चुनाव आयोग की अंदरूनी कार्यप्रणाली पर रितिका चोपड़ा की जांच रिपोर्ट ने कई बड़े सवाल खड़े किए हैं। 10 महीनों में 14 लिखित आपत्तियों, फॉर्म 6, ईसीआईनेट और मतदाता सूची से जुड़े मामलों ने आयोग के कामकाज को बहस के केंद्र में ला दिया है।

“कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों…” दुष्यंत कुमार की लिखी ये पंक्तियां द इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकार रितिका चोपड़ा पर इस वक्त बिल्कुल सटीक बैठती हैं। करीब दो दशक से सत्ता, शासन और लोकतांत्रिक संस्थाओं की परतें खोलती आ रही रितिका चोपड़ा ने अपनी कलम से एक बार फिर ऐसा सवाल उठाया है, जिसकी गूंज सत्ता के गलियारों से लेकर देश की सियासी और मीडिया दुनिया तक सुनाई दे रही है।
23 सितंबर 2026 को सामने आई रितिका चोपड़ा की जांच रिपोर्ट में चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों और दस्तावेजों के जरिए आयोग के कामकाज से जुड़े कई अहम सवाल सामने आए हैं। यही वजह है कि उनकी इस रिपोर्ट ने एक बार फिर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को बहस के केंद्र में ला दिया है। करीब दो दशक की पत्रकारिता में लगातार संस्थाओं और सत्ता के फैसलों को करीब से परखती आ रही पत्रकार रितिका चोपड़ा की यह रिपोर्ट अब चर्चा में है और इनके सवालों ने चुनाव आयोग की दीवारों को हिला कर रख दिया है।
23 सितंबर 2026 को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रितिका चोपड़ा की जांच रिपोर्ट का सबसे अहम हिस्सा चुनाव आयोग के भीतर दर्ज की गई लिखित आपत्तियां हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट में कहा गया कि इन आपत्तियों का संबंध मतदाता सूची, नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाताओं के नाम हटाने, फॉर्म 6 में बदलाव और मतदाता सूची से जुड़े डिजिटल सिस्टम तक पहुंच जैसे मामलों से था। यह बात इसलिए अहम है क्योंकि चुनाव आयोग तीन सदस्यों वाली संवैधानिक संस्था है। ऐसे में दो चुनाव आयुक्तों की ओर से अलग-अलग मामलों में लगातार लिखित सवाल उठाए जाने से आयोग के फैसले लेने की प्रक्रिया और उसके अंदर होने वाली चर्चा पर ध्यान गया है। हालांकि, चुनाव आयोग ने इन मतभेदों को सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा बताया है और कहा है कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट में बताया गया है कि सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अलग-अलग मौकों पर आयोग के फैसलों और आदेशों को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ मामलों में दोनों आयुक्तों ने कहा कि फैसले या आदेश उनकी जानकारी या सहमति के बिना जारी किए गए। एक ही दिन में चार आपत्तियां दर्ज किए जाने का भी रिपोर्ट में उल्लेख है। इन आपत्तियों का दायरा सिर्फ एक मुद्दे तक सीमित नहीं था। इनमें नए मतदाताओं के पंजीकरण से लेकर मतदाता सूची में नाम हटाने, पश्चिम बंगाल में अपीलों और चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम से जुड़े सवाल शामिल थे। यही वजह है कि रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग के अंदर फैसले लेने की प्रक्रिया पर चर्चा तेज हो गई।
फॉर्म 6 नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता है। रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग के ईसीआईनेट पोर्टल पर फॉर्म 6 में एसआईआर से जुड़े कुछ सवाल जोड़े गए थे। इन सवालों में नए आवेदक से यह जानकारी मांगी गई कि उसका नाम पिछली एसआईआर वाली मतदाता सूची में था या नहीं। इसके अलावा माता-पिता या दादा-दादी का नाम उस पुरानी मतदाता सूची में होने से जुड़ा विकल्प भी रखा गया था। रिपोर्ट के मुताबिक, फॉर्म में इस हिस्से को अनिवार्य नहीं बताया गया था, लेकिन इसका जवाब दिए बिना फॉर्म आगे जमा नहीं हो पा रहा था।
रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट के अनुसार, विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने इस बदलाव पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि वैधानिक फॉर्म में इस तरह का बदलाव संबंधित नियमों में बदलाव किए बिना नहीं किया जाना चाहिए। बाद में सुखबीर सिंह संधू ने इस बदलाव को अनधिकृत और अवैध बताया और इसे तुरंत हटाने की बात कही। यह बात रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट में सामने आए सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजी बिंदुओं में से एक है।
