खिचड़ी ने बदल दिया था भारत का पुराना इतिहास

दुनिया में ऐसे बहुत कम लोग हैं जो यह जानते हैं कि खिचड़ी ने एक बार भारत का पूरा पुराना इतिहास भी बदल दिया था। हम आपको बता रहे हैं कि आखिर खिचड़ी ने भारत का इतिहास कैसे बदल दिया था।

खिचड़ी वाली कथा
खिचड़ी वाली कथा
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar14 Jan 2026 05:03 PM
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Makar Sankranti Khichdi History : मकर संक्रांति का पर्व खिचड़ी खाने वाले पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। भारत के सभी घरों में खिचड़ी खाई जाती है। खिचड़ी के भोजन को देवताओं के लिए भी दुर्लभ भोजन माना जाता है। दुनिया में ऐसे बहुत कम लोग हैं जो यह जानते हैं कि खिचड़ी ने एक बार भारत का पूरा पुराना इतिहास भी बदल दिया था। हम आपको बता रहे हैं कि आखिर खिचड़ी ने भारत का इतिहास कैसे बदल दिया था।

जब खिचड़ी ने कर दिया था बड़ा कमाल

खिचड़ी के द्वारा भारत के इतिहास को बदलने की यह घटना बहुत पुरानी घटना है। यह घटना उस समय की है  जब मगध में नंदवंश का शासन था। नंदवंश का आखिरी शासक था घनानंद और सम्राट घनानंद बहुत कू्रर था। जब आचार्य चाणक्य मगध के दरबार में घनानंद से उसकी सहायता मांगने पहुंचे कि वह विदेशी आक्रमणों के खिलाफ अभियान की तैयारी करे तो मद में चूर घनानंद ने चाणक्य का अपमान कर दिया। इस अपमान से नाराज चाणक्य ने अपनी शिखा खोल ली और घनानंद के सर्वनाश की सौगंध खा ली।  उन्होंने इसके लिए घनानंद का ही एक सैनिक चंद्रगुप्त मिल गया, जिसे घनानंद ने प्रशिक्षित किया। इसके बाद गुरु-शिष्य दोनों ही मगध की नींव हिलाने निकल पड़े। चंद्रगुप्त ने लगभग पांच हजार घुड़सवारों की छोटी-सी सेना बना ली थी। सेना लेकर उन्होंने एक दिन भोर के समय ही मगध की राजधानी पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर दिया। चाणक्य, धनानंद की सेना और किलेबंदी का आंकलन नहीं कर पाए और दोपहर से पहले ही धनानंद की सेना ने चंद्रगुप्त और उसके सहयोगियों को बुरी तरह मारा और खदेड़ दिया।

खिचड़ी खाकर बनी रणनीति ने सब कुछ बदल डाला था

उस रोज चंद्रगुप्त को जान बचाने के लिए पीछे हटना पड़ा। चंद्रगुप्त-चाणक्य वेश बदलकर घूम रहे थे और बिखरी हुई शक्ति को फिर से एक करने में जुटे हुए थे। वह किसी भी जगह पर एक रात से अधिक नहीं ठहरते थे। वेश बदलने के साथ ही भोजन-पानी के लिए भिक्षा का सहारा ले रखा था। इसी क्रम में वे गांव के बाहर एक वृद्धा के घर रुके हुए थे। बूढ़ी माता ने अतिथियों का स्वागत किया और भोजन के लिए खिचड़ी बनाई। थाली के बीच गड्ढा कर उन्होंने घी डाल दिया और गरमा गर्म खिचड़ी चंद्रगुप्त और चाणक्य के सामने परोस दी। घी को मिलाने के लिए चंद्रगुप्त ने जैसे ही थाली के बीच हाथ डाला, तो उनकी उंगलियां जल गईं। बूढ़ी मां ने बालक समझकर चंद्रगुप्त को डपट दिया- मूर्ख हो क्या, खिचड़ी गर्म है, पहले किनारे से खाओ, फिर बीच तक पहुंचना। चंद्रगुप्त ने ऐसा ही किया और चाणक्य समझ गए कि आगे भी ऐसा ही करना है। उन्होंने चंद्रगुप्त से कहा- समझ गए गलती कहां हुई? हमें सीधे पाटलिपुत्र पर आक्रमण नहीं करना है, बल्कि पहले किनारों को जीतना है। चाणक्य और चंद्रगुप्त ने वृद्धा को गुरु मानकर उनके पैर छुए और फिर पाटलिपुत्र के किनारे वाले राज्यों को जीतना शुरू किया। मौर्य साम्राज्य की स्थापना में प्रमुख किरदार बन गई खिचड़ी इतिहास कहता है कि चंद्रगुप्त ने मगध पर आक्रमण के छह युद्ध हारे थे, लेकिन सातवें युद्ध से उसकी जीत का जो सिलसिला शुरू हुआ वह कभी नहीं रुका। चंद्रगुप्त हर युद्ध जीतता रहा और फिर उसने मगध के निरंकुश शासक का नाश कर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। खिचड़ी का ही प्रभाव था कि चद्रगुप्त ने विदेशी आतताइयों को भी खदेड़ा। सिकंदर और सेल्यूकस को हराने वाले चंद्रगुप्त के राज्य में मकर संक्राति का पर्व धूमधाम से मनाया जाता था। अब आप समझ गए होंगे कि किस प्रकार खिचड़ी ने भारत का इतिहास बदल दिया था। Makar Sankranti Khichdi History

