हर किसी को जानना चाहिए भारतीय जनता पार्टी का इतिहास

प्रत्येक राजनीतिक कार्यकर्ता के लिए भाजपा का इतिहास बहुत महत्वपूर्ण है। राजनीति को जानने तथा समझने वाले प्रत्येक नागरिक को भारतीय जनता पार्टी का इतिहास जरूर जानना चाहिए।

भारतीय जनता पार्टी का इतिहास
भारतीय जनता पार्टी का इतिहास
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar21 Jan 2026 03:15 PM
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BJP History : भारतीय जनता पार्टी, बीजेपी - ये तीनों नाम भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के नाम हैं। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को 12वें अध्यक्ष के रूप में नितिन नवीन नए राष्ट्रीय अध्यक्ष मिले हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर नितिन नवीन के आने के साथ ही भाजपा के इतिहास की भी खूब चर्चा हो रही है। प्रत्येक राजनीतिक कार्यकर्ता के लिए भाजपा का इतिहास बहुत महत्वपूर्ण है। राजनीति को जानने तथा समझने वाले प्रत्येक नागरिक को भारतीय जनता पार्टी का इतिहास जरूर जानना चाहिए।

भारत की राजनीति की तरह ही पुराना है भाजपा का इतिहास

भारत में राजनीति का बहुत पुराना इतिहास है। इसी प्रकार भारतीय जनता पार्टी का इतिहास भी बहुत पुराना है। भारतीय जनता पार्टी के रूप में इस पार्टी को बने हुए मात्र 45 साल हुए हैं, किंतु भारतीय जनता पार्टी इससे पहले भारतीय जनसंघ के नाम से भी लंबी राजनीतिक पारी खेल चुकी है। वर्तमान भारतीय जनता पार्टी की स्थापना 6 अप्रैल 1980 को हुई थी। भारतीय जनता पार्टी के पूरे इतिहास की बात करें तो इस पार्टी की स्थापना भले ही 6 अप्रैल 1980 को हुई थी, किंतु इससे पहले 21 अक्टूबर 1951 को भारतीय जनसंघ के रूप में जिस दल का गठन हुआ था, उसी जंक्शन से भारतीय जनता पार्टी बनाई गई।

भाजपा से पहले बनी भारतीय जनसंघ पार्टी

भारतीय जनता पार्टी की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी का गठन भले ही 6 अप्रैल, 1980 को हुआ हो, परन्तु इसका इतिहास भारतीय जनसंघ से जुड़ा हुआ है। स्वतंत्रता प्राप्ति तथा देश विभाजन के साथ ही देश में एक नई राजनीतिक परिस्थिति उत्पन्न हुई। गांधीजी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाकर देश में एक नया राजनीतिक षड्यंत्र रचा जाने लगा। सरदार पटेल के देहावसान के पश्चात् कांग्रेस में नेहरू का अधिनायकवाद प्रबल होने लगा। गांधी और पटेल दोनों के ही नहीं रहने के कारण कांग्रेस ‘नेहरूवाद’ की चपेट में आ गई तथा अल्पसंख्यक तुष्टिकरण, लाइसेंस-परमिट-कोटा राज, राष्ट्रीय सुरक्षा पर लापरवाही, राष्ट्रीय मसलों जैसे कश्मीर आदि पर घुटनाटेक नीति, अंतर्राष्ट्रीय मामलों में भारतीय हितों की अनदेखी आदि अनेक विषय देश में राष्ट्रवादी नागरिकों को उद्विग्न करने लगे। ‘नेहरूवाद’ तथा पाकिस्तान एवं बांग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार पर भारत के चुप रहने से क्षुब्ध होकर डॉ श्यामा प्रसाद मुकर्जी ने नेहरु मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। इधर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ स्वयंसेवकों ने भी प्रतिबंध के दंश को झेलते हुए महसूस किया कि संघ के राजनीतिक क्षेत्र से सिद्धांततः दूरी बनाये रखने के कारण वे अलग-थलग तो पड़े ही, साथ ही संघ को राजनीतिक तौर पर निशाना बनाया जा रहा था। ऐसी परिस्थिति में एक राष्ट्रवादी राजनीतिक दल की आवश्यकता देश में महसूस की जाने लगी। फलतः भारतीय जनसंघ की स्थापना 21 अक्टूबर, 1951 को डॉ श्यामा प्रसाद मुकर्जी की अध्यक्षता में दिल्ली के राघोमल आर्य कन्या उच्च विद्यालय में हुई। भारतीय जनसंघ ने डॉ श्यामा प्रसाद मुकर्जी के नेतृत्व में कश्मीर एवं राष्ट्रीय अखंडता के मुद्दे पर आंदोलन छेड़ा तथा कश्मीर को किसी भी प्रकार का विशेषाधिकार देने का विरोध किया। नेहरू के अधिनायकवादी रवैये के फलस्वरूप डॉ श्यामा प्रसाद मुकर्जी को कश्मीर की जेल में डाल दिया गया, जहां उनकी रहस्यपूर्ण स्थिति में मृत्यु हो गई। एक नई पार्टी को सशक्त बनाने का कार्य पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के कंधों पर आ गया। भारत-चीन युद्ध में भी भारतीय जनसंघ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा राष्ट्रीय सुरक्षा पर नेहरू की नीतियों का डटकर विरोध किया। 1967 में पहली बार भारतीय जनसंघ एवं पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नेतृत्व में भारतीय राजनीति पर लम्बे समय से बरकरार कांग्रेस का एकाधिकार टूटा, जिससे कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की पराजय हुई।

