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कहा जाता है कि इस शहर की मिट्टी मे खास तरह की खुशबू होती है और जब बारिश की बूंदें यहाँ की मिट्टी पर पड़ती है तो वो खुशबू चारो तरफ फैल जाती है । खास बात यह है कि यहां मिट्टी से भी इत्र बनाया जाता है। इसके लिए तांबे के बर्तनों में मिट्टी को पकाया जाता है। इसके बाद मिट्टी से निकलने वाली खुशबू को बेस ऑयल के साथ मिलाया जाता है। इस तरह से मिट्टी से इत्र बनाने कि प्रक्रिया चलती है। इस इत्र की अपनी खास पहचान है ।
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आज के इस आधुनिक दौर में भी यहां इत्र को भट्टियों में ही बनाते है। फूलो को इकट्टा किया जाता है,फिर उन्हे साफ करके इसके बाद एक बड़े से मटके जैसे आकार के डेग में फूलो को भर दिया जाता है। फिर इसे ऊपर से ढक कर मिट्टी का लेप लगा कर चारों तरफ से बंद कर दिया जाता है । फिर उसके ही अंदर से एक पाइप नुमा छड़ लेकर दूसरे मटके जैसे आकार की छोटे डेग में डाल दिया जाता है। जिसको ठंडे पानी मे रखा जाता है। वहीं अंदर वाष्पीकरण होकर फूलों से इत्र निकल कर उस छोटे से मटके जैसे आकार वाले डेग में आ जाता है, जिसके बाद यह इत्र तैयार हो जाता है।
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कन्नौज मे इत्र निर्माण की 350 से ज्यादा फैक्ट्रियां मौजूद है। यहाँ के इत्र 60 से ज्यादा देशों मे भेजे जाते है । इस इत्र के कारोबार मे 50 हजार से ज्यादा किसान जुड़े है । कन्नौज में करीब 60 हजार से ज्यादा लोग इस व्यापार से जुड़े हैं । इस कारोबार से कई लोगो को रोजगार मिलता है । लगभग यहां सभी तरह के इत्र बनाए जाते हैं। छोटे बड़े कारोबार की अगर बात की जाए तो इसकी संख्या और भी ज्यादा बढ़ जाती है। ऐसे में इन इत्रों का महीनों में करोड़ों रुपए का कारोबार होता है।
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