खिचड़ी ने बदल दिया था भारत का पुराना इतिहास
दुनिया में ऐसे बहुत कम लोग हैं जो यह जानते हैं कि खिचड़ी ने एक बार भारत का पूरा पुराना इतिहास भी बदल दिया था। हम आपको बता रहे हैं कि आखिर खिचड़ी ने भारत का इतिहास कैसे बदल दिया था।

Makar Sankranti Khichdi History : मकर संक्रांति का पर्व खिचड़ी खाने वाले पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। भारत के सभी घरों में खिचड़ी खाई जाती है। खिचड़ी के भोजन को देवताओं के लिए भी दुर्लभ भोजन माना जाता है। दुनिया में ऐसे बहुत कम लोग हैं जो यह जानते हैं कि खिचड़ी ने एक बार भारत का पूरा पुराना इतिहास भी बदल दिया था। हम आपको बता रहे हैं कि आखिर खिचड़ी ने भारत का इतिहास कैसे बदल दिया था।
जब खिचड़ी ने कर दिया था बड़ा कमाल
खिचड़ी के द्वारा भारत के इतिहास को बदलने की यह घटना बहुत पुरानी घटना है। यह घटना उस समय की है जब मगध में नंदवंश का शासन था। नंदवंश का आखिरी शासक था घनानंद और सम्राट घनानंद बहुत कू्रर था। जब आचार्य चाणक्य मगध के दरबार में घनानंद से उसकी सहायता मांगने पहुंचे कि वह विदेशी आक्रमणों के खिलाफ अभियान की तैयारी करे तो मद में चूर घनानंद ने चाणक्य का अपमान कर दिया। इस अपमान से नाराज चाणक्य ने अपनी शिखा खोल ली और घनानंद के सर्वनाश की सौगंध खा ली। उन्होंने इसके लिए घनानंद का ही एक सैनिक चंद्रगुप्त मिल गया, जिसे घनानंद ने प्रशिक्षित किया। इसके बाद गुरु-शिष्य दोनों ही मगध की नींव हिलाने निकल पड़े। चंद्रगुप्त ने लगभग पांच हजार घुड़सवारों की छोटी-सी सेना बना ली थी। सेना लेकर उन्होंने एक दिन भोर के समय ही मगध की राजधानी पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर दिया। चाणक्य, धनानंद की सेना और किलेबंदी का आंकलन नहीं कर पाए और दोपहर से पहले ही धनानंद की सेना ने चंद्रगुप्त और उसके सहयोगियों को बुरी तरह मारा और खदेड़ दिया।
खिचड़ी खाकर बनी रणनीति ने सब कुछ बदल डाला था
उस रोज चंद्रगुप्त को जान बचाने के लिए पीछे हटना पड़ा। चंद्रगुप्त-चाणक्य वेश बदलकर घूम रहे थे और बिखरी हुई शक्ति को फिर से एक करने में जुटे हुए थे। वह किसी भी जगह पर एक रात से अधिक नहीं ठहरते थे। वेश बदलने के साथ ही भोजन-पानी के लिए भिक्षा का सहारा ले रखा था। इसी क्रम में वे गांव के बाहर एक वृद्धा के घर रुके हुए थे। बूढ़ी माता ने अतिथियों का स्वागत किया और भोजन के लिए खिचड़ी बनाई। थाली के बीच गड्ढा कर उन्होंने घी डाल दिया और गरमा गर्म खिचड़ी चंद्रगुप्त और चाणक्य के सामने परोस दी। घी को मिलाने के लिए चंद्रगुप्त ने जैसे ही थाली के बीच हाथ डाला, तो उनकी उंगलियां जल गईं। बूढ़ी मां ने बालक समझकर चंद्रगुप्त को डपट दिया- मूर्ख हो क्या, खिचड़ी गर्म है, पहले किनारे से खाओ, फिर बीच तक पहुंचना। चंद्रगुप्त ने ऐसा ही किया और चाणक्य समझ गए कि आगे भी ऐसा ही करना है। उन्होंने चंद्रगुप्त से कहा- समझ गए गलती कहां हुई? हमें सीधे पाटलिपुत्र पर आक्रमण नहीं करना है, बल्कि पहले किनारों को जीतना है। चाणक्य और चंद्रगुप्त ने वृद्धा को गुरु मानकर उनके पैर छुए और फिर पाटलिपुत्र के किनारे वाले राज्यों को जीतना शुरू किया। मौर्य साम्राज्य की स्थापना में प्रमुख किरदार बन गई खिचड़ी इतिहास कहता है कि चंद्रगुप्त ने मगध पर आक्रमण के छह युद्ध हारे थे, लेकिन सातवें युद्ध से उसकी जीत का जो सिलसिला शुरू हुआ वह कभी नहीं रुका। चंद्रगुप्त हर युद्ध जीतता रहा और फिर उसने मगध के निरंकुश शासक का नाश कर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। खिचड़ी का ही प्रभाव था कि चद्रगुप्त ने विदेशी आतताइयों को भी खदेड़ा। सिकंदर और सेल्यूकस को हराने वाले चंद्रगुप्त के राज्य में मकर संक्राति का पर्व धूमधाम से मनाया जाता था। अब आप समझ गए होंगे कि किस प्रकार खिचड़ी ने भारत का इतिहास बदल दिया था। Makar Sankranti Khichdi History
