. औपनिवेशिक विरासत से मुक्ति का प्रयास

सरकार का तर्क है कि कई नाम ब्रिटिश काल की मानसिकता को दर्शाते थे—


·       राज, पथ, रेसकोर्स, दरबार जैसे शब्द सत्ता और शासक वर्ग को प्राथमिकता देते हैं।


·        नए नामों में लोक, कर्तव्य, सेवा, कल्याण जैसे शब्द शामिल किए गए।


👉 विश्लेषण:

यह प्रक्रिया उसी श्रृंखला का हिस्सा है जिसमें


·         इंडियागेट के पास नेताजी की प्रतिमा,


·         संसद में लोकतांत्रिक प्रतीकों का पुनर्संयोजन,


·         और नई संसद भवन की अवधारणा शामिल है।


📊 3. क्या यह केवल प्रतीकात्मक राजनीति है?

विपक्ष और आलोचक सवाल उठाते हैं—


·         क्या नाम बदलने से बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे हल होंगे?


·         क्या करोड़ों रुपये खर्च कर नाम बदलना प्राथमिकता होनी चाहिए?


👉 जवाबी विश्लेषण:

समर्थकों का कहना है कि


·         हर समाज को अपने प्रतीकों और नैरेटिव की जरूरत होती है।


·         जैसे संविधान, ध्वज और राष्ट्रगान प्रतीक हैं—वैसे ही सार्वजनिक नाम भी।


नाम बदलना policy execution नहीं, बल्कि policy narrative का हिस्सा है।


🗳️ 4. राजनीतिक लाभ और चुनावी मनोविज्ञान

नाम परिवर्तन की नीति का एक राजनीतिक पक्ष भी है—


·         यह राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की भावना को मजबूत करती है।


·         यह सरकार के कोर वोटबेस को यह संदेश देती है कि “हम पहचान वापस ला रहे हैं।”


👉 विश्लेषण:

यह नीति


·         भावनात्मक जुड़ाव (emotional connect) बनाती है,


·         और सरकार की strong leadership image को पुष्ट करती है।


🏗️ 5. प्रशासनिक स्तर पर प्रभाव

प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार—


·         नई इमारतें, नए नाम और नई संरचनाएं वर्क कल्चर बदलने का प्रयास हैं।


·         ‘कर्तव्य भवन’ या ‘सेवा तीर्थ’ जैसे नाम कर्मचारियों को उनके रोल की याद दिलाते हैं।


👉 विश्लेषण:

हालांकि नाम बदलने से कार्यक्षमता अपने-आप नहीं बढ़ती,

लेकिन यह संस्थागत सोच को प्रभावित जरूर करता है।


🌍 6. अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में भारत की छवि

दुनिया के कई देशों में—


·         दक्षिण अफ्रीका, रूस, तुर्की जैसे देशों ने भी

सत्ता परिवर्तन के बाद नाम और प्रतीक बदले।


👉 विश्लेषण:

भारत भी अब खुद को


·         एक Post-colonial confident nation


·         और civilizational state के रूप में पेश कर रहा है।


🧠 7. जनता क्या सोचती है?

जन-प्रतिक्रिया बंटी हुई है—


✔️ एक वर्ग इसे गर्व और आत्मसम्मान से जोड़ता है

❌ दूसरा वर्ग इसे ध्यान भटकाने की राजनीति मानता है


👉 सच यह है

नाम बदलना न तो चमत्कार है, न ही पूरी तरह निरर्थक—

यह एक वैचारिक संदेश है, जिसका असर समय के साथ आंका जाएगा।


📌 निष्कर्ष: नाम से आगे की यात्रा

मोदी सरकार की Name Change Policy को केवल समर्थन या विरोध की नजर से देखना पर्याप्त नहीं।

यह नीति—


·         भारत की राजनीतिक भाषा,


·         प्रशासनिक प्रतीकों


·         और सांस्कृतिक आत्म-बोध

को नया आकार देने की कोशिश है।


अब असली परीक्षा यह है कि

क्या ‘सेवा’ और ‘कर्तव्य’ सिर्फ नामों में रहेंगे,

या शासन के व्यवहार में भी दिखेंगे? Name Change Policy of Modi Government


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जो इंसानों के लिए कभी नहीं हुआ वह कुत्तों के लिए हो गया

मंगलवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता ने खुद कहा कि जितनी लम्बी बहस कुत्तों के ऊपर सुनी है उतनी लम्बी बहस उन्होंने कभी भी इंसानों के ऊपर नहीं सुनी।