इस प्रकार हुआ था भारतीय जनसंघ का जनता पार्टी में विलय

भारतीय जनता पार्टी की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार सत्तर के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में निरंकुश होती जा रही कांग्रेस सरकार के विरूद्ध देश में जन-असंतोष उभरने लगा। गुजरात के नवनिर्माण आन्दोलन के साथ बिहार में छात्र आंदोलन शुरू हो गया। कांग्रेस ने इन आंदोलनों के दमन का रास्ता अपनाया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार किया तथा देशभर में कांग्रेस शासन के विरूद्ध जन-असंतोष मुखर हो उठा। १९७१ में देश पर भारत-पाक युद्ध तथा बांग्लादेश में विद्रोह के परिप्रेक्ष्य में बाह्य आपातकाल लगाया गया था जो युद्ध समाप्ति के बाद भी लागू था। उसे हटाने की भी मांग तीव्र होने लगी। जनान्दोलनों से घबराकर इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार ने जनता की आवाज को दमनचक्र से कुचलने का प्रयास किया। परिणामत: 25 जून, 1975 को देश पर दूसरी बार आपातकाल भारतीय संविधान की धारा 352 के अंतर्गत ‘आंतरिक आपातकाल’ के रूप में थोप दिया गया। देश के सभी बड़े नेता या तो नजरबंद कर दिये गए अथवा जेलों में डाल दिए गये। समाचार पत्रों पर ‘सेंसर’ लगा दिया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित अनेक राष्ट्रवादी संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। हजारों कार्यकर्ताओं को ‘मीसा’ के तहत गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। देश में लोकतंत्र पर खतरा मंडराने लगा। जनसंघर्ष को तेज किया जाने लगा और भूमिगत गतिविधियां भी तेज हो गयीं। तेज होते जनान्दोलनों से घबराकर इंदिरा गांधी ने 18 जनवरी, 1977 को लोकसभा भंग कर दी तथा नये जनादेश प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर एक नये राष्ट्रीय दल ‘जनता पार्टी’ का गठन किया गया। विपक्षी दल एक मंच से चुनाव लड़े तथा चुनाव में कम समय होने के कारण ‘जनता पार्टी’ का गठन पूरी तरह से राजनीतिक दल के रूप में नहीं हो पाया। आम चुनावों में कांग्रेस की करारी हार हुई तथा ‘जनता पार्टी’ एवं अन्य विपक्षी पार्टियां भारी बहुमत के साथ सत्ता में आई। पूर्व घोषणा के अनुसार 1 मई, 1977 को भारतीय जनसंघ ने करीब 5000 प्रतिनिधियों के एक अधिवेशन में अपना विलय जनता पार्टी में कर दिया।

जनता पार्टी के बाद बनी भारतीय जनता पार्टी

भारतीय जनता पार्टी की वेबसाइट पर बताया गया है कि जनता पार्टी का प्रयोग अधिक दिनों तक नहीं चल पाया। दो-ढाई वर्षों में ही अंतर्विरोध सतह पर आने लगा। कांग्रेस ने भी जनता पार्टी को तोड़ने में राजनीतिक दांव-पेंच खेलने से परहेज नहीं किया। भारतीय जनसंघ से जनता पार्टी में आये सदस्यों को अलग-थलग करने के लिए ‘दोहरी-सदस्यता’ का मामला उठाया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंध रखने पर आपत्तियां उठायी जानी लगीं। यह कहा गया कि जनता पार्टी के सदस्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य नहीं बन सकते। 4 अप्रैल, 1980 को जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति ने अपने सदस्यों के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य होने पर प्रतिबंध लगा दिया। पूर्व के भारतीय जनसंघ से संबद्ध सदस्यों ने इसका विरोध किया और जनता पार्टी से अलग होकर 6 अप्रैल, 1980 को एक नये संगठन ‘भारतीय जनता पार्टी’ की घोषणा की। इस प्रकार भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई।

भारतीय जनता पार्टी का विचार तथा दर्शन

भारतीय जनता पार्टी की वेबसाइट पर बताया गया है कि भारतीय जनता पार्टी एक सुदृढ़, सशक्त, समृद्ध, समर्थ एवं स्वावलम्बी भारत के निर्माण हेतु निरंतर सक्रिय है। पार्टी की कल्पना एक ऐसे राष्ट्र की है जो आधुनिक दृष्टिकोण से युक्त एक प्रगतिशील एवं प्रबुद्ध समाज का प्रतिनिधित्व करता हो तथा प्राचीन भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति तथा उसके मूल्यों से प्रेरणा लेते हुए महान ‘विश्वशक्ति’ एवं ‘विश्व गुरू’ के रूप में विश्व पटल पर स्थापित हो। इसके साथ ही विश्व शांति तथा न्याययुक्त अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को स्थापित करने के लिए विश्व के राष्ट्रों को प्रभावित करने की क्षमता रखे।भाजपा भारतीय संविधान में निहित मूल्यों तथा सिद्धांतों के प्रति निष्ठापूर्वक कार्य करते हुए लोकतांत्रिक व्यवस्था पर आधारित राज्य को अपना आधार मानती है। पार्टी का लक्ष्य एक ऐसे लोकतान्त्रिक राज्य की स्थापना करना है जिसमें जाति, सम्प्रदाय अथवा लिंगभेद के बिना सभी नागरिकों को राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक न्याय, समान अवसर तथा धार्मिक विश्वास एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित हो।भाजपा ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित ‘एकात्म-मानवदर्शन’ को अपने वैचारिक दर्शन के रूप में अपनाया है। साथ ही पार्टी का अंत्योदय, सुशासन, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, विकास एवं सुरक्षा पर भी विशेष जोर है। पार्टी ने पांच प्रमुख सिद्धांतों के प्रति भी अपनी निष्ठा व्यक्त की, जिन्हें ‘पंचनिष्ठा’ कहते हैं। ये पांच सिद्धांत (पंच निष्ठा) हैं-राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय अखंडता, लोकतंत्र, सकारात्मक पंथ-निरपेक्षता (सर्वधर्मसमभाव), गांधीवादी समाजवाद (सामाजिक-आर्थिक विषयों पर गाँधीवादी दृष्टिकोण द्वारा शोषण मुक्त समरस समाज की स्थापना) तथा मूल्य आधारित राजनीति।

