Hindi Kavita –
पाँवों से सिर तक जैसे एक जनून
बेतरतीबी से बढ़े हुए नाखून।
कुछ टेढ़े-मेढ़े बैंगे दागिल पाँव
जैसे कोई एटम से उजड़ा गाँव।
टखने ज्यों मिले हुए रक्खे हों बाँस
पिंडलियाँ कि जैसे हिलती-डुलती काँस।
कुछ ऐसे लगते हैं घुटनों के जोड़
जैसे ऊबड़-खाबड़ राहों के मोड़।
गट्टों-सी जंघाएँ निष्प्राण मलीन
कटि, रीतिकाल की सुधियों से भी क्षीण।
छाती के नाम महज हड्डी दस-बीस
जिस पर गिन-चुन कर बाल खड़े इक्कीस।
पुट्ठे हों जैसे सूख गए अमरूद
चुकता करते-करते जीवन का सूद।
बाँहें ढीली-ढाली ज्यों टूटी डाल
अँगुलियाँ जैसे सूखी हुई पुआल।
छोटी-सी गरदन रंग बेहद बदरंग
हरवक्त पसीने का बदबू का संग।
पिचकी अमियों से गाल लटे से कान
आँखें जैसे तरकश के खुट्टल बान।
माथे पर चिंताओं का एक समूह
भौंहों पर बैठी हरदम यम की रूह।
तिनकों से उड़ते रहने वाले बाल
विद्युत परिचालित मखनातीसी चाल।
बैठे तो फिर घंटों जाते हैं बीत
सोचते प्यार की रीत भविष्य अतीत।
कितने अजीब हैं इनके भी व्यापार।
दुष्यंत कुमार
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