आवारा कुत्तों के बढ़ते हमले पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
आवारा कुत्तों के बढ़ते हमले पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar14 Jan 2026 03:59 PM
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Supreme Court stray dogs case : भारत में इन दिनों कुत्ते बहुत खास हो गए हैं। भारत के सुप्रीम कोर्ट से लेकर सडक़ तक कुत्तों की ही चर्चा हो रही है। आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि भारत में जो काम इंसानों के लिए कभी नहीं हुआ वही काम भारत के कुत्तों के लिए हो गया है। इतना ही नहीं भारत की सबसे बड़ी अदालत यानि भारत का सुप्रीम कोर्ट कुत्तों के लिए लड़ाई लडऩे वाली सबसे बड़ी संस्था बन गई है।

इंसानों की बजाय कुत्तों पर मेहरबान हुआ सुप्रीम कोर्ट

आपको बता दें कि भारत के सुप्रीम कोर्ट में पिछले 6 महीने से कुत्तों का मामला छाया हुआ है। यह मामला आवारा कुत्तों से जुड़ा हुआ है। सडक़ों पर घूमने वाले आवारा कुत्तों को लेकर भारत के सुप्रीम कोर्ट में इतनी लम्बी बहस हो चुकी है जितनी लम्बी बहस भारत में कभी इंसानों के लिए नहीं हुई। मंगलवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता ने खुद कहा कि जितनी लम्बी बहस कुत्तों के ऊपर सुनी है उतनी लम्बी बहस उन्होंने कभी भी इंसानों के ऊपर नहीं सुनी।

आवारा कुत्तों को खाना खिलाना पड़ेगा भारी

आवारा कुत्तों को लेकर भारत के सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक बड़ा फैसला सुनाया। देशभर में लावारिस कुत्तों के काटने की बढ़ती घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि अब ऐसे मामलों में राज्य सरकार और स्थानीय नगरीय निकायों को भारी मुआवजा चुकाना होगा। अदालत ने कहा, कुत्ते के काटने पर उन्हें खाना खिलाने वाले लोगों और संगठनों की भी जवाबदेही तय की जाएगी। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की विशेष पीठ इस मुद्दे पर स्वत:संज्ञान लेकर सुनवाई कर रही थी। जस्टिस नाथ ने कहा, लावारिस कुत्ते के हमले में किसी बच्चे या बुजुर्ग की मौत होती है या वह गंभीर जख्मी होता है, तो हम तय करेंगे कि राज्य सरकार और स्थानीय निकाय उन्हें भारी मुआवजा दें, क्योंकि उन्होंने कोते पांच साल में नियम लागू करने कौ अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई है। जस्टिस नाथ ने कुत्तों को खाना खिलाने वालों को भी चेतावनी दी, यदि वे इन जानवरों की चिंता करते हैं, तो उन्हें अपने घरों में रखें। सडक़ों पर खुला छोडक़र लोगों की डराने और काटने देना मंजूर नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने उठाया जिम्मेदारी का बड़ा सवाल

इस दौरान सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संदीप मेहता ने भी चिंता जताते हुए पूछा, जब नौ साल का बच्चा कुत्ते के हमले का शिकार होता है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा। आप चाहते हैं कि हम आंखें मूंद लें। लावारिस कुत्ते किसी के स्वामित्व में नहीं होते और यदि कोई उन्हें पालना चाहता है, तो उसे कानून के तहत लाइसेंस लेकर पालतू बनाना चाहिए। पीठ नवंबर, 2025 में दिए अपने आदेश के अनुपालन की निगरानी कर रही है, जिसमें बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, अस्पताल, स्कूल, कॉलेज और अन्य सार्वजनिक संस्थानों से लावारिस कुत्तों को हटाने के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया था कि कुत्तों का टीकाकरण और नियमों के तहत नसबंदी की जाए और उन्हें उसी स्थान पर वापस न छोड़ा जाए। Supreme Court stray dogs case


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भारत में बहुत तेजी से फैल रहा है शुगर डैडी का चलन

शुगर डैडी दिल खोल कर पैसे खर्च कर सकता है और शुगर बेबी को ज़रूरत है पैसों की। यूरोप, यूएस और अफ्रीका में ऐसी लड़कियों की तादाद बढ़ती जा रही है, जो डेटिंग के लिए लडकों के साथ नहीं, बल्कि बूढ़ों के साथ जाना पसंद करती हैं। अब यह प्रचलन भारत में भी तेजी से बढ़ रहा है।

शुगर डैडी ट्रेंड
शुगर डैडी ट्रेंड
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar12 Jan 2026 04:25 PM
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Sugar Daddy : भारत की संस्कृति तथा सभ्यता का इतिहास वर्षों पुराना है। पश्चिमी देशों में फैल चुके शुगर डैडी (Sugar Daddy) के प्रचलन की आहट पूरे भारत में सुनाई दे रही है। बताया जा रहा है कि शुगर डैडी (Sugar Daddy का प्रचलन भारत में बहुत तेजी के साथ फैल रहा है। शुगर डैडी (Sugar Daddy) वाली सोच तथा यह पश्चिमी पैशन भारत की संस्कृति तथा सभ्यता से बिल्कुल भी मेल नहीं खाता है। ऐसे में भारत में बढ़ते हुए शुगर डैडी (Sugar Daddy) के प्रचलन ने समाज की चिंता बढ़ा दी है।

शुगर डैडी (Sugar Daddy) किसे कहते हैं?

