किन लोगों को है रोजा छोड़ने की इजाजत? मुसलमानों के लिए जरूरी हिदायतें

रमजान इस्लामिक कैलेंडर का सबसे पाक महीना है। इस दौरान मुसलमान सुबह की सहरी से लेकर शाम के इफ्तार तक रोज़ा रखते हैं। रोज़ा इंसान को अपने आप पर काबू पाने, नफ्स को नियंत्रित करने और गुनाहों से बचने की सीख देता है। हर किसी पर रोज़ा रखना वाजिब नहीं है।

Ramzan Mubarak
रोजा कौन नहीं रख सकता?
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userअसमीना
calendar20 Feb 2026 04:01 PM
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रमजान (Ramadan) इस्लामी कैलेंडर का सबसे पाक महीना है जिसे मुसलमान बड़े ध्यान और इबादत के साथ मनाते हैं। इस दौरान सुबह की सहरी से लेकर शाम के इफ्तार तक रोज़ेदारों के लिए हर दिन खास होता है। रोज़ा इंसान को अपने आप पर काबू पाने, नफ्स को नियंत्रित करने और गुनाहों से बचने की सीख देता है लेकिन हर किसी पर रोज़ा रखना वाजिब नहीं है। इस आर्टिकल में जानिए रमजान के रोज़े के नियम और किसे छूट मिलती है।

रमजान का महत्व

इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार, साल का 9वां महीना रमजान होता है। इस महीने में रोज़े रखना और नमाज़ पढ़ना वाजिब है। रमजान की शुरुआत उस दिन होती है जब चांद नजर आता है। भारत में 19 फरवरी 2026 से रमजान शुरू हुआ। पूरे महीने में रोज़ेदारों को सहरी और इफ्तार का समय पालन करना अनिवार्य है। रोज़ा रखने का मकसद केवल भूख और प्यास सहना नहीं है बल्कि यह आत्मानुशासन, धैर्य और खुदा से करीबी बनाने की इबादत है।

रोज़े में किसे छूट है?

रोज़ा हर उस व्यक्ति पर वाजिब है जो शारीरिक रूप से स्वस्थ और सक्षम है लेकिन कुछ लोगों को इस्लामी कानून के अनुसार रोज़ा रखने से छूट मिलती है।

बीमार और बुजुर्ग: जो लोग गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं या बुजुर्ग हैं उन्हें रोज़ा रखने की जरूरत नहीं है।

बच्चे: छोटे बच्चे रोज़ा नहीं रखते।

लंबी यात्रा पर जाने वाले: यात्रा के दौरान रोज़ा रखने से छूट है लेकिन यात्रा के बाद इसे पूरा करना जरूरी है।

लंबी बीमारी: अगर किसी को लगातार बीमारी है तो उसे रोज़ा रखने से छूट मिलती है और वो आवश्यकता अनुसार रोज़ा की कजा कर सकता है। ध्यान रखें कि ऐसे लोगों के लिए पेट भरकर खाना मकरूह माना गया है यानी जरूरत से ज्यादा खाना नहीं खाना चाहिए।

रोज़े में क्या करें और क्या नहीं?

  • रोज़ा सिर्फ भूख और प्यास सहने का नाम नहीं है। इसे इबादत के रूप में देखा जाता है।
  • कुरान-ए-मजीद पढ़ें और मज़हबी किताबों का अध्ययन करें।
  • नेक बातें और नसीहत सुनें और दुआओं में मशगूल रहें।
  • रोज़ा रखने के दौरान सांस लेना भी इबादत का हिस्सा है।

रोज़ा रखते हुए ऑफिस जाएं तो क्या करें?

ऑफिस जाने से रोज़े पर कोई असर नहीं पड़ता। रोज़ा और रोजगार दोनों इबादत के रूप में स्वीकार हैं। इसलिए ऑफिस में काम करते हुए भी रोज़ा जारी रखा जा सकता है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। चेतना मंच इसकी पुष्टि नहीं करता है।)

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नमाज़-ए-तरावीह कैसे करें मुकम्मल? यहां है 10 अहम सूरतें

रमज़ान के पवित्र महीने में तरावीह की नमाज़ का खास महत्व होता है। तरावीह नमाज़ ईशा के बाद पढ़ी जाती है और इसमें 20 रकात होती हैं। इस नमाज़ में कुरान की तिलावत की जाती है और अलग-अलग सूरतें पढ़ी जाती हैं। बहुत से लोग जानना चाहते हैं कि तरावीह में कौन-कौन सी 10 सूरतें पढ़ी जाती हैं।

