क्या विभीषण वास्तव में भगवान श्रीराम के सच्चे भक्त थे या उनकी शरणागति के पीछे सत्ता की लालसा और राजनीतिक महत्वाकांक्षा छिपी थी ? क्या विभीषण की शरणागति केवल धर्म के प्रति समर्पण थी या उसमें लंका के भावी राजा बनने की आकांक्षा भी शामिल थी ?

मातृभूमि से गद्दारी, भ्रातृ-द्रोह और सत्ता की लालसा के बीच राम-भक्ति का सवाल
चेतना मंच | दृष्टिकोण
Editorial : संपादकीय टिप्पणी: विभीषण को पारंपरिक आख्यानों में भगवान श्रीराम के महान भक्त के रूप में स्थापित किया गया है। लेकिन क्या किसी का भक्त कहलाने के लिए केवल उसके पक्ष में खड़ा होना पर्याप्त है, या उसके जीवन और आचरण का मूल्यांकन उन आदर्शों की कसौटी पर भी होना चाहिए, जिनका वह प्रतिनिधि होने का दावा करता है ? विभीषण के चरित्र को लेकर यही सवाल एक गंभीर वैचारिक बहस खड़ी करता है। Editorial
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पारंपरिक आख्यानों में विभीषण को एक महान 'राम-भक्त' के रूप में स्थापित किया गया है, किंतु यह स्थापना तार्किक धरातल पर पूरी तरह खोखली सिद्ध होती है। किसी का भक्त होने का वास्तविक अर्थ उसके सिद्धांतों और आदर्शों को अपने जीवन में उतारना होता है। श्रीराम के संपूर्ण जीवन दर्शन का सबसे केंद्रीय और सर्वोच्च आदर्श है: "अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥" (हे लक्ष्मण! भले ही यह लंका सोने की है, पर यह मुझे नहीं लुभाती। माता और मातृभूमि का स्थान स्वर्ग से भी उच्च है।) श्रीराम का पूरा चरित्र इसी राष्ट्र-आदर्श और भ्रातृ-प्रेम की धुरी पर टिका है। इसके विपरीत, विभीषण का पूरा जीवन इसी पावन आदर्श की हत्या पर खड़ा दिखाई देता है। विभीषण ने अपने व्यक्तिगत अपमान का प्रतिशोध लेने और अपनी छिपी हुई राजनैतिक लिप्सा को शांत करने के लिए अपनी ही जननी, अपनी ही मिट्टी यानी लंका के साथ ऐसा भीषण विद्रोह किया कि सोने की लंका मलबे और लाशों के ढेर में तब्दील हो गई। जो व्यक्ति राम के सबसे बड़े और मूलभूत जीवन-मूल्य—'मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है'—की सरेआम धज्जियां उड़ा दे, उसे 'राम-भक्त' कहना केवल एक राजनैतिक आवरण और नीतिगत मुखौटा मात्र है। विभीषण की भक्ति वास्तव में उनकी कौटुम्बिक क्रूरता और सत्ता की भूख को छुपाने का एक वैचारिक साधन थी। Editorial
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विभीषण के तथाकथित 'सात्विक और धार्मिक' चरित्र पर सबसे बड़ा और अकाट्य प्रश्नचिह्न उनकी राजनैतिक प्राथमिकताओं से उठता है। जब रावण ने भरी सभा में विभीषण को लात मारकर अपमानित किया और लंका से निष्कासित कर दिया, तब यदि विभीषण वास्तव में एक विरक्त, सात्विक और केवल अधर्म से दूर रहने वाले व्यक्ति होते, तो उनके पास लंका से बाहर गरिमापूर्ण जीवन जीने के कई विकल्प थे। वे अपने पिता महर्षि विश्रवा के आश्रम जा सकते थे और वहाँ एक ऋषिपुत्र की भाँति सात्विक, धार्मिक और शांतिमय जीवन व्यतीत कर सकते थे। वे अलकापुरी जाकर अपने सगे बड़े भाई कुबेर के साथ रह सकते थे, जो स्वयं देवताओं के समान प्रतिष्ठित और सात्विक प्रवृत्ति के थे। किंतु विभीषण ने किसी तपोवन या भाई के आश्रय को नहीं चुना। वे अपमानित होते ही सीधे शत्रु सेना यानी श्रीराम के पाले में पहुँचे। यह कृत्य सिद्ध करता है कि वे कोई विरक्त महात्मा नहीं थे। उनका यह कदम एक सोची-समझी राजनैतिक बिसात थी, जिसका एकमात्र उद्देश्य अपने अपमान का प्रतिशोध लेना, रावण का समूल नाश करवाना और विदेशी सत्ता के सहयोग से लंका के राजसिंहासन पर अधिकार करना था। Editorial
