AIIMS Faculty Vacancy: एम्स में 2561 प्रोफेसर पद खाली, सरकार बना रही नया भर्ती प्लान
एम्स में प्रोफेसरों के 2561 पद खाली हैं। आरक्षित वर्ग में उम्मीदवार न मिलने से संकट गहराया। सरकार अब कुल पद बढ़ाकर नई भर्ती योजना पर काम कर रही है।

देश के प्रमुख स्वास्थ्य संस्थानों में गिने जाने वाले एम्स में प्रोफेसरों की भारी कमी सामने आई है। संसद और आरटीआई के माध्यम से सामने आए आंकड़ों के अनुसार एम्स में प्रोफेसरों के लगभग 40 फीसदी पद खाली हैं। इस स्थिति ने न केवल मेडिकल शिक्षा बल्कि मरीजों के इलाज की व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ा दिया है। इसी चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार अब एक नया भर्ती प्लान तैयार कर रही है, जिसमें कुल स्वीकृत पदों की संख्या बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है।
एम्स में प्रोफेसरों की कमी कितनी गंभीर
देश में कुल 23 एम्स स्वीकृत हैं, जिनमें से 19 एम्स फिलहाल पूरी तरह संचालित हो रहे हैं। इन एम्स में प्रोफेसरों के कुल 6,376 पद स्वीकृत हैं, लेकिन इनमें से 2,561 पद अभी भी खाली पड़े हैं। यह संख्या कुल पदों का करीब 40 प्रतिशत है, जो किसी भी बड़े संस्थान के लिए गंभीर स्थिति मानी जाती है। प्रोफेसरों की कमी के कारण पढ़ाई, रिसर्च और मरीजों के इलाज पर सीधा असर पड़ रहा है।
आरक्षित वर्ग में उम्मीदवार न मिलना बड़ी वजह
एम्स में खाली पड़े पदों की सबसे बड़ी वजह आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों की उपलब्धता न होना है। ओबीसी, एससी और एसटी वर्ग के लिए कुल पदों में लगभग 49.5 फीसदी आरक्षण का प्रावधान है। सूत्रों के अनुसार, एम्स में जो पद खाली हैं उनमें से करीब 90 से 95 फीसदी पद इन्हीं आरक्षित श्रेणियों के हैं। कई बार विज्ञापन निकालने के बावजूद इन श्रेणियों में पर्याप्त योग्य उम्मीदवार नहीं मिल पा रहे हैं।
सरकार क्यों बढ़ाना चाहती है कुल पद
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि संस्थानों का कामकाज प्रभावित न हो। आरक्षित पदों को सामान्य श्रेणी में बदलने की प्रक्रिया बेहद लंबी और जटिल होती है। इसके लिए बार-बार विज्ञापन, संबंधित मंत्रालयों की अनुमति और आरक्षण से जुड़े आयोगों की अनापत्ति लेनी पड़ती है, जिसमें काफी समय लग जाता है। इसी वजह से सरकार अब कुल स्वीकृत पदों की संख्या बढ़ाने पर विचार कर रही है, ताकि सामान्य और आरक्षित दोनों श्रेणियों में पर्याप्त संख्या में प्रोफेसर उपलब्ध रह सकें।
खाली पद सामान्य में बदलने की प्रक्रिया क्यों कठिन
नियमों के तहत आरक्षित श्रेणी के पदों को सीधे सामान्य श्रेणी में बदलना आसान नहीं है। पहले कई बार भर्ती प्रक्रिया करनी होती है, फिर यह साबित करना पड़ता है कि उम्मीदवार उपलब्ध नहीं हैं। इसके बाद कार्मिक मंत्रालय और सामाजिक न्याय से जुड़े आयोगों की अनुमति जरूरी होती है। यही कारण है कि यह प्रक्रिया लंबी खिंच जाती है और संस्थानों को लंबे समय तक खाली पदों के साथ काम करना पड़ता है।
भर्ती तेज करने के लिए उठाए गए कदम
सरकार ने एम्स में प्रोफेसरों की भर्ती प्रक्रिया को तेज करने के लिए कुछ अहम कदम भी उठाए हैं। इसके तहत एम्स में हर तीन महीने में साक्षात्कार आयोजित किए जा रहे हैं, यानी साल में चार बार भर्ती प्रक्रिया चल रही है। इसके अलावा कुछ केंद्रीय विश्वविद्यालयों ने पद खाली होने से पहले ही भर्ती प्रक्रिया शुरू करने की पहल की है, ताकि रिक्तियों का असर कम किया जा सके।
