Hindi Kahani : कुमुदिनी :- सरोवर की लहरों के बीच अठखेलियां करती हमेशा ही हंसती मुस्कुराती कुमुदिनी को गंभीर देख आसमान में ज्योत्स्ना के साथ अपने रूप की छटा बिखेरते चंद्र को जब नही रहा गया तो उसने अपनी चंद्र किरणों से उसके कोमल पंखुरियों को सहलाते हुये पूंछ ही लिया । चंद्र -क्या बात है कुह्वीं ? आज तुम मुझे देखकर खुलकर खिलखिलाई नही । अब तो इतनी शीत भी नही की तुम्हें सिहर कर सिहरना पड़े । यह ऋतुराज बसंत है प्रेम का संदेश लेकर आये । और तुम इतनी उदास,मेरे मित्र ऋतुराज का स्वागत नही करोगी ।
कुमुदिनी-सच कहा ऋतुराज बसंत आये हैं पीत पाती ले यही तो प्रीति की मनुहार का समय है । पर मैं क्या करूं इस सरोवर में फैल रही जलकुंभी का जिसने मुझे अपनी कैद में जकड़ रखा है । मैं इससे चाह कर भी तो मुक्त नही हो सकती । इस सरोवर में फैली गंदगी की सड़ांध ने हमारा जीवन दूभर कर दिया ।
चंद्र -सही कह रही हो तुम हम मानव की जितने उदार होकर सहायता करना चाहते वह कृतघ्न होकर उतना ही अधिक हमारा शोषण कर रहा है । उसके प्रदूषण से आकाश भी अब निरभ्र नही रहा । मुझे स्वयं धुंध घेर लेती है । जिन वनस्पतियों का मैं राजा हूं वह सब इसी मानव के कारण धरा से विलुप्त होरहीं ।
कुमुदिनी-इस सरोवर के सूखते मैं भी विलुप्त ।
चंद्रने कुछ सोचते हुये कहा हम तो अपने धर्म का पालन कर रहे हैं । मानव जाने कब सीखेगा ।
एक दिन प्रकृति ही उसके सारे दुष्कृत्योन का दण्ड देगी ।
कुमुदिनी ने हंस कर कहा -और तब तक हम नहीरहेंगे ।
चंद्र-नही ऐसा नही होगा? मैं अपनी शीतलता को बढ़ा कर उसके प्रकोप से हिम खंड ही विश्रृंखलित कर दूंगा तब जो जल प्रलय आयेगा उससे मानव को पता चलेगा की प्रकृति का दोहन क्या होता है ।अभी वह दोनों बात कर ही रहे थे की आकाश में छाये मेघों ने चंद्र को आच्छादित कर गरजते हुये बिजली ने कड़कड़ा कर कड़कते हुये सबको खामोश कर दिया और उस जोरदार बारिश ने कुम्हलाई कुमुदिनी को एक बार जीवन दान दे जलकुंभी से मुक्त कर दिया । बारिश के बंद होते ही निरभ्र आकाश में हंसता मुस्कुराता चंद्र भोर होते देख विदा ले रहा था अपनी प्रिया कुमुदिनी से ......।
उषा सक्सेना
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