भारतीय जनता पार्टी की उप‍लब्धियां

 श्री अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के प्रथम अध्यक्ष निर्वाचित हुए। अपनी स्थापना के साथ ही भाजपा राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हो गई। बोफोर्स एवं भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पुनः गैर-कांग्रेसी दल एक मंच पर आये तथा 1989 के आम चुनावों में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को भारी पराजय का सामना करना पड़ा। वी.पी. सिंह के नेतृत्व में गठित राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार को भाजपा ने बाहर से समर्थन दिया। इसी बीच देश में राम मंदिर के लिए आंदोलन शुरू हुआ। तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष श्री लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक के लिए रथयात्रा शुरू की। राम मंदिर आन्दोलन को मिले भारी जनसमर्थन एवं भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता से घबराकर आडवाणी जी की रथयात्रा को बीच में ही रोक दिया गया। फलतः भाजपा ने राष्ट्रीय मोर्चा सरकार से समर्थन वापस ले लिया। और वी.पी. सिंह सरकार गिर गई तथा कांग्रेस के समर्थन से चन्द्रशेखर देश के अगले प्रधानमंत्री बने। आने वाले आम चुनावों में भाजपा का जनसमर्थन लगातार बढ़ता गया। इसी बीच नरसिम्हाराव के नेतृत्व में कांग्रेस तथा कांग्रेस के समर्थन से संयुक्त मोर्चे की सरकारों का शासन देशपर रहा, जिस दौरान भ्रष्टाचार, अराजकता एवं कुशासन के कईं ‘कीर्तिमान’ स्थापित हुए।

इस प्रकार आगे बढी भारतीय जनता पार्टी

1996 के आम चुनावों में भाजपा को लोकसभा में 161 सीटें प्राप्त हुईं। भाजपा ने लोकसभा में 1989 में 85, 1991 में 120 तथा 1996 में 161 सीटें प्राप्त कीं। भाजपा का जनसमर्थन लगातार बढ़ रहा था। श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पहली बार भाजपा सरकार ने 1996 में शपथ ली, परन्तु पर्याप्त समर्थन के अभाव में यह सरकार मात्र 13 दिन ही चल पाई। इसके बाद 1998 के आम चुनावों में भाजपा ने 182 सीटों पर जीत दर्ज की और श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने शपथ ली। परन्तु जयललिता के नेतृत्व में अन्नाद्रमुक द्वारा समर्थन वापस लिए जाने के कारण सरकार लोकसभा में विश्वासमत के दौरान एक वोट से गिर गई, जिसके पीछे वह अनैतिक आचरण था, जिसमें उड़ीसा के तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री गिररिधर गोमांग ने पद पर रहते हुए भी लोक सभा की सदस्यता नहीं छोड़ी तथा विश्वासमत के दौरान सरकार के विरूद्ध मतदान किया। कांग्रेस के इस अवैध और अनैतिक आचरण के कारण ही देश को पुनः आम चुनावों का सामना करना पड़ा। 1999 में भाजपा 182 सीटों पर पुनः विजय मिली तथा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को 306 सीटें प्राप्त हुईं। एक बार पुनः श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा-नीत राजग की सरकार बनी। भाजपा-नीत राजग सरकार ने श्री अटल बिहारी के नेतृत्व में विकास के अनेक नये प्रतिमान स्थापित किये। पोखरण परमाणु विस्फोट, अग्नि मिसाइल का सफ़ल प्रक्षेपण, कारगिल विजय जैसी सफलताओं से भारत का कद अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर ऊंचा हुआ। राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण, सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार, शिक्षा एवं स्वास्थ्य में नयी पहल एवं प्रयोग, कृषि, विज्ञान एवं उद्योग के क्षेत्रों में तीव्र विकास के साथ-साथ महंगाई न बढ़ने देने जैसी अनेकों उपलब्धियां इस सरकार के खाते में दर्ज हैं। भारत-पाक संबंधों को सुधारने, देश की आंतरिक समस्याओं जैसे नक्सलवाद, आतंकवाद, जम्मू एवं कश्मीर तथा उत्तर पूर्व के राज्यों में अलगाववाद पर कईं प्रभावी कदम उठाए गये। राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता को सुदृढ़ कर सुशासन एवं सुरक्षा को केन्द्र में रखकर देश को समृद्ध एवं समर्थ बनाने की दिशा में अनेक निर्णायक कदम उठाये गए। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी एवं उपप्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में राजग शासन ने देश में विकास की एक नई राजनीति का सूत्रपात किया।

भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान स्थिति

 आज भाजपा देश में एक प्रमुख राष्ट्रवादी शक्ति के रूप में उभर चुकी है एवं देश के सुशासन, विकास, एकता एवं अखंडता के लिए कृतसंकल्प है। 10 साल पार्टी ने विपक्ष की सक्रिय और शानदार भूमिका निभाई। 2014 में श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश में पहली बार भाजपा की पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनी, जो आज ‘सबका साथ, सबका विकास’ की उद्घोषणा के साथ गौरव सम्पन्न भारत का पुनर्निर्माण कर रही है। राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा लगभग 11 करोड़ सदस्यों वाली विश्व की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी बन गयी है। 26 मई, 2014 को श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ग्रहण की। मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने कम समय में ही अभूतपूर्व उपलब्धियां हासिल की हैं। उन्होंने विश्व में भारत की गरिमा को पुन:स्थापित किया, राजनीति पर लोगों के विश्वास को फिर से स्थापित किया। अनेक अभिनव योजनाओं के माध्यम से नए युग की शुरुआत की। अन्त्योदय, सुशासन, विकास एवं समृद्धि के रास्ते पर देश बढ़ चला है। आर्थिक और सामाजिक सुधार सुरक्षित जीवन जीने का मार्ग उपलब्ध करा रहे हैं। किसानों के लिये ऋण से लेकर खाद तक की नयी नीतियां जैसे प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, सॉयल हेल्थ कार्ड, आदि ने कृषि के तीव्र विकास की अलख जगायी है। ये नया युग है सुशासन का। चाहे आदर्श ग्राम योजना हो, स्वच्छता अभियान या फिर योग के सहारे भारत को स्वथ्य बनाने का अभियान, इन सभी कदमों से देश को एक नयी ऊर्जा मिली है। भाजपा की मोदी सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्किल इंडिया’, अमृत मिशन, दीनदयाल ग्राम ज्योति योजना, डिजिटल इंडिया जैसी योजनाओं से भारत को आधुनिक और सशक्त बनाने की दिशा में मजबूत कदम उठाया है। जनधन योजना, बेटी बचाओ-बेटी पढाओ, सुकन्या समृद्धि योजना जैसी अनेक योजनाएं देश में एक नयी क्रांति का सूत्रपात कर रही हैं। भाजपा सरकार ने देशवासियों को विश्व की सबसे बड़ी सामाजिक सुरक्षा योजना का उपहार दिया है।

भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी का योगदान

राष्ट्रीय अखण्डता, कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय, कबाइली वेश में पाकिस्तानी आक्रमण के प्रतिकार, परमिट व्यवस्था एवं धारा 370 की समाप्ति व पृथकतावाद से निरन्तर संघर्ष करने वाली एकमात्र पार्टी भारतीय जनसंघ या भाजपा है, अन्यथा कश्मीर का बचना कठिन था।गोवा मुक्ति आंदोलन, सत्याग्रह एवं बलिदान। बहुत दबाव के बाद ही सरकार ने सैनिक कार्यवाही की।बेरुबाड़ी एवं कच्छ समझौते हमारी राष्ट्रीय अखण्डता के लिए चुनौती थे। भाजपा ने इस चुनौती का सामना किया।आज भी देश में राष्ट्रीय अखण्डता के मुद्दे उठाना पृथकतावाद से जूझना एवं इस निमित्त समाज को निरन्तर जाग्रत रखने का काम भाजपा ही कर रही है।देश को परमाणु शक्ति सम्पन्न कर भारत पर हमलों की हिमाकत करने वालों को अटलजी की सरकार ने सीधा संदेश दिया। प्रथम चरण में जब स्वतंत्रता आंदोलन के सभी नेता सत्ता पक्ष में जा बैठे थे, विपक्ष या तो था ही नहीं या राष्ट्रभक्ति से शून्य वामपंथियों के पास था तब जनसंघ ने चुनौती को स्वीकार किया तथा भारत के लोकतंत्र को भारतीय जनसंघ के रूप में सबल विपक्ष दिया। 1967 में जनसंघ दूसरा बड़ा दल बन गया था।चुनाव सुधार के मुद्दे उठाने वाला एकमात्र राजनीतिक दल जनसंघ या भाजपा ही है। लोकतांत्रिक मर्यादाओं को हमारी पार्टी ने बल दिया और उनका उल्लंघन नहीं होने दिया।आपातकाल के प्रतिकार की कहानी हमारी लोकतंत्रात्मक निष्ठा को पुष्ट करती है।पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नेतृत्व में जो विपक्ष उभरा, वही विकल्प बनने में भी सक्षम था। श्री अटल बिहारी वाजपेयी एवं श्री नरेन्द्र मोदी भारतीय लोकतंत्र में विकल्प के नियामक हैं। भारतीय लोकतंत्र के लिए अपेक्षित अखिल भारतीय संगठन एवं नेतृत्व आज केवल भाजपा के पास है।

भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा

भारतीय जनता पार्टी की वेबसाइट के अनुसार राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का साधन नहीं है। समाज को अपेक्षित दिशा में प्रगति पथ पर ले जाना भी उसका कार्य है। इसके लिये संगत दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है, जो संगत विचारधारा से प्राप्त होता है। आज भारत के सभी राजनैतिक दल विचारधारा शून्यता के शिकार हैं। भाजपा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, एकात्म मानववाद तथा पंचनिष्ठाओं की संगत विचारधाराओं के आधार पर संगठन का नियमन कर रही है। शासन की नीति में भी इनका समुचित प्रतिबिम्बन होगा। ध्येनिष्ठ कार्यकर्ताओं की शक्ति एवं सरकार का सुनियमन सुशासन की गारंटी है। छः साल का केन्द्रीय शासन एवं प्रदेशों में भाजपा की सरकारों ने अन्य दलों की सरकारों की तुलना में अच्छा शासन दिया है। गत तीन वर्षों से श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सकारात्मक सुशासन की प्रक्रिया तीव्र गति से चल रही है। व्यवस्थाओं की पुरानी विकृतियों का शमन करने में अभी भी कुछ वक्त लगेगा।