जब हम भ्रातृ-प्रेम और पारिवारिक त्याग की बात करते हैं, तो अयोध्या का कुल संपूर्ण मानवता के लिए एक सर्वोच्च मानदंड स्थापित करता है। यहाँ त्याग की दो ऐसी धाराएँ हैं, जो विभीषण के भ्रातृ-द्रोह को पूरी तरह नग्न कर देती हैं। Editorial
लक्ष्मण के वन-गमन के पीछे राजा दशरथ की कोई आज्ञा नहीं थी, न ही प्रजा का कोई दबाव था। वे पूरी तरह स्वतंत्र थे कि अयोध्या के वैभव में रहकर युवराज पद का सुख भोगें। किंतु अपने भाई-भाभी की सुरक्षा और सेवा के लिए उन्होंने अपनी नवोढ़ा पत्नी उर्मिला को महल के आंसुओं में पीछे छोड़ दिया। लक्ष्मण का यह त्याग केवल महल छोड़ने तक सीमित नहीं था; उन्होंने चौदह वर्षों तक अपनी आँखों से नींद को त्याग दिया, ताकि वे घने जंगलों में हिंसक पशुओं और राक्षसों से अपने भाई-भाभी की चौबीसों घंटे रक्षा कर सकें। बिना किसी आदेश के, केवल भ्रातृ-प्रेम और सुरक्षा के एक अनकहे संकल्प के लिए जीवन के चौदह अमूल्य वर्ष कंदमूल खाकर बिता देना लक्ष्मण को अनन्य निष्ठा का प्रतीक बनाता है। Editorial
दूसरी ओर, भरत का त्याग इस आदर्श को एक और अलौकिक ऊँचाई पर ले जाता है। बड़े भाई राम के वनगमन के पश्चात संपूर्ण निष्कंटक साम्राज्य उनके सामने था। वे चाहते तो स्वेच्छा से राजा बन सकते थे, किंतु उन्होंने राजसी वैभव को लात मार दी। भरत ने न केवल राम की खड़ाऊँ यानी चरण-पादुकाओं को सिंहासन पर प्रतिष्ठित किया, बल्कि स्वयं चौदह वर्षों तक नंदीग्राम की एक कुटिया में रहकर, तपस्वी की भाँति मात्र एक 'सेवक' की भूमिका में राज्य का संचालन किया। इसके ठीक विपरीत, लंका का दृश्य विभीषण के रूप में एक भयानक कौटुम्बिक विरोधाभास और 'भ्रातृ-द्रोह' प्रस्तुत करता है। अयोध्या के भाई जहाँ बिना किसी आदेश के सिंहासन को लात मारकर एक-दूसरे के सेवक और रक्षक बन रहे थे, वहीं विभीषण अपने ही भाइयों के संहार की योजना बनाकर लंका के सिंहासन की ओर बढ़ रहे थे। विभीषण का यह कृत्य इस कौटुम्बिक पृष्ठभूमि में चरम स्वार्थ का प्रतीक बन जाता है। Editorial
जब विभीषण रावण द्वारा निष्कासित होकर राम के शिविर में पहुँचे, तब अभी लंका का युद्ध प्रारंभ भी नहीं हुआ था, न ही वरुण-देव पर सेतु का निर्माण हुआ था। विभीषण एक अत्यंत चतुर शतरंज के खिलाड़ी की भाँति, लंका के भावी सिंहासन पर अपने वैधानिक अधिकार की मुहर लगवाने की लालसा लेकर आए थे। उन्होंने अपनी 'शरणागति' को एक राजनैतिक सौदेबाज़ी (Strategic Deal) के रूप में प्रस्तुत किया। एक महान दूरदर्शी कूटनीतिज्ञ के रूप में, श्रीराम ने विभीषण की इस आंतरिक महत्वाकांक्षा को क्षण भर में पहचान लिया। राम ने एक कुशल राजनेता (Statesman) की भाँति न्यूनतम सैन्य हानि के साथ लोक-कल्याण के युद्ध को जीतने के लिए विभीषण की इसी कमज़ोरी का उपयोग किया। राम ने लक्ष्मण को आज्ञा देकर युद्ध से पूर्व ही समुद्र के जल से विभीषण का लंका के राजा के रूप में 'अग्रिम राज्याभिषेक' करवा दिया। इस तिलक ने विभीषण को लंका की गद्दी के ऐसे व्यक्तिगत हित से आबद्ध कर दिया कि वह चाहकर भी अब पीछे नहीं मुड़ सकता था। Editorial