Taraweeh Surah
तरावीह की नमाज़ में पढ़ी जाने वाली दस सूरतें
locationभारत
userअसमीना
calendar19 Feb 2026 03:21 PM
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रमज़ान का महीना मुसलमानों के लिए बेहद खास माना जाता है। यह वो महीना है जब अल्लाह की रहमत और बख्शिश सबसे ज्यादा बरसती है। इस महीने में इंसान अपने दिल और इरादों को साफ करता है और सिर्फ अल्लाह की इबादत करता है। रोज़ा रखने के अलावा रमज़ान में तरावीह की नमाज़ पढ़ना भी बेहद अहम माना जाता है। तरावीह नमाज़ ईशा के बाद अदा की जाती है और इसमें कुल 20 रकात होती हैं। हर दो रकात के बाद सलाम फेरा जाता है। तरावीह की नमाज़ का सबसे बड़ा महत्व यह है कि इसमें कुरान की तिलावत की जाती है। पुरुष और महिलाएं दोनों ही इसे पढ़ सकते हैं लेकिन पुरुषों के लिए इसे इमाम के साथ मस्जिद में पढ़ना और कुरान की तिलावत सुनना जरूरी माना जाता है। वहीं, महिलाएं घर पर भी 10 या 20 रकात में तरावीह पढ़ सकती हैं। चलिए जानते हैं नमाज़-ए-तरावीह में कौन-कौन सी सूरतें पढ़ सकते हैं।

सूरह नास

बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम

कुल् आऊज़ु बिरब्बिन-नास। मलिकिन-नास। इलाहिन-नास। मिन शर्रिल वसवासिल ख़न्नास। अल्लज़ी युवस्सिवु फी सुदूरिन-नास। मिनल जिन्नति वन्नास।


सूरह कुरैश

बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम

ली इलाफि क़ुरैश। इलाफिहिम रिह्लताश शीत्वा वास-साफ़़। फलय’बुदु राब्बा हाज़ाल-बैत। अलज़ी अता’हुम मन्ना हुम वस्सलाम।


सूरह फील

बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम

अलम तरा कैफ़ फ़अ'ला रब्बुक़ बिअअशाबी अल-फील। अलज़ी अजला क़यदहुम फ़ी त़ुल्लीहिम। वजअला अम्बालहुम रज़्मा। फी अह़लीहिम क़बरम। फजअलहुम क़ईदं हुम फरक़ा


सूरह कौसर

बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम

इन्ना अअतैना कल कौसर। फसल लि लि रब्बि क वन हर। इन न शानि अ क हुवल अबतर।


सूरह काफिरून

बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम

कुल या अय्युहल काफ़िरून। ला अ’अबुदु मा ता’अबुदून। वला अन्तुम आबिदूना मा अ’अबुद। वला अना आबिदुम मा अबद्तुम। वला अन्तुम आबिदूना मा अ’अबुद। लकुम दीनुकुम वलिय दीन।


सूरह इखलास

बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम

कुल हुवल्लाहु अहद। अल्लाहुस्समद। लम यलिद वलम यूलद। वलम यकुल्लहू कुफुवन अहद।


सूरह फलक

बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम

कुल अऊजू बि रब्बिल फलक। मिन शर्रि मां खलक। वमिन शर्रि ग़ासिक़ीन इज़ा वक़ब। व् मिन शर्रिन नफ्फ़ा साति फिल उक़द। व् मिन शर्रि हासिदीन इज़ा हसद।


सूरह नस्र

बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम

इज़ा जा-अ नसरुल्लाहि वल फत्ह। व रअयतन्नासा यदखुलूना फी दीनिल्लाहि अफवाजा। फसब्बिह बिहम्दि रब्बिका वसतग़फिरह। इन्नहू काना तव्वाबा।


सूरह माऊन

बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम

अरा-अयतल्लज़ी युकज्जिबु बिद्दीन। फज़ालिकल्‍लज़ी यदउअुल यतीम। वला यहुद्दु अला तआमिल मिस्कीन। फवैलुल्‍लिल मुसल्लीन। अल्लज़ीना हुम अन सलातिहिम साहून। अल्लज़ीना हुम युरा-ऊन। वयम्नऊना अल माऊन। लहबसद। 


सूरह लहब

बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम

तब्बत यदा अबी लहबिव्-व तवब। मा अग़ना अन्हु मालुहू वमा कसब। सयस्‍ला नारन ज़ात लहब। वम्‍रअतूहू हम्‍मालतल हतब। फी जीदिहा हबलुम मिम मसद।

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Taraweeh: रमज़ान का महीना इस्लाम धर्म में सबसे पाक और पवित्र माना जाता है। इस दौरान मुसलमान अल्लाह की इबादत करते हैं और रोज़ा रखते हैं। रमज़ान में तरावीह की नमाज़ पढ़ना विशेष महत्व रखता है। यह नमाज़ ईशा की नमाज़ के बाद अदा की जाती है और इसमें कुल 20 रकात होती हैं।