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स्थानों तथा योजनाओं के नाम बदलकर क्या साबित कर रही है सरकार

भारत सरकार ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के प्रचलित नाम को बदलकर सेवा तीर्थ कर दिया है। ऐसे में यह सवाल उठना जरूरी है कि नाम बदलने से क्या होगा? भारत सरकार के नाम बदलने वाले अभियान का हमने पूरा विश्लेषण किया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar14 Jan 2026 04:14 PM
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Name Change Policy of Modi Government : भारत में स्थानों, सडक़ों, शहरों, सरकारी दफ्तरों, रेलवे स्टेशनों तथा सरकारी योजनाओं का नाम बदलने का बड़ा अभियान चल रहा है। भारत सरकार ने तो ऐतिहासिक स्थानों के नाम बदलने का रिकार्ड ही कायम कर डाला है। भारत सरकार ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के प्रचलित नाम को बदलकर सेवा तीर्थ कर दिया है। ऐसे में यह सवाल उठना जरूरी है कि नाम बदलने से क्या होगा? भारत सरकार के नाम बदलने वाले अभियान का हमने पूरा विश्लेषण किया है।

आपको समझाने के लिए कम शब्दों में पूरा विश्लेषण

भारत सरकार के नाम बदलने वाले अभियान के पीछे क्या सोच है। स्थानों तथा योजनाओं के नाम बदलने के विषय में भारत सरकार की क्या सोच है? नाम बदलने को लेकर विपक्षी दल क्या सोचते हैं? भारत सरकार द्वारा नाम बदलने के अभियान के विषय में भारत के आम नागरिकों की क्या सोच है? इन सभी सवालों के विषय में हमने पूरा विश्लेषण किया है। यह पूरा विश्लेषण हम बेहद कम शब्दों में आप तक पहुंचा रहे हैं।

नाम बदलने की राजनीति या नई प्रशासनिक सोच?

मोदी सरकार की ‘नेम चेंज पॉलिसी’ का गहन विश्लेषण

भारत में स्थानों, इमारतों और संस्थानों के नाम बदलने की परंपरा नई नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यह प्रक्रिया एक स्पष्ट वैचारिक नीति के रूप में उभर कर सामने आई है। राजपथ से कर्तव्य पथ, रेसकोर्स रोड से लोक कल्याण मार्ग और अब प्रधानमंत्री कार्यालय से सेवा तीर्थ—ये सभी बदलाव केवल नाम नहीं, बल्कि शासन की सोच और दिशा को दर्शाने वाले प्रतीक बन गए हैं।

1. ‘सत्ता’ से ‘सेवा’ की ओर: नामों के पीछे का दर्शन

मोदी सरकार का दावा है कि ये नाम परिवर्तन औपनिवेशिक और शासक-केंद्रित सोच से हटकर लोक-सेवा और कर्तव्य-बोध की भावना को मजबूत करने के लिए किए गए हैं।

        PMO ➝ सेवा तीर्थ

यह संदेश देता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय सत्ता का केंद्र नहीं, बल्कि जनता की सेवा का तीर्थ है।

      राजपथ ➝ कर्तव्य पथ

सत्ता के प्रदर्शन के मार्ग को जिम्मेदारी और कर्तव्य के प्रतीक में बदला गया।

    रेसकोर्स रोड ➝ लोक कल्याण मार्ग

शासक की निजी सुविधा से जनता के कल्याण की प्राथमिकता का संकेत।

👉 विश्लेषण:

यह बदलाव एक तरह से प्रशासनिक शब्दावली को value-driven governance से जोड़ने की कोशिश है।

2. औपनिवेशिक विरासत से मुक्ति का प्रयास

सरकार का तर्क है कि कई नाम ब्रिटिश काल की मानसिकता को दर्शाते थे—


·       राज, पथ, रेसकोर्स, दरबार जैसे शब्द सत्ता और शासक वर्ग को प्राथमिकता देते हैं।


·        नए नामों में लोक, कर्तव्य, सेवा, कल्याण जैसे शब्द शामिल किए गए।


👉 विश्लेषण:

यह प्रक्रिया उसी श्रृंखला का हिस्सा है जिसमें


·         इंडियागेट के पास नेताजी की प्रतिमा,


·         संसद में लोकतांत्रिक प्रतीकों का पुनर्संयोजन,


·         और नई संसद भवन की अवधारणा शामिल है।


📊 3. क्या यह केवल प्रतीकात्मक राजनीति है?

विपक्ष और आलोचक सवाल उठाते हैं—


·         क्या नाम बदलने से बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे हल होंगे?


·         क्या करोड़ों रुपये खर्च कर नाम बदलना प्राथमिकता होनी चाहिए?


👉 जवाबी विश्लेषण:

समर्थकों का कहना है कि


·         हर समाज को अपने प्रतीकों और नैरेटिव की जरूरत होती है।


·         जैसे संविधान, ध्वज और राष्ट्रगान प्रतीक हैं—वैसे ही सार्वजनिक नाम भी।


नाम बदलना policy execution नहीं, बल्कि policy narrative का हिस्सा है।


🗳️ 4. राजनीतिक लाभ और चुनावी मनोविज्ञान

नाम परिवर्तन की नीति का एक राजनीतिक पक्ष भी है—


·         यह राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की भावना को मजबूत करती है।


·         यह सरकार के कोर वोटबेस को यह संदेश देती है कि “हम पहचान वापस ला रहे हैं।”


👉 विश्लेषण:

यह नीति


·         भावनात्मक जुड़ाव (emotional connect) बनाती है,


·         और सरकार की strong leadership image को पुष्ट करती है।


🏗️ 5. प्रशासनिक स्तर पर प्रभाव

प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार—


·         नई इमारतें, नए नाम और नई संरचनाएं वर्क कल्चर बदलने का प्रयास हैं।


·         ‘कर्तव्य भवन’ या ‘सेवा तीर्थ’ जैसे नाम कर्मचारियों को उनके रोल की याद दिलाते हैं।


👉 विश्लेषण:

हालांकि नाम बदलने से कार्यक्षमता अपने-आप नहीं बढ़ती,

लेकिन यह संस्थागत सोच को प्रभावित जरूर करता है।


🌍 6. अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में भारत की छवि

दुनिया के कई देशों में—


·         दक्षिण अफ्रीका, रूस, तुर्की जैसे देशों ने भी

सत्ता परिवर्तन के बाद नाम और प्रतीक बदले।


👉 विश्लेषण:

भारत भी अब खुद को


·         एक Post-colonial confident nation


·         और civilizational state के रूप में पेश कर रहा है।


🧠 7. जनता क्या सोचती है?

जन-प्रतिक्रिया बंटी हुई है—


✔️ एक वर्ग इसे गर्व और आत्मसम्मान से जोड़ता है

❌ दूसरा वर्ग इसे ध्यान भटकाने की राजनीति मानता है


👉 सच यह है

नाम बदलना न तो चमत्कार है, न ही पूरी तरह निरर्थक—

यह एक वैचारिक संदेश है, जिसका असर समय के साथ आंका जाएगा।


📌 निष्कर्ष: नाम से आगे की यात्रा

मोदी सरकार की Name Change Policy को केवल समर्थन या विरोध की नजर से देखना पर्याप्त नहीं।

यह नीति—


·         भारत की राजनीतिक भाषा,


·         प्रशासनिक प्रतीकों


·         और सांस्कृतिक आत्म-बोध

को नया आकार देने की कोशिश है।


अब असली परीक्षा यह है कि

क्या ‘सेवा’ और ‘कर्तव्य’ सिर्फ नामों में रहेंगे,

या शासन के व्यवहार में भी दिखेंगे? Name Change Policy of Modi Government


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जो इंसानों के लिए कभी नहीं हुआ वह कुत्तों के लिए हो गया

मंगलवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता ने खुद कहा कि जितनी लम्बी बहस कुत्तों के ऊपर सुनी है उतनी लम्बी बहस उन्होंने कभी भी इंसानों के ऊपर नहीं सुनी।

आवारा कुत्तों के बढ़ते हमले पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
आवारा कुत्तों के बढ़ते हमले पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar14 Jan 2026 03:59 PM
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Supreme Court stray dogs case : भारत में इन दिनों कुत्ते बहुत खास हो गए हैं। भारत के सुप्रीम कोर्ट से लेकर सडक़ तक कुत्तों की ही चर्चा हो रही है। आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि भारत में जो काम इंसानों के लिए कभी नहीं हुआ वही काम भारत के कुत्तों के लिए हो गया है। इतना ही नहीं भारत की सबसे बड़ी अदालत यानि भारत का सुप्रीम कोर्ट कुत्तों के लिए लड़ाई लडऩे वाली सबसे बड़ी संस्था बन गई है।

इंसानों की बजाय कुत्तों पर मेहरबान हुआ सुप्रीम कोर्ट

आपको बता दें कि भारत के सुप्रीम कोर्ट में पिछले 6 महीने से कुत्तों का मामला छाया हुआ है। यह मामला आवारा कुत्तों से जुड़ा हुआ है। सडक़ों पर घूमने वाले आवारा कुत्तों को लेकर भारत के सुप्रीम कोर्ट में इतनी लम्बी बहस हो चुकी है जितनी लम्बी बहस भारत में कभी इंसानों के लिए नहीं हुई। मंगलवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता ने खुद कहा कि जितनी लम्बी बहस कुत्तों के ऊपर सुनी है उतनी लम्बी बहस उन्होंने कभी भी इंसानों के ऊपर नहीं सुनी।

आवारा कुत्तों को खाना खिलाना पड़ेगा भारी

आवारा कुत्तों को लेकर भारत के सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक बड़ा फैसला सुनाया। देशभर में लावारिस कुत्तों के काटने की बढ़ती घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि अब ऐसे मामलों में राज्य सरकार और स्थानीय नगरीय निकायों को भारी मुआवजा चुकाना होगा। अदालत ने कहा, कुत्ते के काटने पर उन्हें खाना खिलाने वाले लोगों और संगठनों की भी जवाबदेही तय की जाएगी। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की विशेष पीठ इस मुद्दे पर स्वत:संज्ञान लेकर सुनवाई कर रही थी। जस्टिस नाथ ने कहा, लावारिस कुत्ते के हमले में किसी बच्चे या बुजुर्ग की मौत होती है या वह गंभीर जख्मी होता है, तो हम तय करेंगे कि राज्य सरकार और स्थानीय निकाय उन्हें भारी मुआवजा दें, क्योंकि उन्होंने कोते पांच साल में नियम लागू करने कौ अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई है। जस्टिस नाथ ने कुत्तों को खाना खिलाने वालों को भी चेतावनी दी, यदि वे इन जानवरों की चिंता करते हैं, तो उन्हें अपने घरों में रखें। सडक़ों पर खुला छोडक़र लोगों की डराने और काटने देना मंजूर नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने उठाया जिम्मेदारी का बड़ा सवाल

इस दौरान सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संदीप मेहता ने भी चिंता जताते हुए पूछा, जब नौ साल का बच्चा कुत्ते के हमले का शिकार होता है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा। आप चाहते हैं कि हम आंखें मूंद लें। लावारिस कुत्ते किसी के स्वामित्व में नहीं होते और यदि कोई उन्हें पालना चाहता है, तो उसे कानून के तहत लाइसेंस लेकर पालतू बनाना चाहिए। पीठ नवंबर, 2025 में दिए अपने आदेश के अनुपालन की निगरानी कर रही है, जिसमें बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, अस्पताल, स्कूल, कॉलेज और अन्य सार्वजनिक संस्थानों से लावारिस कुत्तों को हटाने के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया था कि कुत्तों का टीकाकरण और नियमों के तहत नसबंदी की जाए और उन्हें उसी स्थान पर वापस न छोड़ा जाए। Supreme Court stray dogs case


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