
अमेरिका द्वारा भारत पर 50% का भारी-भरकम टैरिफ थोपे जाने के बाद विवाद गहराता जा रहा है। जबकि चीन पर वॉशिंगटन ने महज़ 34% शुल्क लगाया है, भारत को इस तरह निशाना बनाए जाने पर सवाल उठने लगे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर साफ संदेश देते हुए कहा है कि देश को आत्मनिर्भर बनना होगा और विदेशी ब्रांड्स की बजाय स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता देनी होगी। अगर 140 करोड़ भारतीय एकजुट होकर अमेरिकी प्रोडक्ट्स का बहिष्कार कर दें, तो यह कदम सीधे अमेरिका की अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचा सकता है। Trump Tariffs
आज भारत के हर घर, दफ्तर और बाज़ार में अमेरिकी कंपनियों का वर्चस्व साफ दिखता है। अमेज़न से लेकर एप्पल, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, फेसबुक और इंस्टाग्राम तक—तकनीक, ई-कॉमर्स और सोशल मीडिया में अमेरिकी पकड़ मज़बूत है। वहीं उपभोक्ता बाजार में कोका-कोला, पेप्सी, मैकडोनाल्ड्स, केएफसी, पिज्जा हट और डोमिनोज़ जैसी कंपनियां युवाओं की पहली पसंद बनी हुई हैं। कपड़े और लाइफस्टाइल के क्षेत्र में Nike, Levi’s, Fossil और Gap जैसे ब्रांड्स की पकड़ है। इसके अलावा P&G, कोलगेट, जॉनसन एंड जॉनसन, नेस्ले और मार्स जैसी कंपनियां भारतीय रसोई और घरों में जगह बनाए बैठी हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारतीय उपभोक्ता संगठित होकर अमेरिकी प्रोडक्ट्स की खपत घटा दें और रिटेलर्स-डिस्ट्रिब्यूटर्स भी स्थानीय या वैकल्पिक ब्रांड्स को बढ़ावा दें, तो इससे अमेरिकी कंपनियों का कारोबार लड़खड़ा सकता है। भारत अमेरिकी कंपनियों के लिए दुनिया का एक बड़ा बाज़ार है। अमेज़न अकेले 97% भारतीय पिनकोड तक पहुंच चुका है, जबकि एप्पल भारत को आईफोन बिक्री का मुख्य केंद्र मान चुका है। ऐसे में अगर इन कंपनियों का मुनाफा घटा तो इसका असर सीधे वॉशिंगटन तक जाएगा।
भावनात्मक विरोध से ज़्यादा ज़रूरी है रणनीतिक फैसला। सरकार अमेरिकी उत्पादों पर काउंटर-टैरिफ बढ़ा सकती है, जबकि उद्योग जगत स्वदेशी और अन्य देशों से आयातित सस्ते विकल्पों पर भरोसा कर सकता है। गौरतलब है कि वित्त वर्ष 2024-25 में भारत-अमेरिका का कुल द्विपक्षीय व्यापार 131.84 बिलियन डॉलर का रहा। इसमें भारत का निर्यात 86.51 बिलियन डॉलर और आयात 45.33 बिलियन डॉलर था। यानी अगर भारत ने अमेरिकी कंपनियों पर दबाव बनाया, तो इसका सीधा असर अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर होगा। आर्थिक विशेषज्ञ कहते हैं—एक व्यक्ति का स्वदेशी अपनाना असरदार नहीं होगा, लेकिन अगर 140 करोड़ भारतीय संगठित होकर अमेरिकी ब्रांड्स का बहिष्कार करते हैं, तो ट्रंप प्रशासन को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना ही पड़ेगा। अमेरिका में बैठे रणनीतिकार भी जानते हैं कि भारतीय बाजार में उनकी कंपनियों की पकड़ कमजोर हुई, तो उसकी गूंज सीधे वॉशिंगटन के सत्ता गलियारों में सुनाई देगी। Trump Tariffs