आपको हम यहां विस्तार से बता देते हैं कि शुगर डैडी (Sugar Daddy)किसे कहते हैं। दरअसल शुगर डैडी (Sugar Daddy) का कान्सेप्ट पश्चिमी सभ्यता वाले देशों से शुरू होकर भारत तक आया है। पहले तो शुगर डैडी का प्रचलन भारत के बड़े शहरों तक ही सीमित था। धीरे-धीरे शुगर डैडी वाला प्रवचन भारत के छोटे शहरों तक भी फैल गया है। भारत के तमाम बड़े तथा छोटे शहरों में शुगर डैडी बड़ी संख्या में सक्रिय हैं। भारत के छोटे-बड़े शहरों में शुगर डैडी की संख्या को जानने से पहले शुगर डैडी (Sugar Daddy) को जानना जरूरी है। आखिर कौन होता है शुगर डैडी। हम यहां आपको शुगर डैडी के विषय में विस्तार से बता रहे हैं। शुगर डैडी को जान लेने के बाद आपके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहेगा। आपको बता दें कि शुगर डैडी डेटिंग का एक नया नाम है। भारत में तो डेटिंग शब्द भी नया ही है। Sugar Daddy इसलिए बताते चलें कि अपनी शारीरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए स्त्री तथा पुरूष कुछ समय के लिए आपस में मिलते हैं। इस मिलने-जुलने को डेटिंग कहा जाता है। डेटिंग के अनेक तरीके इजाद हुए है। इन्हीं तरीकों में से डेटिंग के एक तरीके का नाम है शुगर डैडी। “शुगर डैडी” एक ऐसा बुजुर्ग होता है जिसके पास खूब धन होता है। इसी धन के बलबूते पर बुजुर्ग अपने से बहुत कम उम्र की लडक़ी के साथ घूमता, फिरता तथा डेटिंग करता है। ऐसे बुजुर्ग को लड़कियां शुगर डैडी (Sugar Daddy) नाम से बुलाती हैं। जो लड़कियां इस प्रकार की डेटिंग करती हैं उन लड़कियों को शुगर बेबी कहा जाता है। डेटिंग का यह नया रूप Sugar Daddy खूब ट्रेंड कर रहा है। जहां एक अमीर, लेकिन उम्रदराज शख़्स रिलेशन रखता है अपने से छोटी लडक़ी से। शुगर डैडी दिल खोल कर पैसे खर्च कर सकता है और शुगर बेबी को ज़रूरत है पैसों की। यूरोप, यूएस और अफ्रीका में ऐसी लड़कियों की तादाद बढ़ती जा रही है, जो डेटिंग के लिए लडकों के साथ नहीं, बल्कि बूढ़ों के साथ जाना पसंद करती हैं। अब यह प्रचलन भारत में भी तेजी से बढ़ रहा है। 