केंद्रीय विश्वविद्यालयों में भी हालात चिंताजनक
एम्स के साथ-साथ देश के 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में भी प्रोफेसरों की भारी कमी है। यहां करीब 5,400 पद खाली पड़े हैं। इन विश्वविद्यालयों में भी आरक्षित श्रेणियों में रिक्तियों की स्थिति ज्यादा गंभीर है। आंकड़ों के अनुसार, एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग में 75 से 80 फीसदी तक पद खाली हैं। इस समस्या से निपटने के लिए यूजीसी ने सीयू चयन नाम से एक ऑनलाइन पोर्टल भी शुरू किया है, जिससे भर्ती प्रक्रिया को आसान बनाया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद बढ़ी हलचल
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षण संस्थानों में लंबे समय से खाली पड़े शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक पदों को चार महीने के भीतर भरने के निर्देश दिए थे। अदालत ने यह भी कहा था कि कुलपति और रजिस्ट्रार जैसे अहम पद एक महीने में भरे जाएं। इसके बाद सरकार और संस्थानों पर भर्ती प्रक्रिया तेज करने का दबाव बढ़ गया है।
सरकार की कोशिश और आगे की राह
सरकार ने सभी केंद्रीय संस्थानों को बैकलॉग रिक्तियों को जल्द से जल्द भरने के निर्देश दिए हैं। साथ ही आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष अभियान भी चलाए जा रहे हैं। अब कुल पदों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। यदि यह योजना लागू होती है, तो आने वाले समय में एम्स और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों की कमी कुछ हद तक दूर हो सकती है और शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार की उम्मीद की जा सकती है।
देश के प्रमुख स्वास्थ्य संस्थानों में गिने जाने वाले एम्स में प्रोफेसरों की भारी कमी सामने आई है। संसद और आरटीआई के माध्यम से सामने आए आंकड़ों के अनुसार एम्स में प्रोफेसरों के लगभग 40 फीसदी पद खाली हैं। इस स्थिति ने न केवल मेडिकल शिक्षा बल्कि मरीजों के इलाज की व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ा दिया है। इसी चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार अब एक नया भर्ती प्लान तैयार कर रही है, जिसमें कुल स्वीकृत पदों की संख्या बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है।
एम्स में प्रोफेसरों की कमी कितनी गंभीर
देश में कुल 23 एम्स स्वीकृत हैं, जिनमें से 19 एम्स फिलहाल पूरी तरह संचालित हो रहे हैं। इन एम्स में प्रोफेसरों के कुल 6,376 पद स्वीकृत हैं, लेकिन इनमें से 2,561 पद अभी भी खाली पड़े हैं। यह संख्या कुल पदों का करीब 40 प्रतिशत है, जो किसी भी बड़े संस्थान के लिए गंभीर स्थिति मानी जाती है। प्रोफेसरों की कमी के कारण पढ़ाई, रिसर्च और मरीजों के इलाज पर सीधा असर पड़ रहा है।
आरक्षित वर्ग में उम्मीदवार न मिलना बड़ी वजह
एम्स में खाली पड़े पदों की सबसे बड़ी वजह आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों की उपलब्धता न होना है। ओबीसी, एससी और एसटी वर्ग के लिए कुल पदों में लगभग 49.5 फीसदी आरक्षण का प्रावधान है। सूत्रों के अनुसार, एम्स में जो पद खाली हैं उनमें से करीब 90 से 95 फीसदी पद इन्हीं आरक्षित श्रेणियों के हैं। कई बार विज्ञापन निकालने के बावजूद इन श्रेणियों में पर्याप्त योग्य उम्मीदवार नहीं मिल पा रहे हैं।
