राशन कार्ड वालों की बल्ले-बल्ले, एक साथ मिलेगा तीन महीने का राशन

केंद्र सरकार ने राशन कार्ड लाभार्थियों के लिए बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने घोषणा की है कि अप्रैल महीने में पात्र लोगों को सिर्फ एक महीने का नहीं, बल्कि अप्रैल, मई और जून 2026 यानी तीन महीने का राशन एक साथ दिया जाएगा।

राशन कार्ड वालों की बल्ले-बल्ले
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locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar20 Mar 2026 02:10 PM
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April Free Ration: केंद्र सरकार ने राशन कार्ड लाभार्थियों के लिए बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने घोषणा की है कि अप्रैल महीने में पात्र लोगों को सिर्फ एक महीने का नहीं, बल्कि अप्रैल, मई और जून 2026 यानी तीन महीने का राशन एक साथ दिया जाएगा। इस फैसले की जानकारी केंद्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग की ओर से साझा की गई है। विभाग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर बताया कि सभी लाभार्थी अपने नजदीकी राशन डीलर या उचित मूल्य की दुकान से तय समय पर यह राशन प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि, सरकार ने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि तीन महीने का राशन एक साथ देने के पीछे क्या खास वजह है।

सरकार ने फर्जी राशन कार्ड पर भी कसा शिकंजा

इस बीच, सरकार ने संसद में यह भी जानकारी दी है कि वर्ष 2025 के दौरान देशभर में 41.41 लाख अपात्र राशन कार्ड रद्द किए गए। राज्यसभा में खाद्य राज्य मंत्री निमुबेन जयंतीभाई बंभानिया ने लिखित जवाब में बताया कि तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल से सार्वजनिक वितरण प्रणाली में पारदर्शिता आई है और इसी वजह से फर्जी तथा अपात्र लाभार्थियों की पहचान आसान हुई है। मंत्री के अनुसार, हरियाणा में सबसे ज्यादा करीब 13.43 लाख राशन कार्ड रद्द किए गए। इसके बाद राजस्थान में 6.05 लाख, उत्तर प्रदेश में 5.97 लाख, पश्चिम बंगाल में 3.74 लाख और मध्य प्रदेश में 2.60 लाख अपात्र राशन कार्ड खत्म किए गए।

डिजिटलीकरण से बढ़ी पारदर्शिता

सरकार का कहना है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने के लिए लगातार डिजिटल सुधार किए जा रहे हैं। इसी दिशा में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में राशन कार्ड और लाभार्थियों का डेटा पूरी तरह डिजिटल किया जा चुका है। देश की लगभग सभी उचित मूल्य की दुकानों पर खाद्यान्न वितरण के लिए इलेक्ट्रॉनिक प्वाइंट ऑफ सेल (ePOS) मशीनें लगाई जा चुकी हैं। इससे राशन वितरण की प्रक्रिया पहले के मुकाबले ज्यादा व्यवस्थित और पारदर्शी हुई है।

आधार लिंकिंग और डिजिटल सत्यापन से सिस्टम मजबूत

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 99.2 प्रतिशत लाभार्थियों का डेटा आधार से जोड़ा जा चुका है। वहीं, 98.75 प्रतिशत राशन वितरण अब आधार आधारित बायोमेट्रिक और अन्य डिजिटल सत्यापन के जरिए किया जा रहा है। मंत्री ने साफ कहा कि पीडीएस के डिजिटलीकरण का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी अनाज सही लोगों तक पहुंचे, व्यवस्था में पारदर्शिता बनी रहे और खाद्यान्न की चोरी या फर्जीवाड़े पर रोक लगाई जा सके। April Free Ration

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Big Breaking - केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी को मिली जान से मारने की धमकी

केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय लोक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी को जान से मारने की धमकी मिलने का मामला सामने आया है। इस संबंध में उनके निजी सहायक ने दिल्ली पुलिस को शिकायत देकर गंभीर सुरक्षा चिंता जताई है।

जयंत चौधरी
जयंत चौधरी
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar20 Mar 2026 12:40 PM
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Jayant Chaudhary : केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय लोक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी को जान से मारने की धमकी मिलने का मामला सामने आया है। इस संबंध में उनके निजी सहायक ने दिल्ली पुलिस को शिकायत देकर गंभीर सुरक्षा चिंता जताई है। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि मंत्री की कथित रूप से जासूसी की जा रही थी, जिससे मामला और अधिक संवेदनशील हो गया है।