धार्मिक अंधता से मुक्त होकर यदि हम रणभूमि में विभीषण के निर्णयों का विश्लेषण करें, तो वहाँ एक अत्यंत ठंडी और भयावह बौद्धिक क्रूरता (Intellectual Cruelty) दिखाई देती है। विभीषण केवल एक सूचनादाता नहीं थे, वे अपने ही कुल के रक्त को बहाने वाले लंका के सबसे आत्मघाती 'इनसाइडर मुखबिर' बन चुके थे। Editorial
जब मेघनाद निकुंभिला देवी के गुप्त मंडप में अजेय होने के लिए यज्ञ कर रहा था, तब विभीषण स्वयं लक्ष्मण की उंगली पकड़कर उस अति-गुप्त गर्भगृह तक ले गए, यज्ञ को विध्वंस करवाया और अपने सगे भतीजे के वध का मार्ग प्रशस्त किया। Editorial
अपने सगे भाई कुंभकर्ण की युद्ध-दुर्बलताओं को सार्वजनिक करना और अंततः अपने ज्येष्ठ भ्राता रावण की नाभि में छिपे जीवन-अमृत के परम गुप्त रहस्य को उजागर करना, विभीषण के चरित्र को इतिहास के सबसे क्रूरतम न्याय के कटघरे में खड़ा करता है। विभीषण की यह चालाकी सिद्ध करती है कि उनकी भक्ति वास्तव में उनके सगे भाइयों की लाशों पर खड़े होने वाले सिंहासन की लालसा को वैध बनाने का एक साधन मात्र थी। Editorial
इतिहास का क्रूरतम न्याय यही है कि जो अपनी जननी और अपनी मिट्टी का सगा नहीं हो सका, वह सोने के सिंहासन पर बैठकर भी कभी लोक-मानस में वंदनीय नहीं हो सका। विभीषण ने लंका की भौतिक दीवारों का पुनर्निर्माण तो कर दिया, लेकिन लंका की संप्रभु आत्मा को उन्होंने सदैव के लिए मार दिया। वे इतिहास में एक ऐसे छद्म-भक्त और अवसरवादी के रूप में दर्ज हुए, जिनकी पूजा करने के लिए पूरे आर्यावर्त में एक भी मंदिर निर्मित नहीं हुआ, क्योंकि भारतीय जनमानस ने उनके कथित 'धर्म' से ऊपर उनकी 'मातृभूमि से गद्दारी', 'भ्रातृ-द्रोह' और 'क्रूर राजनैतिक मुखबिरी' को सर्वोपरि रखा। Editorial
यदि हम विभीषण के इस कृत्य को 'धर्म' कहकर सही ठहराते हैं, तो हम एक बेहद खतरनाक मिसाल कायम कर रहे हैं। अगर आज की लोकतांत्रिक सरकारों या राष्ट्रों की पृष्ठभूमि में इसे देखा जाए, तो क्या सरकार के किसी कड़े फैसले, नीति या किसी कार्रवाई से असंतुष्ट व्यक्ति को यह अधिकार मिल जाता है कि वह देश छोड़कर शत्रु राष्ट्र के खेमे में जा बैठे? क्या वह व्यथित होकर अपने ही देश के सैन्य रहस्य, खुफिया जानकारियां और गोपनीय नीतियां दुश्मन देश को सौंप दे? आज की तारीख में ऐसे कृत्य को 'देशद्रोह' या 'राष्ट्र के साथ विश्वासघात' कहा जाता है, न कि धर्म या नीति का मार्ग। सरकारें बदल सकती हैं, राजा आ और जा सकते हैं, लेकिन राष्ट्र और मातृभूमि स्थाई होती है। शासक की गलती की सजा पूरे देश को नहीं दी जा सकती। इसलिए, विभीषण का मूल्यांकन करते समय हमें यह स्पष्ट करना होगा कि रावण का अधर्म एक अलग विषय था, लेकिन विभीषण द्वारा अपनी ही मातृभूमि के सैन्य रहस्यों को दुश्मन के आगे खोलना किसी भी कसौटी पर राष्ट्रभक्ति या सच्ची ईश्वर-भक्ति नहीं कही जा सकती। यह कुल और राष्ट्र के प्रति एक अक्षम्य कृत्य था।
चेतना मंच का दृष्टिकोण : विभीषण के चरित्र पर विचार करते समय मूल प्रश्न यही है कि धर्म, निष्ठा, परिवार और मातृभूमि के प्रति कर्तव्य के बीच मनुष्य किसे प्राथमिकता देता है। क्या सत्ता प्राप्त करने के लिए अपने ही कुल और अपनी मिट्टी के विरुद्ध खड़ा होना उचित ठहराया जा सकता है? विभीषण की कथा इन सवालों को बार-बार हमारे सामने रखती है। Editorial
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