इत यमुना उत टौंस,छत्रसाल से लड़न को रही न काहूँ ठौंस : वो सूरमा जिसने मुगलों को नाकों चने चबवा दिये
भारत
चेतना मंच
30 Nov 2025 11:00 PM
Maharaja Chhatrasal Jayanti : छत्रपति महाराज छत्रसाल का जन्म :-4 मई 1649 में टीकमगढ़ जिले की ककर कचनार गांव की मोर पहाड़ी से घिरे जंगल में हुआ था । उनके पिता चम्पत राय बुंदेला जो कि ओरछा के राजा रुद्र प्रताप सिंह के वंशज और सामंत थे । उस समय मुगल बादशाह औरंगजेब का आतंक फैला हुआ था । चम्पतराय जी की पत्नी लालकुंवर देवी स्वयं एक वीर योद्धा थी । वह अपने पति के साथ हर समय उनका मनोबल बढ़ाती और उनके साथ रहती । इसी युद्ध की छाया में छत्रसाल का जन्म हुआ । उनकी मां एक साहसी महिला थी जो अपने बेटे को सोते उठते दूध पिलाते समय भी युद्ध की ही बात करतीं । कहते हैं कि व्यक्ति जब जन्म लेता है तो वह कुछ नहीं होता उसका निर्माण तो आगे आने वाली परिस्थितियों पर निर्भर करता है ।
वीर भोग्या वसुंधरा का सपना पूरा किया
पांच वर्ष तक उन्होंने छत्रसाल को अपनी ममता की छांव में रखकर धैर्य पूर्वक उन्हें तलवार बाजी और धनुर्विद्या सिखलाई । उनके अंतस् में स्वाभिमान के बीज अंकुरित कर उसे महान बनने की सोच दी । अंत मे अपने पति के साथ युद्ध में व्यस्तता के कारण उन्हें उनके मामा के पास देलवारा आगे की शिक्षा के लिये भेज दिया । छत्रपति महाराज छत्रसाल ने अपनी आगे की युद्ध कला और शिक्षा अपने मामा के यहां प्राप्त की । मात्र बारह वर्ष की आयु में ही मुगलों से निरंतर युद्ध करते हुये उनके माता पिता दोनों की ही मृत्यु होगई । अब वह अनाथ थे । मामा ने मुगलों के भय से उन्हें देवगढ़ भेज दिया । देवगढ़ में अपने पिता की अंतिम इच्छा के अनुसार देवगढ़ के परमार की कन्या से विवाह कर अपनी शक्ति बढ़ाई । इसके बाद वह सैनिक शिक्षा के लिये अपने पिता के मित्र राजा जयसिंह के पास गये और उनकी सेना में भर्ती होकर मुगलों के लिये ही युद्ध करने दक्षिण गये जहां उनकी वीरता के कारण विजय प्राप्त हुई किंतु औरंगजेब ने इसके लिये उन्हें पुरुस्कृत न कर अपने मुगल सेनापति को इसका श्रेय दिया इस घटना से छत्रसाल का स्वाभिमान जागा और वापिस आकर अपने पुराने बुंदेला साथियों को एकत्र कर धीरे धीरे अपनी शक्ति बढ़ा कर मुगलों को नाकों चने चबवा दिये । छत्रसाल ने उनसे सारे किले छीन कर अपने राज्य का विस्तार किया । इस मध्य उनकी भेंट महामति प्राणनाथ जी से सन् 1644 में हुई । उनकी शक्ति और राज्य का विस्तार देखते हुये उन्होंने ने उनका राज्याभिषेक करते हुये छत्रपति महाराज छत्रसाल कहते हुये छत्रपति महाराज की पदवी से विभूषित किया ।
Maharaja Chhatrasal Jayanti
प्राणनाथ जैसे गुरू और लालकुंवर जैसी वीर क्षत्राणी माता के गर्भ से जन्म ले अपनी मां के सपने को पूरा किया
उधर छत्रपति शिवाजी इधर छत्रपति छत्रसाल दोनों ही समकालीन मुगल साम्राज्य के विरूद्ध सनातन हिन्दू धर्म की रक्षा के लिये अपनी अंतिम सांस तक लड़े । वीर भोग्या वसुंधरा का सपना पूरा किया । छत्रसाल जी की मृत्यु छतरपुर में 16 दिसम्बर 1734 में हुई । वह मुगलों के पतन का समय था । उनके नाम पर छत्रपुर नगर बसा जो अब अपभ्रंश में छतरपुर हो गया ।
उनके शौर्य की यशोगाथा कहते बुंदेलखंड के कवि भूषण कहते हैं कि :
छत्ता तेरे राज में
धक्-धक् धरती होय।
जित -जित घोड़ा मुख करे
फत्ते तेरी होय ।।
उनके राज्य की सीमा बतलाता हुआ दोहा आज भी प्रचलित है :-
इत चम्बल उत नर्मदा
इत यमुना उत टौंस ।
छत्रसाल से लड़न को
रही न काहूँ ठौंस ।।
बुंदेलखंड साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति छत्रसाल महाराज छत्रपति कैसे बने उसके पीछे छिपा वह गूढ़ रहस्य जिसे आज हमें जानना होगा।
Maharaja Chhatrasal Jayanti
उषा सक्सेना-भोपाल
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