महिलाओं के समान अधिकारों पर SC की बड़ी टिप्पणी, UCC को बताया रास्ता

मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के कथित उल्लंघन से जुड़ी याचिका पर मंगलवार को सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने साफ संकेत दिया कि अब इस संवेदनशील और लंबे समय से लंबित विषय पर गंभीर पहल की जरूरत है।

UCC पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी
UCC पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar10 Mar 2026 12:36 PM
bookmark

UCC : देश में महिलाओं के समान अधिकार, पर्सनल लॉ और कानूनी समानता को लेकर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने एक बार फिर समान नागरिक संहिता (UCC) के मुद्दे को केंद्र में ला दिया है। मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के कथित उल्लंघन से जुड़ी याचिका पर मंगलवार को सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने साफ संकेत दिया कि अब इस संवेदनशील और लंबे समय से लंबित विषय पर गंभीर पहल की जरूरत है। अदालत की टिप्पणी ने न सिर्फ कानूनी हलकों में हलचल बढ़ाई है, बल्कि महिलाओं के अधिकार, समानता और न्याय की बहस को भी नई धार दे दी है।

विधायिका को पहल करने का संकेत

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि अलग-अलग पर्सनल लॉ से उत्पन्न जटिलताओं का स्थायी समाधान न्यायालय के आदेश से नहीं, बल्कि विधायिका द्वारा बनाए गए कानून से ही संभव है। अदालत ने कहा कि यदि व्यक्तिगत कानूनों को सीधे अमान्य घोषित कर दिया जाए तो इससे कानूनी शून्य की स्थिति पैदा हो सकती है। इसलिए बेहतर होगा कि संसद इस विषय पर स्पष्ट कानून बनाए।

महिलाओं के समान अधिकार के लिए UCC पर जोर

मुस्लिम महिलाओं को उत्तराधिकार में समान अधिकार दिलाने की मांग से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि देश की सभी महिलाओं को समान अधिकार सुनिश्चित करने का एक प्रभावी तरीका समान नागरिक संहिता हो सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि पर्सनल लॉ से जुड़े कई प्रावधान ऐसे हैं, जिनकी वजह से महिलाओं को समान अधिकार मिलने में कठिनाई होती है। सुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि क्या पर्सनल लॉ के आधार पर होने वाले सभी द्विविवाह संबंधों को अमान्य घोषित किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि इस तरह के मुद्दों पर अंतिम निर्णय लेने के लिए विधायिका की भूमिका अहम है, क्योंकि मौलिक कर्तव्यों और समानता के सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए कानून बनाना संसद का अधिकार क्षेत्र है।

याचिका में संशोधन करने की सलाह

सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं को उत्तराधिकार से वंचित किए जाने के मुद्दे पर मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 को चुनौती देने वाली याचिका में संशोधन का सुझाव भी दिया। मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण से पूछा कि याचिका को अधिक व्यापक रूप देने के लिए उसमें संशोधन क्यों नहीं किया जाता। अदालत ने कहा कि यह मामला केवल 1937 के अधिनियम तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा एक बड़ा संवैधानिक सवाल भी है। इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत को भरोसा दिलाया कि याचिका में आवश्यक संशोधन किए जाएंगे। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई फिलहाल स्थगित कर दी और याचिकाकर्ता को संशोधित याचिका दाखिल करने की अनुमति दे दी। UCC

संबंधित खबरें

अगली खबर पढ़ें

जानिए, दुनिया का यह कोना जहाँ 'गरीब' शब्द ही अनजान

यहां आपको गगनचुंबी इमारतों के बीच हाथ फैलाए कोई भिखारी नहीं मिलेगा। इसकी वजह यहां की सरकार की फौलादी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था है, जो मुसीबत आने से पहले ही नागरिकों की झोली भर देती है। स्विट्जरलैंड में अत्यधिक गरीबी का न मिलना कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि सरकार की सोची-समझी नीति का नतीजा है।

The word 'poor' is unknown
जहां गरीबी है नामोनिशान नहीं (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar10 Mar 2026 12:25 PM
bookmark

