दुनिया के महान संत महावतार बाबाजी वास्तव में मृत्युंजय हैं
Mahavatar Babaji
भारत
चेतना मंच
25 Jul 2025 11:13 PM
Mahavatar Babaji: दुनिया के महान संत महावतार बाबाजी वास्तव में मृत्युंजय हैं। मृत्युंजय उसे कहा जाता है जिसने मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली हो। दूसरे शब्दों में मृत्युंजय वह होता है जो अमर है जो कभी मरता नहीं है। महावतार बाबाजी की याद में हर साल 25 जुलाई का दिन स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाता है। महावतार बाबाजी के स्मृति दिवस पर प्रसिद्ध पत्रकार एस.एन. वर्मा ने एक बड़ा लेख लिखा है। उस लेख को हम ज्यों का त्यों प्रकाशित कर रहे हैं।
मृत्युंजय हैं महावतार बाबा जी
एस.एन. वर्मा
आखिर कौन हैं महावतार बाबा जी?
पूरा यू-ट्यूब व गूगल उनके बारे में तरह-तरह की जानकारियां दे रहे हैं। तथाकथित संत महात्मा लोग तो महावतार बाबा जी से हिमालय में क्रियायोग की शिक्षा लेने का दावा भी कर रहे हैं और क्रिया योग सेंटर भी खोल रखे हैं। कुछ ने तो स्वंय को महावतार बाबाजी भी घोषित किए थे। आपको बताते चलें कि पूरे संसार को महावतार बाबाजी के बारे तब पता चला था जब परमहंस योगानद ने अपनी पुस्तक योगी कथामृत में उनका जिक्र किया और वही एक पुस्तक है जिसमें विभिन्न ईश्वर प्राप्त भारत के प्रसिद्ध संतों से महावतार बाबाजी की मुलाकात की बात पता चलती है और कई संतों ने तो परमहंस योगानंद के साथ साक्षात्कार में उन्हें बताया भी है कि बाबाजी ने ही लगभग लुप्त प्राय हो गए क्रिया योग के पुुनरुत्थान के लिए इस युग में लाहिड़ी महाशय को प्रशिक्षित किया था। प्रसिद्ध तेलुगु अभिनेता रजनीकांत और बाबाजी के भक्त ने तो बाबाजी पर एक फिल्म भी बनाया है। और वे द्रोणागिरी पर्वत के गुफा जहां महावतार बाबा जी से लाहिड़ी महाशय की प्रथम मुलाकात हुई थी, के नियमित तीर्थ यात्रा भी करते रहते हैं । भारत में योगदा सत्संग सोसायटी ऑफ इंडिया और विदेशों में सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप के संन्नयासी और साधक 25 जुलाई को बाबाजी की स्मृति दिवस के रूप में मनाते हैं क्योंकि 25 जुलाई 1920 को परमहंस योगानंद के कोलकाता के गड़पार रोड पर स्थित उनके घर पर महावतार बाबाजी ने दर्शन दिए थे और उन्हें आश्वासन दिया था कि ईश्वर द्वारा अमेरिका में पूर्ण संरक्षण दिया जाएगा।बाबाजी ने उन्हें यह भी कहा था कि तुम ही वह हो जिसे मैंने पाश्चात्य जगत में क्रियायोग का प्रसार करने के लिए चुना है। बहुत वर्ष पहले मैं तुम्हारे गुरु युक्तेश्वर से एक कुंभ मेले मे मिला था और तभी मैंने उनसे कह दिया था कि मैं तुम्हें उनके पास शिक्षा ग्रहण के लिए भेज दुंगा। असल में योगानंद को अमेरिका में एक धर्म सम्मेलन को संबोधित करने के लिए न्योता मिला था और वे अमेरिका जाने के पहले पूर्ण रूप से ईश्वर से आश्वस्त हो जाना चाहते थे कि कहीं वे पश्चिम सभ्यता में अपने असली उद्देश्य से भटक न जाएं।
आदि शंकराचार्य को भी क्रियायोग सिखाया था बाबा जी ने
परमहंस योगानंद की पुस्तक योगी कथामृत के अनुसार बाबाजी ने ही आदि शंकराचार्य तथा कबीर को क्रियायोग की शिक्षा दी थी। बाबाजी सदा ईसा मसीह के सपंर्क में रहते हैं। वे दोनों मिलकर जगत के उद्धार के स्पंदन पृथ्वी पर भेजते रहते हैं। पुस्तक के अनुसार इतिहास में बाबाजी का कहीं कोई उल्लेख नहीं है। किसी भी शताब्दी में बाबाजी कभी जनसाधारण के समक्ष प्रकट नहीं हुए। बाबाजी विनम्र गुमनामी में अपना कार्य करते रहते हैं। लाहिडी़ महाशय के शिष्यों ने उन्हें श्रद्धा से महामुनि बाबाजी महाराज,महायोगी तथा त्र्यंबक बाबा या शिव बाबा नाम दिए हैं। लाहिडी़ महाशय कहा करते थे कि जब भी कोई श्रद्धा से बाबाजी का नाम लेता है,उसे तत्क्षण आध्यात्मिक आर्शीवाद प्राप्त होता है। पुस्तक में योगानंद बताते है कि उनके संतवत संस्कृत गुरु स्वामी केवलानंद