भारतीय जनता पार्टी के अध्‍यक्षों का इतिहास

भारतीय जनता पार्टी के इतिहास के साथ ही भाजपा के अध्‍यक्षों का भी शानदार इतिहास है जैसा कि हमने आप को बताया है कि भारतीय जनता पार्टी का गठन 1980 में हुआ है. 45 साल पहले जनता पार्टी से भारतीय जनता पार्टी बनी तब शायद किसी ने सोचा नहीं होगा कि पार्टी शोहरत और कामयाबी के इस मुकाम तक पहुंचेगी. जनसंघ से बीजेपी तक, अटल युग से मोदी युग तक. बीजेपी के 12 वें अध्यक्ष नितिन नबीन होंगे. 45 सालों के सियासी सफर में बीजेपी ने कई दौर देखें हैं. तमाम तरह के उतार चढ़ाव से गुजरते हुए शून्य से शिखर तक की यात्रा तय की है. 6 अप्रैल 1980 को जनता पार्टी छोड़कर अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, विजयाराजे सिधिंया, सिकंदर बख्त जैसे तमाम नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी बनाई थी. तब उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में चलने का फैसला किया. अटल बिहारी वाजपेयी बीजेपी के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए. 1980 से लेकर 1986 तक अटल बिहारी वाजपेयी बीजेपी की कमान संभाली.1984 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी महज 2 सीट पर सिमट गई, जिसके बाद पार्टी की कमान लाल कृष्ण आडवाणी को सौंपी गई. आडवाणी 1986 में बीजेपी के अध्यक्ष चुने गए थे और 1991 तक पार्टी की कमान संभाली. ऐसे में आडवाणी ने आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति शुरू की और राम मंदिर जैसे मुद्दे को अधिकारिक तौर पर पार्टी ने अपने एजेंडे में शामिल किया. बीजेपी 2 सीटों से बढ़कर 1989 में 76 तक पहुंची और किंगमेकर बनकर उभरी. 1991 का चुनाव बीजेपी ने राम मंदिर के मुद्दे पर लड़ा और उसने 120 सीटें जीत लीं. इस साल बीजेपी देश की नंबर दो पार्टी बन गई।

 रा‍ज‍नीति में बनी थी बड़ी तिगड़ी 

अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के बाद बीजेपी अध्यक्ष की कमान मुरली मनोहर जोशी ने संभाली. बीजेपी में इन तीनों नेताओं की सियासी तिकड़ी काफी हिट रही. मुरली मनोहर जोशी ने 1991 में बीजेपी अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने उसी साल दिसंबर में तिरंगा यात्रा निकाली. 26 जनवरी 1992 को जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराया. इस तरह राष्ट्रवाद को धार दिया और उनके अध्यक्ष रहते हुए 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी विध्वंस हुआ.

मुरली मनोहर जोशी ने 1991 से 1993 तक बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे. इसके बाद बीजेपी की कमान दोबारा से लालकृष्ण आडवाणी को सौंप दी गई. आडवाणी ने अपने सियासी तेवर और आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति के रास्ते बीजेपी को देश की नंबर पार्टी बनाने की कवायद में जुट गए. आडवाणी के दूसरे कार्यकाल में बीजेपी केंद्र की सत्ता में पहली बार आई. 13 महीने की सरकार बनी. इस तरह 1993 से 1998 तक आडवाणी अध्यक्ष रहे. देश की सत्ता में पहली बार बीजेपी के आने के बाद पार्टी की कमान कुशाभाऊ ठाकरे को सौंप दी है, जिन्हें बीजेपी में पितृ पुरुष कहा जाता है. कुशाभाऊ के अध्यक्ष बनने के बाद मध्य प्रदेश में बीजेपी की सियासी जड़े काफी मजबूत हुई, जिसके बदौलत ही आजतक सत्ता में बनी हुई है. 1998 से लेकर 2000 तक कुशाभाऊ बीजेपी के अध्यक्ष पद संभाला.

कुशाभाऊ ठाकरे के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद साल 2000 में बंगारू लक्ष्मण बीजेपी संगठन की कमान संभाली. आंध्र प्रदेश से आने वाले बंगारू लक्ष्मण पहले दलित नेता थे, जिन्होंने बीजेपी के अध्यक्ष बने थे. हालांकि, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण तहलका कांड में फंसने के बाद इस्तीफा देना पड़ जाता है. इस तरह बंगारू लक्ष्मण एक साल तक ही पार्टी संगठन की बागडोर संभाली. बंगारू लक्ष्मण के बाद जेना कृष्णमूर्ति 2001 में बीजेपी के राष्ट्रीय बने घए और 2002 तक पद रह.

