
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इन दिनों एक बार फिर चर्चा में हैं। वजह है उनकी वह ज़िद, जिसके तहत वे किसी भी कीमत पर पाना चाहते हैं। हालात यह हैं कि उन्होंने नॉर्वे तक पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है यहां तक कि वित्त मंत्री को फोन कर टैरिफ लगाने की धमकी तक दे डाली। दरअसल, ट्रंप की महत्वाकांक्षा सिर्फ एक वैश्विक सम्मान पाने की नहीं है, बल्कि इसके पीछे राजनीति, व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता और आत्मप्रशंसा का लंबा इतिहास जुड़ा है। आइए समझते हैं कि आखिर क्यों ट्रंप इस पुरस्कार के लिए इतने आतुर हैं । Donald Trump
अब तक अमेरिका के चार राष्ट्रपति – थियोडोर रूजवेल्ट, वुड्रो विल्सन, जिमी कार्टर और बराक ओबामा – यह सम्मान हासिल कर चुके हैं। ट्रंप की इच्छा है कि उनका नाम भी इसी श्रेणी में जुड़ जाए। पाकिस्तान और इज़राइल जैसे सहयोगी देशों से मिल रहे समर्थन ने इस चाहत को और भी बल दिया है।
ट्रंप का राजनीतिक सफर ओबामा से टकराव की पृष्ठभूमि में ही खड़ा हुआ। ओबामा को 2009 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला था, जिसे लेकर काफी विवाद भी हुआ। बावजूद इसके, ट्रंप को हमेशा यह लगता रहा कि यदि ओबामा को यह सम्मान मिल सकता है, तो उन्हें तो और आसानी से मिलना चाहिए। इसी प्रतिस्पर्धा ने उनकी महत्वाकांक्षा को और तीखा कर दिया है।
ट्रंप की इस चाहत को सहयोगी देशों ने हवा दी है। पाकिस्तान ने भारत-पाक तनाव के समय उन्हें मध्यस्थ मानते हुए नोबेल के लिए नामांकित किया। इज़राइल भी गाजा संकट में उनकी भूमिका को ‘शांति पहल’ बताकर समर्थन देता रहा है। दरअसल, इन देशों के अपने राजनीतिक और आर्थिक हित इससे जुड़े हैं। Donald Trump
ट्रंप और उनके करीबी लगातार यह प्रचारित करते हैं कि राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने हर महीने कोई न कोई शांति समझौता कराया है। चाहे मध्यपूर्व का अब्राहम समझौता हो या भारत-पाक विवाद में दखल की कोशिश—वे खुद को वैश्विक ‘शांति निर्माता’ के तौर पर प्रस्तुत करते हैं। हालांकि, भारत जैसे देश इन दावों को खारिज करते रहे हैं।
ट्रंप की सबसे बड़ी पहचान उनका बड़बोलापन है। सोशल मीडिया पर वे बार-बार खुद को शांति का मसीहा बताते हैं। कांगो-रवांडा, सर्बिया-कोसोवो, मिस्र-इथियोपिया और मध्यपूर्व जैसे कई उदाहरण गिनाकर वे तंज कसते हैं कि इतने प्रयासों के बाद भी उन्हें नोबेल नहीं मिला। असल में, यह रणनीति उनके समर्थकों के बीच राजनीतिक संदेश देने का साधन भी है।
नोबेल पुरस्कार की शुरुआत वैज्ञानिक-अविष्कारक अल्फ्रेड नोबेल ने की थी। शांति पुरस्कार के लिए नामांकन हर साल 1 फरवरी तक होता है। इसमें केवल राष्ट्राध्यक्ष, संसद सदस्य, पूर्व विजेता, प्रोफेसर और चुनिंदा अंतरराष्ट्रीय संगठन ही नाम भेज सकते हैं। नामांकन के बाद पांच सदस्यीय समिति गहन जांच और विशेषज्ञों की राय लेकर विजेता तय करती है। घोषणा अक्टूबर में और पुरस्कार वितरण 10 दिसंबर को नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में होता है।
नोबेल शांति पुरस्कार तय करने वाली समिति का गठन नॉर्वे की संसद करती है। इसी वजह से ट्रंप ने नॉर्वे पर दबाव डालना शुरू किया। नॉर्वे के प्रमुख बिजनेस अखबार के अनुसार, उन्होंने वित्त मंत्री को धमकी दी कि यदि उन्हें यह सम्मान नहीं मिला तो नॉर्वे को भारी टैरिफ झेलने होंगे। इससे पहले भी वे टैरिफ वार्ता में ऐसी मांग जता चुके हैं। Donald Trump