Makar Sankranti Khichdi History : मकर संक्रांति का पर्व खिचड़ी खाने वाले पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। भारत के सभी घरों में खिचड़ी खाई जाती है। खिचड़ी के भोजन को देवताओं के लिए भी दुर्लभ भोजन माना जाता है। दुनिया में ऐसे बहुत कम लोग हैं जो यह जानते हैं कि खिचड़ी ने एक बार भारत का पूरा पुराना इतिहास भी बदल दिया था। हम आपको बता रहे हैं कि आखिर खिचड़ी ने भारत का इतिहास कैसे बदल दिया था।
जब खिचड़ी ने कर दिया था बड़ा कमाल
खिचड़ी के द्वारा भारत के इतिहास को बदलने की यह घटना बहुत पुरानी घटना है। यह घटना उस समय की है जब मगध में नंदवंश का शासन था। नंदवंश का आखिरी शासक था घनानंद और सम्राट घनानंद बहुत कू्रर था। जब आचार्य चाणक्य मगध के दरबार में घनानंद से उसकी सहायता मांगने पहुंचे कि वह विदेशी आक्रमणों के खिलाफ अभियान की तैयारी करे तो मद में चूर घनानंद ने चाणक्य का अपमान कर दिया। इस अपमान से नाराज चाणक्य ने अपनी शिखा खोल ली और घनानंद के सर्वनाश की सौगंध खा ली। उन्होंने इसके लिए घनानंद का ही एक सैनिक चंद्रगुप्त मिल गया, जिसे घनानंद ने प्रशिक्षित किया। इसके बाद गुरु-शिष्य दोनों ही मगध की नींव हिलाने निकल पड़े। चंद्रगुप्त ने लगभग पांच हजार घुड़सवारों की छोटी-सी सेना बना ली थी। सेना लेकर उन्होंने एक दिन भोर के समय ही मगध की राजधानी पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर दिया। चाणक्य, धनानंद की सेना और किलेबंदी का आंकलन नहीं कर पाए और दोपहर से पहले ही धनानंद की सेना ने चंद्रगुप्त और उसके सहयोगियों को बुरी तरह मारा और खदेड़ दिया।
खिचड़ी खाकर बनी रणनीति ने सब कुछ बदल डाला था
उस रोज चंद्रगुप्त को जान बचाने के लिए पीछे हटना पड़ा। चंद्रगुप्त-चाणक्य वेश बदलकर घूम रहे थे और बिखरी हुई शक्ति को फिर से एक करने में जुटे हुए थे। वह किसी भी जगह पर एक रात से अधिक नहीं ठहरते थे। वेश बदलने के साथ ही भोजन-पानी के लिए भिक्षा का सहारा ले रखा था। इसी क्रम में वे गांव के बाहर एक वृद्धा के घर रुके हुए थे। बूढ़ी माता ने अतिथियों का स्वागत किया और भोजन के लिए खिचड़ी बनाई। थाली के बीच गड्ढा कर उन्होंने घी डाल दिया और गरमा गर्म खिचड़ी चंद्रगुप्त और चाणक्य के सामने परोस दी। घी को मिलाने के लिए चंद्रगुप्त ने जैसे ही थाली के बीच हाथ डाला, तो उनकी उंगलियां जल गईं। बूढ़ी मां ने बालक समझकर चंद्रगुप्त को डपट दिया- मूर्ख हो क्या, खिचड़ी गर्म है, पहले किनारे से खाओ, फिर बीच तक पहुंचना। चंद्रगुप्त ने ऐसा ही किया और चाणक्य समझ गए कि आगे भी ऐसा ही करना है। उन्होंने चंद्रगुप्त से कहा- समझ गए गलती कहां हुई? हमें सीधे पाटलिपुत्र पर आक्रमण नहीं करना है, बल्कि पहले किनारों को जीतना है। चाणक्य और चंद्रगुप्त ने वृद्धा को गुरु मानकर उनके पैर छुए और फिर पाटलिपुत्र के किनारे वाले राज्यों को जीतना शुरू किया। मौर्य साम्राज्य की स्थापना में प्रमुख किरदार बन गई खिचड़ी इतिहास कहता है कि चंद्रगुप्त ने मगध पर आक्रमण के छह युद्ध हारे थे, लेकिन सातवें युद्ध से उसकी जीत का जो सिलसिला शुरू हुआ वह कभी नहीं रुका। चंद्रगुप्त हर युद्ध जीतता रहा और फिर उसने मगध के निरंकुश शासक का नाश कर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। खिचड़ी का ही प्रभाव था कि चद्रगुप्त ने विदेशी आतताइयों को भी खदेड़ा। सिकंदर और सेल्यूकस को हराने वाले चंद्रगुप्त के राज्य में मकर संक्राति का पर्व धूमधाम से मनाया जाता था। अब आप समझ गए होंगे कि किस प्रकार खिचड़ी ने भारत का इतिहास बदल दिया था। Makar Sankranti Khichdi History