एलके आडवाणी तीन बार रहे भाजपा के अध्‍यक्ष

कृष्णामूर्ती के बाद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष वेंकैया नायडु बने. साल 2002 से 2004 तक अपने पद पर रहे. वेंकया नायडू के अध्यक्ष रहते हुए 2004 में लोकसभा चुनाव हुए थे, लेकिन इंडिया शाइनिंग के बुरी तरह फेल होने के बाद एक बार फिर से बीजेपी की कमान लालकृष्ण आडवाणी के हाथों में सौंप दी जाती है. आडवाणी 2004 में तीसरी बार बीजेपी के अध्यक्ष चुने जाते हैं और 2005 तक पार्टी की कमान संभाली. पाकिस्तान की यात्रा पर आडवाणी जाते हैं और वहां पर जिन्ना की मजार पर जाकर तारीफ कर देते हैं. इसके चलते उन्हें बीजेपी अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ता है. आडवाणी के अध्यक्ष पद छोड़ने बाद साल 2005 में बीजेपी की कमान राजनाथ सिंह को सौंप दी जाती है. राजनाथ सिंह 2005 से लेकर 2009 तक बीजेपी के अध्यक्ष रहते हैं और उन्हीं के अध्यक्ष रहते लोकसभा चुनाव होता है. इस चुनाव में बीजेपी को करारी मात खानी पड़ती है. इसके बाद राजनाथ सिंह की जगह बीजेपी की कमान नितिन गडकरी को सौंपी गई. नितिन गडकरी 2010 में बीजेपी के राष्ट्रीय चुने गए और तीन साल तक पार्टी संगठन को सियासी धार दिया, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी अध्यक्ष के बदल दिए जाते हैं. गडकरी की जगह राजथान सिंह को फिर संगठन की कमान सौंपी जाती है. राजनाथ सिंह 2013 में दोबारा से बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाते हैं, उनके अगुवाई में 2014 में चुनाव होता है, लेकिन पीएम पद के चेहरे नरेंद्र मोदी होते हैं. नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ने का बीजेपी को फायदा होता है और पहली बार पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ देश की सत्ता में विराजमान होती है. यहीं से बीजेपी सबसे बेहतर दौर शुरू होता है. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने और उनकी कैबिनेट में राजनाथ सिंह के गृहमंत्री बनने के बाद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ता है.

अमित शाह से लेकर जेपी नड्डा तक का दौर

 राजनाथ सिंह के बीजेपी अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद पार्टी की कमान अमित शाह ने संभाली और फिर पार्टी का देश भर में विस्तार हुआ. अमित शाह पहली बार 2014 से 2017 तक और उसके बाद 2017 से 2020 तक अध्यक्ष पद संभाला. अमित शाह के अध्यक्ष रहते हुए बीजेपी 2019 में सत्ता में रिपीट किया. इसके बाद अमित शाह केंद्र की मोदी सरकार में गृहमंत्री बन गए, जिसके बाद उन्हें पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा.  अमित शाह के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर जेपी नड्डा की ताजपोशी हुई. जेपी नड्डा पहले 2019 में बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष बने और फिर 2020 में राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित हुए. इस तरह 2020 से लेकर अभी तक जेपी नड्डा बीजेपी की कमान संभाल रहे थे, उनके अगुवाई में 2024 का लोकसभा चुनाव हुआ. बीजेपी सत्ता की हैट्रिक लगाकर इतिहास रचा.

पूरे 45 साल बाद 45 साल का अध्यक्ष

भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान दौर की बात करें तो जेपी नड्डा की जगह पर पहले नितिन नबीन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया और अब उनकी राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर ताजपोशी हो गई हैनितिन नबीन अभी सिर्फ 45 साल के हैं इस तरह नितिन नबीन को पार्टी यह जिम्मेदारी देकर साबित कर दिया है कि भाजपा भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखते हुए नई लीडरशिप तैयार कर रही है. कम उम्र के अध्‍यक्ष बनने वाले नितिन नवीन से पहले यह रिकॉर्ड अमित शाह के नाम था, जिन्होंने 49 वर्ष की उम्र में पार्टी की कमान संभाली थी. उनसे पहले नितिन गडकरी 52 वर्ष की उम्र में अध्यक्ष बने थे ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी भारतीय जनसंघ के दौर में कम उम्र में अध्यक्ष बने थे इस फैसले के जरिए बीजेपी ने युवाओं को सीधा संदेश दिया है कि पार्टी में उम्र बाधा नहीं है BJP History

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एक विचार से समझ सकते हैं जीवन का पूरा रहस्य, भगवान बुद्ध ने बताया है

ब्राह्मांड में फैली हुई ऊर्जा को ठीक से समझ लेने तथा प्रकृति के अनुरूप व्यवहार करने से जीवन का पूरा रहस्य समझ में आ जाता है। जो इंसान ब्रह्मांड की ऊर्जा के साथ जुड़ जाता है उसे वह सब कुछ प्राप्त हो जाता है जो वह चाहता है।

बुद्ध का सूत्र
बुद्ध का सूत्र
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar19 Jan 2026 04:47 PM
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Gautama Buddha : भगवान गौतमबुद्ध ने बेहद आसान तरीके से जीवन के बड़े रहस्य का समाधान किया है। भगवान गौतमबुद्ध के बताए गए मार्ग के द्वारा जीवन का रहस्य समझ कर कोई भी इंसान अपने जीवन को पूरी तरह से सार्थक बना सकता है। भगवान गौतमबुद्ध ने बताया है कि वास्तव में आत्मा तथा परमात्मा का पूरा खेल भ्रम है। वास्तव में ब्रह्मांड में फैली हुई ऊर्जा से ही पूरी सृष्टि का संचालन होता है। ब्राह्मांड में फैली हुई ऊर्जा को ठीक से समझ लेने तथा प्रकृति के अनुरूप व्यवहार करने से जीवन का पूरा रहस्य समझ में आ जाता है। जो इंसान ब्रह्मांड की ऊर्जा के साथ जुड़ जाता है उसे वह सब कुछ प्राप्त हो जाता है जो वह चाहता है।