रितिका चोपड़ा ने रिपोर्ट में ईसीआईनेट और मतदाता सूची से जुड़े दूसरे डिजिटल सिस्टम को लेकर भी चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का भी जिक्र किया है। सवाल यह था कि मतदाता सूची के डेटा और उससे जुड़े सिस्टम तक किस स्तर पर किस अधिकारी की पहुंच होनी चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार, विवेक जोशी ने मतदाता सूची के डेटाबेस के धीरे-धीरे ज्यादा केंद्रीकृत होने को लेकर चिंता जताई थी। सुखबीर सिंह संधू ने भी अलग-अलग स्तर के चुनाव अधिकारियों की डिजिटल पहुंच को लेकर सवाल उठाए। यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मतदाता सूची तैयार करने और उसमें नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया सीधे मतदाताओं के अधिकार से जुड़ी है।
ईसीआईनेट और मतदाता सूची के डिजिटल सिस्टम को लेकर उठे सवाल सिर्फ चुनाव आयोग के अंदर तक सीमित नहीं रहे। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अलग-अलग पत्र लिखकर कैबिनेट सचिव टी वी सोमनाथन के सामने चुनाव आयोग के प्रशासन और मतदाता सूची के आईटी सिस्टम से जुड़े एक आदेश पर आपत्ति जताई। मामला काम के बंटवारे में किए गए ऐसे बदलाव से जुड़ा था, जिससे मतदाता सूची के आईटी सिस्टम की निगरानी और ज्यादा केंद्रीकृत होने की आशंका दोनों आयुक्तों ने जताई थी। दोनों ने बाद में 28 जुलाई के उस आदेश को पलटते हुए पुराने काम के बंटवारे को जारी रखने का निर्देश दिया, जब तक आयोग इस पर सर्वसम्मति से कोई नया फैसला नहीं लेता।
रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग ने अपना पक्ष भी रखा। आयोग ने कहा कि वह एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था है और लिखित नोट, सवाल, सुझाव, तकनीकी टिप्पणियां तथा अंदरूनी जांच और संतुलन उसकी सामान्य कार्यप्रणाली का हिस्सा हैं। आयोग ने यह भी कहा कि अलग-अलग सदस्यों के अलग विचार होना अंतिम फैसला होने से पहले की सामान्य प्रक्रिया है। आयोग के अनुसार, पिछले एक साल में पूर्ण आयोग की ओर से लिए गए फैसलों को सर्वसम्मति से मंजूरी दी गई। आयोग ने यह भी कहा कि उसके डिजिटल प्लेटफॉर्म सख्त डेटा सुरक्षा व्यवस्था और ऑडिट नियंत्रण के तहत काम करते हैं। यानी एक तरफ रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट दस्तावेजों के आधार पर दो चुनाव आयुक्तों की लगातार लिखित आपत्तियां सामने रखती है, वहीं दूसरी तरफ चुनाव आयोग इन आपत्तियों को सामान्य संस्थागत चर्चा का हिस्सा बताता है और अंतिम फैसलों को सर्वसम्मति से लिया गया बताता है।
24 सितंबर को रितिका चोपड़ा की एक और रिपोर्ट में गोवा के 97 मतदाताओं का मामला सामने आया। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, अखबार ने इन 97 लोगों के नाम अंतिम मतदाता सूची में तलाशे और 20 सितंबर तक ये नाम उसमें नहीं मिले थे। रिपोर्ट के मुताबिक, गोवा के अधिकारियों ने इस मामले को लेकर चुनाव आयोग से संपर्क भी किया था। रिपोर्ट में बताया गया कि गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय की ओर से दिल्ली स्थित आयोग को सात दिनों में आठ ईमेल भेजे गए थे। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मतदाता सूची में नाम होना केवल चुनाव के दिन वोट डालने तक सीमित नहीं है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, गोवा की कुछ सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में भी मतदाता सूची में नाम होने से जुड़ी शर्त है।
रितिका चोपड़ा की 23 सितंबर की जांच में पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़े मामलों और अपीलों का भी उल्लेख है। रिपोर्ट के अनुसार, इन मामलों को लेकर भी चुनाव आयोग के भीतर सवाल और आपत्तियां सामने आई थीं। इससे साफ होता है कि सामने आए सवाल केवल फॉर्म 6 या डिजिटल सिस्टम तक सीमित नहीं थे। मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और उससे जुड़े मामलों की अपील की प्रक्रिया भी इस जांच का हिस्सा रही।
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रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट में चुनाव आयोग के अंदर दो चुनाव आयुक्तों की ओर से 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई है। यह सामान्य राजनीतिक बयान से अलग इसलिए है क्योंकि रिपोर्ट में इन आपत्तियों से जुड़े दस्तावेजों और अलग-अलग मामलों का उल्लेख किया गया है। रितिका चोपड़ा की जांच ने चुनाव आयोग के कामकाज से जुड़े ऐसे दस्तावेज सामने रखे हैं जिनमें दो चुनाव आयुक्तों की ओर से अलग-अलग मुद्दों पर आपत्तियां दर्ज किए जाने की बात सामने आती है। फॉर्म 6 में बदलाव, ईसीआईनेट और मतदाता सूची के डिजिटल डेटा तक पहुंच, पश्चिम बंगाल की अपील और गोवा के 97 मतदाताओं के नाम जैसे मामले इस बहस को कई स्तरों तक ले जाते हैं। यही वजह है कि 23 सितंबर की यह रिपोर्ट सिर्फ एक खबर बनकर नहीं रह गई है। इसने चुनाव आयोग की अंदरूनी प्रक्रिया पर सवालों को सार्वजनिक बहस का हिस्सा बना दिया है। आगे इस बहस में सबसे अहम भूमिका तथ्यों, दस्तावेजों और आधिकारिक रिकॉर्ड की होगी।
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