भारत में शुगर डैडी के साथ ही बढ़ रही हैं शुगर बेबी 

शुगर डैडी (Sugar Daddy) की साथी को शुगर बेबी (Sugar Baby) कहा जाता है। शुगर डैडी (Sugar Daddy) तथा शुगर बेबी के रिश्ते की ख़ासियत है कि यह शॉर्ट टर्म होता है। इसे दोनों तरफ से लिया जाता है एक बिजनेस अथवा धंधे की तरह। अगर शुगर बेबी को कोई दूसरा अमीर आदमी मिलता है और पहले वाले शुगर डैडी के पास समय नहीं है, तो वह शिफ्ट हो जाती है। यह रिश्ता चलता है घंटों के हिसाब से। इसमें तय कर लिया जाता है कि शुगर डैडी को कितने घंटे का साथ चाहिए और किस समय। इससे शुगर बेबी (Sugar Baby) एक ही दिन में कई-कई लोगों के साथ रिलेशनशिप मेंटेन कर पाती है। इस रिलेशनशिप की अवधि इस बात पर भी निर्भर करती है कि शुगर डैडी कितनी जिम्मेदारी संभाल कर चल रहा है शुगर बेबी की। युवा लड़कियां मानती हैं कि उनके साथियों में करीब 24 फ़ीसदी साथियों के शुगर डैडी हैं। एशियन ट्रेंड को देखें, तो शुगर डैडी और शुगर बेबी आपस में सोशल नेटवर्किंग साइट्स और सोशल मीडिया के ज़रिए कनेक्ट होते हैं। दुनियाभर में पॉपुलर ‘शुगर डैडी फॉर मी’ डेटिंग वेबसाइट पर इस समय करीब 5 करोड़ यूजर हैं। आपको बता दें कि इस प्रकार के रिश्तों में शुगर डैडी इसलिए आपसे जुड़ता है, क्योंकि वह अपनी पर्सनल लाइफ से खुश नहीं होता। ऐसे में वह अधिकतर समय अपनी दिक्कतें शेयर करता रहता है। वहीं, शुगर बेबी का काम है उन समस्याओं को सुनना और शुगर डैडी को रिलैक्स करना। इससे फर्क नहीं पड़ता कि लडक़ी ख़ुद किस तरह की मानसिक परेशानी से गुजर रही है। ऐसे रिश्ते में भावनात्मक सहारा नहीं मिल पाता। एकतरफा होता है यह रिश्ता। पैसों से जुड़ा होने की वजह से ज्यादातर केस में शुगर डैडी मल्टीपल रिलेशनशिप में होते हैं। ऐसे में मल्टीपल पार्टनर के साथ सेक्स करने से कई तरह की सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज होने की आशंका बढ़ जाती है। Sugar Daddy भारत में शुगर डैडी तथ शुगर बेबी (Sugar Daddy and Sugar Baby) का चलन नया नया है। समाजशास्त्री बताते हैं कि यह चलन भारत में तेजी से बढ़ रहा है। शुगर डैडी व शुगर बेबी के बढ़ते हुए चलन से भारत में समाज के सभी तबके चिंतित हैं। लोगों का कहना है कि शुगर डैडी (Sugar Daddy) तथा शुगर बेबी वाला चलन भारतीय सभ्यता के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है। भारत में रिश्ते-नातों की पवित्रता का विशेष महत्व रहा है। ऐसे में Sugar Daddy जैसा प्रचलन भारतीय समाज की चिंता का बड़ा कारण बन गया है। कुछ समाजसेवी संगठनों ने शुगर डैडी तथा शुगर बेबी वाले प्रचलन को तुरंत बंद करने की मांग की है।

भारत के छोटे शहरों तक फैल गया है शुगर डैडी का प्रचलन

आपको बता दें कि भारत में शुगर डैडी (Sugar Daddy) का प्रचलन बड़े शहरों में ज्यादा था। धीरे-धीरे शुगर डैडी का प्रचलन भारत के छोटे शहरों तक फैल गया है। भारत की राजधानी दिल्ली की बगल में स्थित नोएडा जैसे शहर में 50 से अधिक शुगर डैडी (Sugar Daddy) सक्रिय हैं। यही हाल दिल्ली-NCR के ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद, मेरठ, फरीदाबाद तथा पलवल जैसे शहरों का भी है। शुगर डैडी बनकर मौज-मस्ती करने वाले 58 वर्ष के एक व्यक्ति ने चेतना मंच को बताया कि मौज-मस्ती के लिए शुगर डैडी बनना बहुत अच्छा अनुभव है। उसने बताया कि शुगर डैडी (Sugar Daddy) बनने तथा शुगर बेबी तलाश करने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं होती है। शुगर डैडी (Sugar Daddy) बनने के लिए इंटरनेट पर वेबसाइट तथा एप मौजूद हैं। इनमें से सर्वाधिक लोकप्रिय वेबसाइट का नाम “शुगर डैडी फॉर मी” है। इस वेबसाइट के 6 करोड़ से भी अधिक यूजर हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि दुनिया में करोड़ों की संख्या में शुगर डैडी मौजूद हैं। इस वेबसाइट के अलावा “माई शुगर डैडी डॉट कॉम”तथा “शुगर डैडी मीट”आदि विभिन्न नामों से शुगर डैडी (Sugar Daddy) तथा शुगर बेबी बनने के लिए दो दर्जन से अधिक वेबसाइट तथा एप इंटरनेट पर मौजूद हैं। अब आप जान गए हैं कि कौन होता है शुगर डैडी? शुगर डैडी का ट्रेंड भारत में तेजी के साथ फल-फूल रहा है। शुगर डैडी वाला यह चलन बॉयफ्रेंड वाले चलन पर भारी पड़ रहा है। एक समय में बॉयफ्रेंड वाला प्रचलन भी भारत के लिए बिल्कुल नया प्रचलन था। वर्तमान में बॉयफ्रेंड का प्रचलन खूब चल रहा है। इसी प्रकार भविष्य में शुगर डैडी का प्रचलन भी तेजी के साथ बढ़ेगा।   Sugar Daddy