जैसी करनी-वैसी भरनी किसी सजा की चेतावनी नहीं है

भगवान गौतमबुद्ध कहते हैं कि जैसी करनी- वैसी भरनी यह बात हम रोज सुनते हैं। जैसी करनी-वैसी भरनी की बात सुनते ही हमें लगने लगता है कि यह किसी सजा की घोषणा है। हमें लगता है कि जैसे कोई बैठा हुआ है जो हमारे किए गए कार्यों का हिसाब रख रहा है। वास्तव में ऐसी कोई व्यवस्था प्रकृति में नहीं है कि कोई हमारे कार्यों का हिसाब रख रहा हो। असल में ब्रह्मांड में मौजूद ऊर्जा के द्वारा ही सब कुछ संचालित होता है। जिस प्रकार कोई किसान अपने खेल में गेहूं का बीज बोने के बाद आम का पेड़ उगने की कल्पना नहीं कर सकता। उसी प्रकार कोई इंसान प्रकृति के विरूद्ध आचरण करके अपने जीवन को बेहतर बनाने की कल्पना करेगा तो गलत साबित होगा। गेहूं के बीज से कभी आम का पौधा पैदा नहीं हो सकता। इसका अर्थ यह है कि जैसा बीज बोया गया है वैसा ही फल प्राप्त होता है।

इंसान के विचार से बोया जाता है बीज

भगवान गौतमबुद्ध ने बताया है कि इंसान के अंदर चलने वाले विचारों के कंपन को ब्रह्मांड की ऊर्जा ग्रहण करती है। किसी इंसान के विचार जिस प्रकार से होते हैं उस इंसान का जीवन भी उसी प्रकार का बन जाता है। ब्रह्मांड के द्वारा इंसान के विचारों के आधार पर ही उसे सब कुछ प्रदान किया जाता है। जो इंसान अपने विचारों में प्रेम, करूणा, भाईचारा, प्रकृति से लगाव को महत्व देता है उसके जीवन में ब्रह्मांड की शक्ति सब कुछ अच्छा ही अच्छा प्रदान करती है। यहां विचारों का अर्थ आपके द्वारा बोले जाने वाले शब्दों से नहीं है बल्कि आप संमयक भाव से अपने विचारों को देखते हुए जो कुछ भी विचार पैदा करते हैं उन्हीं विचारों से आपका जीवन प्रभावित होता है। साक्षी भाव से उत्तम विचार करने वाला इंसान पूरे मन से जो भी मांगता है उसे वह सब कुछ मिल जाता है जिसकी उसने कल्पना की होती है। भगवान गौतमबुद्ध के इन विचारों का वैज्ञानिकों ने भी समर्थन किया है।

आकर्षण का सिद्धांत भी भगवान गौतमबुद्ध की बात का आधार है

हजारों साल पहले भगवान गौतमबुद्ध ने यह बात कही थी कि आप अपने साक्षी भाव में जो भी मांगते हैं प्रकृति यानि ब्रह्मांड आपको वह सब कुछ दे देता है। इस बात को आधुनिक विज्ञान ने भी स्वीकार कर लिया है। आधुनिक विज्ञान इस व्यवस्था को आकर्षण का सिद्धांत यानि लॉ ऑफ अट्रेक्शन (Law of Attraction) कहते हैं। आकर्षण का सिद्धांत यह साबित करता है कि आप अपने विचारों के द्वारा जो भी कुछ प्राप्त करना चाहते हैं वह सब कुछ आपको मिल जाता है। दुनिया भर के 100 से अधिक सफल लोगों पर किए गए सर्वे ने साबित किया है कि उन्होंने जो भी सोचा वह उन्हें अवश्य मिल गया। 

विचारों को साक्षी भाव से देखने के लिए ध्यान जरूरी है

भगवान गौतमबुद्ध ने विचारों को साक्षी भाव से देखने के लिए ध्यान यानि मेडिटेशन(Meditation) की विधि पूरी मानवता को प्रदान की है मेडिटेशन(Meditation)  के द्वारा आप अपने विचारों के साक्षी बनते हैं। विचारों के साक्षी बनने के बाद आपको किसी भी चीज की कमी नहीं रह जाती। आप जो भी विचार लाते हैं आपको वह सब कुछ प्राप्त हो जाता है जो आप पाना चाहते हैं। बस आपको अपने जीवन को ब्रह्मांड के साथ जोड़नाा है।

भगवान गौतमबुद्ध के विचारों को आगे बढ़ाया है ओशो ने

आध्यात्मिक गुरू ओशो की पूरी शिक्षा तथा पूरा ज्ञान ही भगवान गौतमबुद्ध के द्वारा ब्रह्मांड के साथ जुड़ाव पर आधारित है। एक उदाहरण के साथ देखें तो ओशो ने हमेशा कहा है कि जब इंसान अपने भीतर की शांति और चेतना को पहचानता है और उसे ब्रह्मांड-सत्ता से जोड़ता है, तब उसे सब कुछ मिल जाता है। ओशो का मूल विचार यह है कि ब्रह्मांड से जुडऩा किसी भौतिक स्थान या किसी विशेष अनुभव से नहीं, बल्कि अपने भीतर की चेतना के साक्षात्कार से शुरू होता है। जब व्यक्ति आत्म-चिंतन, ध्यान और मौन की कला सीखता है, तभी वह ब्रह्मांड से जुडक़र गहरे आनन्द और संतुलन को अनुभव कर सकता है। उसे वह सब कुछ मिल जाता है जो वह चाहता है। इस प्रकार यदि हम अपने अंदर चलने वाले विचारों के साक्षी बनकर ब्राह्मांड के साथ जुड़ जाते हैं तो जीवन के पूरे रहस्य को समझ जाते हैं। जीवन का यह रहस्य समझ में आते ही हमें स्वयं अनुभव होने लगता है कि वास्तव में हम इस ब्रह्मांड में फैली हुई व्यापक ऊर्जा का एक छोटा सा अंश है। एक ऐसा अंश जो कभी ना पैदा होता है और ना ही कभी मरता है। Gautama Buddha