सरकार क्यों बढ़ाना चाहती है कुल पद
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि संस्थानों का कामकाज प्रभावित न हो। आरक्षित पदों को सामान्य श्रेणी में बदलने की प्रक्रिया बेहद लंबी और जटिल होती है। इसके लिए बार-बार विज्ञापन, संबंधित मंत्रालयों की अनुमति और आरक्षण से जुड़े आयोगों की अनापत्ति लेनी पड़ती है, जिसमें काफी समय लग जाता है। इसी वजह से सरकार अब कुल स्वीकृत पदों की संख्या बढ़ाने पर विचार कर रही है, ताकि सामान्य और आरक्षित दोनों श्रेणियों में पर्याप्त संख्या में प्रोफेसर उपलब्ध रह सकें।
खाली पद सामान्य में बदलने की प्रक्रिया क्यों कठिन
नियमों के तहत आरक्षित श्रेणी के पदों को सीधे सामान्य श्रेणी में बदलना आसान नहीं है। पहले कई बार भर्ती प्रक्रिया करनी होती है, फिर यह साबित करना पड़ता है कि उम्मीदवार उपलब्ध नहीं हैं। इसके बाद कार्मिक मंत्रालय और सामाजिक न्याय से जुड़े आयोगों की अनुमति जरूरी होती है। यही कारण है कि यह प्रक्रिया लंबी खिंच जाती है और संस्थानों को लंबे समय तक खाली पदों के साथ काम करना पड़ता है।
भर्ती तेज करने के लिए उठाए गए कदम
सरकार ने एम्स में प्रोफेसरों की भर्ती प्रक्रिया को तेज करने के लिए कुछ अहम कदम भी उठाए हैं। इसके तहत एम्स में हर तीन महीने में साक्षात्कार आयोजित किए जा रहे हैं, यानी साल में चार बार भर्ती प्रक्रिया चल रही है। इसके अलावा कुछ केंद्रीय विश्वविद्यालयों ने पद खाली होने से पहले ही भर्ती प्रक्रिया शुरू करने की पहल की है, ताकि रिक्तियों का असर कम किया जा सके।
केंद्रीय विश्वविद्यालयों में भी हालात चिंताजनक
एम्स के साथ-साथ देश के 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में भी प्रोफेसरों की भारी कमी है। यहां करीब 5,400 पद खाली पड़े हैं। इन विश्वविद्यालयों में भी आरक्षित श्रेणियों में रिक्तियों की स्थिति ज्यादा गंभीर है। आंकड़ों के अनुसार, एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग में 75 से 80 फीसदी तक पद खाली हैं। इस समस्या से निपटने के लिए यूजीसी ने सीयू चयन नाम से एक ऑनलाइन पोर्टल भी शुरू किया है, जिससे भर्ती प्रक्रिया को आसान बनाया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद बढ़ी हलचल
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षण संस्थानों में लंबे समय से खाली पड़े शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक पदों को चार महीने के भीतर भरने के निर्देश दिए थे। अदालत ने यह भी कहा था कि कुलपति और रजिस्ट्रार जैसे अहम पद एक महीने में भरे जाएं। इसके बाद सरकार और संस्थानों पर भर्ती प्रक्रिया तेज करने का दबाव बढ़ गया है।
सरकार की कोशिश और आगे की राह
सरकार ने सभी केंद्रीय संस्थानों को बैकलॉग रिक्तियों को जल्द से जल्द भरने के निर्देश दिए हैं। साथ ही आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष अभियान भी चलाए जा रहे हैं। अब कुल पदों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। यदि यह योजना लागू होती है, तो आने वाले समय में एम्स और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों की कमी कुछ हद तक दूर हो सकती है और शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार की उम्मीद की जा सकती है।