ने हिमालय में बाबाजी के साथ कुछ समय बिताया था। बाबाजी अपने शिष्यों के साथ जिसमें दो अमेरिकी शिष्य भी हैं, पर्वतों में एक स्थान से दूसरे स्थान भ्रमण करते रहते हैं। उन्होंने बताया था कि बाबाजी कभी खाते नहीं हैं क्योंकि अक्षय देह के लिए आहार की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन जब वे शिष्यों को दर्शन देते हैं तब लौकिक शिष्टाचार के रूप में कभी कभी फल या चावल की खीर स्वीकार कर लेते हैं। अमर बाबाजी के शरीर पर आयु का कोई लक्ष्ण दुष्टिगोचर नहीं होता। वे अधिक से अधिक 25 वर्ष के युवक दिखते हैं। योगानंद को बाबाजी ने जिस रूप में दर्शन दिया था वैसा ही चित्रण कर योगानंद ने बाबाजी का चित्र बनवाया था। जो आज हर जगह प्रचलित है।
लाहिड़ी महाशय के एक अन्य शिष्य निद्राजयाी संत रामगोपाल से भी बाबाजी की मुलाकात हुई थी। परमहंस योगानंद को रामगोपाल ने बताया था कि बनारस के दशाश्वमध घाट पर बाबाजी, लाहिड़ी महाशय तथा बाबाजी की बहन माताजी को उन्होंने देखा था। वे संसार के उद्धार के लिए आपस में विचार विमर्श कर रहे थे।योगी कथामृत के अनुसार बाबाजी 1861 में लाहिड़ी महाशय को रानीखेत के पास स्थित द्रोणगिरि पर्वत की गुफा के पास मिले थे। वहीं पर अपनी चमत्कारिक इच्छाशक्ति से एक महल का सृजन कर बाबाजी ने अपने शिष्य को सभी ऐहिक तृष्णाओं से मुक्त कर क्रियायोग की शिक्षा देते हैं। लाहिड़ी महाशय के अनुरोध पर, बाबाजी ने उन्हें सम्पूर्ण विश्व के सभी सच्चे सत्यान्वेषियों को यह पवित्र एवं गुप्त प्रविधि सिखाने की अनुमति दी थी। इस प्रकार परमहंस योगानन्द को अपने गुरु स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी और अपने परमगुरुओं से जीवन का उत्थान करने वाली और आत्मा को मुक्ति प्रदान करने वाली, क्रियायोग की जीवनशैली विरासत में प्राप्त हुई थी। योगानंद के गुरु स्वामी श्रीयुक्तेश्वर को भी बाबाजी ने एक कुभं मेले में स्वामी की उपाधि दी थी तथा उनसे ‘कैवल्य दर्शनम" नामक पुस्तक, लिखने का आग्रह किया था। पुस्तक लेखन के समापन पर श्रीराम पुर में बाबाजी ने स्वामी श्रीयुक्तेश्वर को एक बार फिर दर्शन दिया था। जिसका जिक्र स्वामी श्रीयुक्तेश्वर ने ही योगानंद से किया था।
खुद बताया था प्रेम को अपना स्वरूप
भारत वापसी के समय जब योगानंद वृंदावन में लाहिड़ी महाशय के एक अन्य शिष्य स्वामी केशवानंद से मिलने गए तब केशवानंद ने उन्हें बताया कि एक बार हिमालय में रास्ता भटक जाने पर उन्हें बाबाजी से मुलाकात हुई थी तब उन्होंने बताया था कि योगानंद तुमसे मिलने आएंगे तो उन्हें बताना कि मैं उनसे इस बार नहीं मिलूंगा किसी और अवसर पर मिलूंगा। बाबाजी ने योगदा सत्संग सोसायटी आफ इंडिया और अमेरिका में सेल्फ रिलाइजेशन फेलोशिप के तीसरे अघ्यक्ष दया माता को भी मानस दर्शन दे कर बताया था कि मेरा स्वरूप प्रेम है, क्योंकि यह प्रेम ही है जो संसार को बदल सकता है। यह 1964-65 की घटना है जब भारत आगमन के दौरान दयामाता द्रोण पर्वत पर स्थित महावतार बाबाजी की गुफा का दर्शन करने गई थी।महावतार बाबाजी द्वारा प्रदत क्रियायोग द्वारा ईश्वर प्राप्ति के इच्छुक साधकों को भारत में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया तथा विदेशों में सेल्फ रिलाइजेशन फेलोशिप इन्हीं शिक्षाओं पर आधारित विस्तृत आदर्श-जीवन पाठमाला भी प्रकाशित करती है और उन्हें सभी सदस्यों को मुद्रित और डिजिटल रूप में उपलब्ध कराती है तथा विशेष कक्षाओं के माध्यम से, ध्यान की प्रारम्भिक एवं उच्च प्रविधियों की शिक्षा प्रदान की जाती है। इस प्रकार हमें पता चलता है कि महावतार बाबाजी अजर अमर है और परमसत्ता ने उन्हें संसार के ईश्वर प्राप्ति के इच्छुक साधकों की मदद के लिए पृथ्वी पर भेजा है। योगी कथामृत पुस्तक में बाबाजी के बारे में विस्तृत जानकारी दी गयी है। भारत के रांची शहर में योगदा आश्रमों का मुख्यालय है।