ग्रेटर नोएडा के बिसरख गांव को रावण की जन्मस्थली माना जाता है। चेतना मंच के संपादक आर.पी. रघुवंशी के रावण मंदिर से जुड़े काल्पनिक संवाद में दशानन के दृष्टिकोण से कई तीखे सवाल उठाए गए हैं।

Greater Noida News : उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में एक अत्यंत पौराणिक ग्राम है इस ग्राम का नाम है बिसरख। किसी जमाने में यह पूरी तरह गांव ही हुआ करता था लेकिन वर्तमान में कस्बा नुमा गांव बन गया है। इस गांव की सबसे बड़ी विशेषता यह है की बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं से सुसज्जित लंका जैसे महलों से बने हुए ग्रेटर नोएडा वेस्ट की कानून व्यवस्था का संचालन बिसरख गांव में ही स्थापित थाने से होता है । इसी बिसरख में पैदा हुए थे "दशानन रावण "। चेतना मंच के संपादक आर पी रघुवंशी अचानक रावण की जन्मस्थली बिसरख में पहुंच गए वहां उन्हें फिर जो अनुभव हुआ वह हूबहू नीचे वर्णित है -
दोपहर ढल चुकी थी। उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में स्थापित बिसरख ग्राम में स्थित रावण के उस भव्य मंदिर के भीतर एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी। बाहर हवाओं की सरसराहट थी, लेकिन मंदिर के गर्भगृह में बैठा मैं एक अजीब सी ऊर्जा का अनुभव कर रहा था। यह वही ऐतिहासिक स्थल है जिसे रावण की जन्मस्थली माना जाता है, जहाँ के ग्रामवासी उसकी मृत्यु के दिन शोक मनाते हैं, कोई दीया नहीं जलाते और कभी उसका पुतला नहीं फूंकते। मैं जैसे ही मंदिर के पत्थरों के फर्श पर आंखें बंद किए इस रहस्यमयी माटी को महसूस करने लगा, मुझे ऐसा आभास हुआ मानो गर्भगृह का सन्नाटा टूट रहा हो। अचानक मंदिर की दीवारों और रावण की छवि के कण-कण से एक गहरी, गूंजती हुई ओजस्वी आवाज़ उभरने लगी। ऐसा लग रहा था मानो हर ओर से रावण स्वयं झांक रहा हो और उसकी अदृश्य चेतना मुझसे सीधे संवाद कर रही हो। उस गूंज में कोई अट्टहास नहीं था, बल्कि एक तीखी वेदना और अनगिनत सवाल थे। Greater Noida News
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हवाओं में तैरती उस आवाज़ ने मुझसे पूछा: "मुझे जलाने का अधिकार तुम्हें किसने दिया, मानव ? ज़रा आंखें खोलो और अपने चारों ओर देखो!" आवाज़ में एक अजीब सा खिंचाव था, जो मुझे भीतर तक झकझोर रहा था। वह अदृश्य सत्ता पूछ रही थी, "मेरा दोष क्या था? साम्राज्य विस्तार ? इतिहास गवाह है, तुम्हारी वैदिक संस्कृति में भी अश्वमेध यज्ञ होते हैं। हर राजा, हर सम्राट अपने राज्य अधिकार का विस्तार करता है, मैंने भी वही किया। और जिस लंका पर अधिकार कर लेने का मुझ पर दोष लगाया जाता है, क्या तुम्हें उसका वास्तविक इतिहास पता भी है? वह लंका तो मेरे नाना सुमाली, और उनके भाइयों माली और माल्यवान की ही धरोहर थी। युद्ध में जय-पराजय तो होती रहती है। पराजित होकर मेरे नाना ने लंका छोड़ी थी, पर उस लंका पर से उन्होंने अपना अधिकार नहीं छोड़ा था। विश्वकर्मा से बनवाई गई उस भव्य लंका पर फिर से अधिकार प्राप्त करने की उनकी भावना हमेशा लंका में ही अटकी रही। उसी शंका और संकल्प की पुनर प्राप्ति के लिए रावण ने जन्म लिया! मेरे नाना सुमाली ने अपनी पुत्री कैकसी को विवाह के विशेष प्रयोजन के साथ ऋषि विश्रवा के आश्रम में भेजा था, ताकि दैत्यकुल और ऋषिकुल के मिलन से जो पुत्र पैदा हो, वो उनकी खोई हुई लंका पुनः प्राप्त कर सके। अपनी मां और नाना के संकल्प को पूरा करना क्या मेरा अपराध था ? या फिर उन देवताओं की निर्वीर्यता थी, जो मेरे महापराक्रम के आगे टिक न सके और मेरे बंधक बन गए ?"
मंदिर के भीतर हवा का एक गर्म झोंका आया और आवाज़ और तीखी होती गई, "मेरी तपस्या और संघर्ष को देखो! क्या तुमने कभी उस तप को देखा है जिसमें तपकर मैं विश्वविजेता बना? मैं चारों वेदों का ज्ञाता और छह शास्त्रों का मर्मज्ञ था। मैंने 'शिव तांडव स्तोत्र' रचा और शिव की आराधना में अपने ही हाथों से अपने शीश काट-काटकर चढ़ा दिए। मेरा सौतेला भाई कुबेर, जो उसी ऋषिकुल का अंश था, वह धन का देवता बना और मैं शौर्य का!"
फिर उस गूंज में एक भारी कड़वाहट घुल गई, जो आज के समय की विसंगतियों पर एक सीधा प्रहार थी, "पर तुम... तुम जो हर वर्ष मेरे दहन का उत्सव मनाते हो, ज़रा ठहरकर अपने गिरेबां में झांको ! तुम्हारे उस देश में, जहाँ हर आठ मिनट पर एक बलात्कार हो जाता है... जहाँ हर क्षण, हर घड़ी सड़कों पर निकलने वाली बच्चियाँ और महिलाएँ भयग्रस्त हैं... जहाँ गुंडे, मवाली और बलात्कारी सीना तानकर बेखौफ घूम रहे हैं... वहाँ मर्यादा का यह ढोंग क्यों? मैंने भूल की थी, पर मैंने सीता को अशोक वाटिका में ससम्मान रखा, उनकी अनुमति के बिना उन्हें छुआ तक नहीं! और आज तुम्हारे युग का मनुष्य हर घड़ी किसी न किसी रूप में स्त्री की अस्मिता को नोच रहा है।"
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गर्भगृह की गूंज धीरे-धीरे शांत होने लगी, लेकिन उसके आखिरी शब्द मंदिर की दीवारों से टकराकर मेरे कानों में प्रतिध्वनित होते रहे, "बिसरख गवाह है, यहाँ की माटी आज भी सत्य को जानती है। दूसरों के पुतले में आग लगाने की व्याकुलता छोड़ो मानव! पहले अपने भीतर पनप रहे उस असली राक्षस, उस कुत्सित मानसिकता और गुंडागर्दी का दहन करो। जब तक तुम्हारे समाज में स्त्री सुरक्षित नहीं, तब तक तुम्हें मुझ पर तीर चलाने का कोई अधिकार नहीं है..." जब मैंने अपनी आंखें खोलीं, तो मंदिर में फिर से वही मौन था। लेकिन मुझे ऐसा लग रहा था कि रावण की प्रतिमा के पीछे से अब भी वह चेतना मुझे देख रही है और समाज से अपने उन अनुत्तरित सवालों के जवाब मांग रही है। Greater Noida News
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