Poverty in Switzerland is not a coincidence : दुनिया के नक्शे पर एक ऐसा देश है, जहां 'गरीबी' शब्द मानो शब्दकोष से बाहर होता जा रहा है। यूरोप का स्वर्ग कहा जाने वाला स्विट्जरलैंड सिर्फ अपनी प्राकृतिक सुंदरता और बर्फीले पहाड़ों के लिए ही मशहूर नहीं है, बल्कि अपनी ऐसी मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए भी जाना जाता है, जहां हर नागरिक नवाबों जैसी जिंदगी जीता है।

सड़कों पर नहीं दिखते हाथ फैलाए लोग

यहां आपको गगनचुंबी इमारतों के बीच हाथ फैलाए कोई भिखारी नहीं मिलेगा। इसकी वजह यहां की सरकार की फौलादी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था है, जो मुसीबत आने से पहले ही नागरिकों की झोली भर देती है। स्विट्जरलैंड में अत्यधिक गरीबी का न मिलना कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि सरकार की सोची-समझी नीति का नतीजा है। हालांकि वहां कम आय वाले लोग मौजूद हैं, लेकिन सरकारी व्यवस्था इतनी पुख्ता है कि कोई भी व्यक्ति बुनियादी सुविधाओं जैसे भोजन और छत के लिए नहीं तड़पता है।

बेरोजगारी बीमा: नौकरी जाने पर मिलता है 80% वेतन

इस देश की सबसे बड़ी खूबी इसका बेरोजगारी बीमा है। अगर किसी नागरिक की नौकरी चली जाती है, तो वह सड़क पर नहीं आता। सरकार उसे पिछले वेतन का लगभग 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा बेरोजगारी भत्ते के रूप में एक निश्चित समय तक देती रहती है। सिर्फ पैसा देकर ही नहीं, प्रशासन उस व्यक्ति को नई नौकरी दिलाने के लिए विशेष ट्रेनिंग और कौशल विकास कार्यक्रम भी चलाता है, ताकि वह जल्द से जल्द मुख्यधारा में लौट सके।

झुग्गी-झोपड़ियों का नामोनिशान नहीं

स्विट्जरलैंड में घर का किराया किसी के लिए बोझ न बने, इसके लिए स्थानीय प्रशासन और सरकार मिलकर काम करते हैं। वहां बड़े पैमाने पर हाउसिंग कोऑपरेटिव और सब्सिडी योजनाएं चलाई जाती हैं, जो मध्यम और कम आय वाले परिवारों को बेहद सस्ती दरों पर मकान उपलब्ध कराती हैं। सरकार यह सुनिश्चित करती है कि देश के किसी भी कोने में कोई भी व्यक्ति बिना छत के न सोए। इसी कारण वहां झुग्गी-झोपड़ियों का नामोनिशान तक नहीं मिलता है।

सेहत का मामला: इलाज के लिए कर्ज में नहीं डूबते लोग

स्वास्थ्य के मामले में स्विट्जरलैंड दुनिया के सबसे सख्त और सुरक्षित देशों में से एक है। यहां हर नागरिक के लिए हेल्थ इंश्योरेंस लेना कानूनी रूप से अनिवार्य है। जो लोग प्रीमियम भरने में सक्षम नहीं होते, सरकार उन्हें मोटी सब्सिडी देती है, ताकि इलाज हर किसी की पहुंच में रहे। इस व्यवस्था के कारण वहां का हर व्यक्ति, चाहे वह अमीर हो या कम आय वाला, दुनिया की बेहतरीन चिकित्सा सुविधाओं का लाभ उठा पाता है और बीमारी की वजह से कर्ज के जाल में नहीं फंसता है।

'खुशहाल' देश में नवाबों जैसी जिंदगी

ऊंचा जीवन स्तर और औसत वेतन की वजह से स्विट्जरलैंड अक्सर दुनिया के सबसे खुशहाल देशों की सूची में टॉप पर रहता है। यहां की सरकार का यह अहम फैसला कि समाज का सबसे निचला तबका भी सम्मानजनक और गरिमापूर्ण जीवन जिए, इसे दुनिया का सबसे 'रसूख' देश बनाता है। Poverty in Switzerland is not a coincidence

संबंधित खबरें

अगली खबर पढ़ें

8वें वेतन आयोग का अपडेट: क्या आपकी सैलरी में होगा बड़ा बदलाव?