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पंद्रह में से दो के जवाब भी दे दिए न तो आप कहलाएंगे असली सिकंदर

GK Quiz: इस लेख में भारतीय नदियों से जुड़े महत्वपूर्ण सामान्य ज्ञान प्रश्न-उत्तर दिए गए हैं जो प्रतियोगी परीक्षाओं और इंटरव्यू के लिए बेहद उपयोगी हैं। इसमें गुजरात की जीवन रेखा कहलाने वाली नदी, नदियों के प्रसिद्ध उपनाम, उनकी उत्पत्ति, सहायक नदियां और धार्मिक महत्व से जुड़ी जानकारी शामिल है।

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locationभारत
userअसमीना
calendar17 Jan 2026 01:43 PM
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भारत को नदियों का देश कहा जाता है। हमारी सभ्यता, खेती, संस्कृति और जीवनशैली का विकास नदियों के आसपास ही हुआ है। देश की लगभग हर बड़ी नदी किसी न किसी खास पहचान या उपनाम से जानी जाती है। कई नदियां किसी राज्य के लिए जीवनदायिनी मानी जाती हैं तो कुछ बाढ़ के कारण दुख का कारण भी बनती हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं और इंटरव्यू में नदियों से जुड़े ऐसे सवाल अक्सर पूछे जाते हैं लेकिन सही जवाब हर किसी को याद नहीं रहता। इसी को ध्यान में रखते हुए यह लेख तैयार किया गया है ताकि आप एक ही जगह महत्वपूर्ण जानकारी आसानी से समझ सकें।

प्रश्न 1- मध्य प्रदेश के अमरकंटक से कौन-सी नदी निकलती है?

उत्तर- नर्मदा नदी अमरकंटक (मध्य प्रदेश) से निकलती है।

प्रश्न 2- किस नदी को ‘बिहार का शोक’ कहा जाता है?

उत्तर- कोसी नदी को ‘बिहार का शोक’ कहा जाता है क्योंकि यह बार-बार भयंकर बाढ़ लाती है।

प्रश्न 3- ओडिशा में स्थित हीराकुंड बांध किस नदी पर बना है?

उत्तर- हीराकुंड बांध महानदी नदी पर बना है।

प्रश्न 4- किस नदी को ‘दक्षिण गंगा’ कहा जाता है?

उत्तर- गोदावरी नदी को ‘दक्षिण गंगा’ कहा जाता है।

प्रश्न 5- गोवा के पणजी शहर के पास कौन-सी नदी अरब सागर में मिलती है?

उत्तर- मांडवी नदी गोवा के पणजी के पास अरब सागर में मिलती है।

प्रश्न 6- किस नदी को ‘गुजरात की जीवन रेखा’ कहा जाता है?

उत्तर- साबरमती नदी को ‘गुजरात की जीवन रेखा’ कहा जाता है। यह मध्य प्रदेश से निकलकर गुजरात से होकर बहती है और राज्य की पानी व सिंचाई की जरूरतों को पूरा करती है।

प्रश्न 7- भारत की सबसे लंबी नदी कौन-सी है?

उत्तर- गंगा नदी भारत की सबसे लंबी नदी है।

प्रश्न 8- बंगाल की खाड़ी में मिलने से पहले कौन-सी नदी कोलकाता से होकर बहती है?

उत्तर- हुगली नदी कोलकाता से होकर बहती है।

प्रश्न 9- किस नदी को भारत में ‘पवित्र नदी’ माना जाता है?

उत्तर- गंगा नदी को पवित्र नदी माना जाता है।

प्रश्न 10- गंगा नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी कौन-सी है?

उत्तर- यमुना नदी गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी है।

प्रश्न 11- बाढ़ के कारण किस नदी को ‘असम का दुख’ कहा जाता है?

उत्तर- ब्रह्मपुत्र नदी को ‘असम का दुख’ कहा जाता है।

प्रश्न 12- किस नदी को ‘ओडिशा का शोक’ कहा जाता है?

उत्तर- महानदी नदी को ‘ओडिशा का शोक’ कहा जाता है।

प्रश्न 13- कौन-सी नदियां मानसरोवर झील क्षेत्र से निकलती हैं?

उत्तर- सतलुज, ब्रह्मपुत्र और सिंधु नदियां मानसरोवर झील क्षेत्र से निकलती हैं।

प्रश्न 14- कौन-सी नदी बंगाल की खाड़ी में मिलने से पहले सुंदरबन डेल्टा से होकर बहती है?

उत्तर- गंगा नदी हुगली–पद्मा प्रणाली के माध्यम से सुंदरबन डेल्टा से होकर बहती है।

प्रश्न 15- कृष्णा नदी की मुख्य सहायक नदियां कौन-सी हैं?

उत्तर- कृष्णा नदी की मुख्य सहायक नदियां तुंगभद्रा और भीमा हैं।