Taraweeh ki Namaz
तरावीह कैसे पढ़ें
locationभारत
userअसमीना
calendar19 Feb 2026 01:14 PM
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रमज़ान (Ramadan) इस्लाम धर्म का सबसे पाक महीना माना जाता है। रमज़ान के पाक महीने में मुसलमान अल्लाह की इबादत करते हैं और रोज़ा रखते हैं। रमज़ान सिर्फ भूख और प्यास सहने का महीना नहीं है बल्कि यह आत्मा की सफाई और खुदा के करीब जाने का खास मौका भी है। माह-ए-रमज़ान में लोग अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं और अल्लाह की बरकत पाने के लिए रोज़ाना नमाज़ और तरावीह पढ़ते हैं।

क्या होती है तरावीह?

तरावीह की नमाज़ ईशा के बाद अदा की जाती है और इसका मकसद सिर्फ अल्लाह की इबादत करना नहीं बल्कि कुरआन की तिलावत करना और दिल को सुकून देना भी है। पुरुषों के लिए तरावीह 20 रकात होती है जबकि महिलाओं के लिए 10 रकात सही मानी जाती हैं। इस नमाज़ में हर 2-4 रकात के बाद दुआ पढ़ना जरूरी माना जाता है ताकि इसका सवाब पूरा मिल सके।

तरावीह की दुआ पढ़ना बेहद जरूरी

तरावीह की दुआ का पढ़ना भी उतना ही अहम है जितना रोज़े की दुआ का पढ़ना। दुआ बिना पढ़े तरावीह का सवाब कम हो जाता है और इसे सही तरीके से पढ़ने का महत्व भी कम हो जाता है। इस दौरान अल्लाह से अपने दिल की इच्छाओं और जरूरतों की प्रार्थना करना चाहिए ताकि वह हमारी इबादत को स्वीकार करें और हमें बरकत दें।

तरावीह की दुआ हिंदी में (Taraweeh ki Dua in Hindi)

सुबहान ज़िल मुल्कि वल मलकूत, सुब्हान ज़िल इज्ज़ति वल अज़मति वल हय्बति वल कुदरति वल किबरियाई वल जबरूत, सुबहानल मलिकिल हैय्यिल लज़ी ला यनामु वला यमुतू सुब्बुहून कुददुसुन रब्बुना व रब्बुल मलाइकति वर रूह, अल्लाहुम्मा अजिरना मिनन नारि या मुजीरू या मुजीरू या मुजीर।

Taraweeh ki Dua in Urdu

سبحان ذي الملك و الملكوت سبحان ذي العزة و الجبروت سبحان الحي الذي لا يموت

سبحان الذي خضعت لعظمته الرقاب سبحان الذي ذلت لجبروته الصعاب سبحان رب الأرباب مسبب الأسباب

तरावीह की नमाज़ की नियत कैसे करें?

तरावीह की नमाज़ की नियत पुरुषों और महिलाओं के लिए थोड़ी अलग होती है। पुरुषों को यह कहते हुए पढ़ना चाहिए:

"मैं दो रकात सुन्नत तरावीह अल्लाह तआला के वास्ते पढ़ रहा हूं, वक्त ईशा का, मुंह काबा की तरफ, अल्लाहु अकबर"।

महिलाओं के लिए नियत होती है-

"मैं दो रकात सुन्नत तरावीह अल्लाह तआला के वास्ते पढ़ रही हूं, वक्त ईशा का, मुंह काबा की तरफ, अल्लाहु अकबर"।

यह नियत मन और इरादे दोनों को तैयार करती है ताकि नमाज़ सही तरीके से अदा हो। घर पर पढ़ते समय हर 2 रकात में कुरान की 10 सूरतें पढ़ी जा सकती हैं। अगर मस्जिद में पढ़ रहे हैं तो इमाम (नमाज़ पढ़ाने वाला) कुरआन पढ़ता है और पीछे वाले उसका पालन करते हैं। महिलाओं के लिए घर पर पढ़ना ही सबसे सही माना गया है। इस नमाज़ को रोजाना पढ़ना चाहिए ताकि पूरे रमज़ान का सवाब मिले।

तरावीह नमाज़ के फायदे क्या है?

तरावीह की नमाज़ के फायदे भी बहुत हैं। कुरआन की तिलावत से दिल को सुकून मिलता है और पढ़ते समय इंसान खुद को अल्लाह के करीब महसूस करता है। इफ्तार के बाद तरावीह पढ़ना शरीर को हल्की व्यायाम भी देता है और रात के समय मन और शरीर दोनों को ताजगी मिलती है।

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