8th Pay Commission: अब कर्मचारियों, पेंशनरों और संगठनों से सुझाव मांग रही है। इसका उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों के वेतन, भत्तों और पेंशन की समीक्षा करना है। इससे भविष्य में वेतन संरचना में सुधार संभव हो सकेगा।

8th Pay Commission Update
8वें वेतन आयोग
locationभारत
userअसमीना
calendar10 Mar 2026 12:12 PM
bookmark

केंद्र सरकार ने 8वें केंद्रीय वेतन आयोग का गठन कर दिया है और अब कर्मचारियों, पेंशनरों और संगठनों से सुझाव मांग रही है। इसका उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों के वेतन, भत्तों और पेंशन की समीक्षा करना है। इससे भविष्य में वेतन संरचना में सुधार संभव हो सकेगा और कर्मचारियों को उनके परिवार और जीवन के वास्तविक खर्चों के अनुसार सैलरी मिलेगी।

सुझाव भेजने का तरीका और अंतिम तिथि

सरकार ने स्पष्ट किया है कि सभी सुझाव केवल ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से ही स्वीकार किए जाएंगे। कर्मचारी संघ, पेंशनर संगठन और अन्य इच्छुक व्यक्तियों को अपनी मांगें और सुझाव आयोग की वेबसाइट या MyGov पोर्टल पर 30 अप्रैल 2026 तक जमा करनी होंगी। डाक, ई-मेल या पीडीएफ के माध्यम से भेजे गए सुझावों पर विचार नहीं किया जाएगा। यह ऑनलाइन प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि सभी प्रस्ताव सुरक्षित और पारदर्शी तरीके से मिलें।

बेसिक सैलरी में संभावित बढ़ोतरी

कर्मचारी यूनियनों की मांगों को मानने पर सरकारी कर्मचारियों की बेसिक सैलरी लगभग 66% तक बढ़ सकती है। इसका सीधा फायदा कर्मचारियों और उनके परिवारों को मिलेगा। न केवल वेतन में वृद्धि होगी बल्कि न्यूनतम सैलरी तय करने के पुराने फॉर्मूले को भी अद्यतन किया जा सकता है। इससे कर्मचारियों को बढ़ती महंगाई और पारिवारिक खर्चों में राहत मिलेगी।

पुराने फॉर्मूले की सीमाएं

अभी सरकारी कर्मचारियों की न्यूनतम सैलरी का हिसाब 1956 के एक फॉर्मूले पर आधारित है जिसे तीन सदस्यीय परिवार मॉडल कहा जाता है। इस मॉडल में कर्मचारी, जीवनसाथी और एक बच्चा मानकर वेतन तय किया जाता है। कर्मचारी यूनियनों का कहना है कि यह पुराना तरीका अब वास्तविक जीवन की जरूरतों को नहीं दिखाता।

यूनियनों की मांगें और नई संरचना

कर्मचारी संघों ने सुझाव दिया है कि परिवार के सदस्यों की संख्या तीन से बढ़ाकर पांच मानी जाए। इससे बच्चों की संख्या बढ़ने, माता-पिता की जिम्मेदारी और रोजमर्रा के खर्चों के हिसाब से वेतन और पेंशन की गणना अधिक सटीक हो सकेगी। अगर सरकार इस सुझाव को मानती है, तो कर्मचारियों की वित्तीय स्थिति में बड़ा सुधार हो सकता है।

भविष्य की संभावनाएं

8वें वेतन आयोग की सिफारिशें आने के बाद सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों को बेहतर वेतन और भत्ते मिल सकते हैं। यह कदम सिर्फ उनके जीवन स्तर को सुधारने के लिए नहीं बल्कि सरकारी कामकाज को भी अधिक स्थिर और उत्पादक बनाने में मदद करेगा। कर्मचारियों के लिए यह एक सुनहरा अवसर है कि वे अपने सुझाव समय पर आयोग तक पहुंचाएं और भविष्य में लाभ उठा सकें।

संबंधित खबरें