धमकी के साथ जासूसी की आशंका

शिकायत के अनुसार, 18 मार्च की सुबह निजी सहायक के फोन पर एक धमकी भरा कॉल आया। कॉल करने वाले ने कौशल विकास एवं उद्यमशीलता राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी को जान से मारने की धमकी दी। फोन पर मिली इस चेतावनी के बाद मामले को गंभीरता से लेते हुए दिल्ली पुलिस को तत्काल सूचना दी गई।

दावे से मामला हुआ और गंभीर

मामला केवल धमकी तक सीमित नहीं है। शिकायत में यह भी दावा किया गया है कि केंद्रीय मंत्री की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी। यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम को सामान्य धमकी नहीं, बल्कि सुरक्षा से जुड़े गंभीर प्रकरण के रूप में देखा जा रहा है। एक केंद्रीय मंत्री के खिलाफ इस तरह की धमकी और निगरानी के आरोप ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। दिल्ली पुलिस को दी गई शिकायत के बाद अब पूरे मामले की जांच की दिशा तय की जा रही है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटेंगी कि धमकी देने वाला कौन था, कॉल कहां से आया और जासूसी के आरोपों में कितनी सच्चाई है। फिलहाल इस प्रकरण ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। Jayant Chaudhary

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बिहार की राजनीति में 30 मार्च क्यों है अहम? नीतीश कुमार पर चर्चाएं तेज

आजादी के आंदोलन से लेकर जेपी आंदोलन तक और मंडल-कमंडल की राजनीति से लेकर सामाजिक समीकरणों की नई परिभाषाओं तक, बिहार ने बार-बार देश की राजनीति को दिशा दी है। इसी बिहार में एक बार फिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चर्चा के केंद्र में हैं।

नीतीश कुमार
नीतीश कुमार
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userअभिजीत यादव
calendar20 Mar 2026 11:12 AM
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बिहार की राजनीति में 30 मार्च क्यों है अहम? नीतीश कुमार पर चर्चाएं तेज


Bihar News : बिहार की राजनीति हमेशा से देश की सबसे जीवंत, जटिल और चर्चा में रहने वाली राजनीति मानी जाती रही है। शायद ही कोई दूसरा राज्य हो, जहां साल के 365 दिन राजनीतिक हलचल इतनी तीव्र दिखाई देती हो। आजादी के आंदोलन से लेकर जेपी आंदोलन तक और मंडल-कमंडल की राजनीति से लेकर सामाजिक समीकरणों की नई परिभाषाओं तक, बिहार ने बार-बार देश की राजनीति को दिशा दी है। इसी बिहार में एक बार फिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चर्चा के केंद्र में हैं। वजह सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि 30 मार्च 2026 की वह संवैधानिक और राजनीतिक समय-सीमा है, जिसके बाद उन्हें एक बड़ा फैसला लेना ही होगा। यही कारण है कि बिहार से लेकर दिल्ली तक सत्ता के गलियारों में नीतीश कुमार को लेकर अटकलों का दौर तेज है।

बिहार में चर्चा का केंद्र फिर क्यों बने नीतीश कुमार?

नीतीश कुमार बिहार की राजनीति के ऐसे नेता हैं, जिनके बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालना हमेशा मुश्किल रहा है। वे कब कौन-सा राजनीतिक कदम उठा लें, इसका अनुमान उनके सहयोगी तक नहीं लगा पाते। यही वजह है कि जब भी उनके सामने कोई बड़ा राजनीतिक मोड़ आता है, चर्चा का बाजार गर्म हो जाता है। इस समय भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। विपक्ष लगातार यह नैरेटिव बनाने में लगा है कि नीतीश कुमार अब पहले जैसे राजनीतिक रूप से सक्रिय या निर्णायक नहीं रहे। उनकी उम्र, उनकी शैली और हाल के कुछ बयानों को आधार बनाकर विपक्ष उन पर सवाल खड़े कर रहा है। दूसरी ओर, सत्ता पक्ष इस पूरी बहस को राजनीतिक प्रचार करार देता है। लेकिन असली बात यह है कि बहस सिर्फ उनकी सेहत, सक्रियता या शैली की नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार बिहार की सत्ता में बने रहना चाहते हैं, या अब वे राष्ट्रीय राजनीति की ओर बढ़ने की तैयारी में हैं।

राज्यसभा चुनाव ने क्यों बढ़ा दी सियासी हलचल?

नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर लंबा और बहुस्तरीय रहा है। वे लोकसभा, विधानसभा और विधान परिषद तीनों सदनों का हिस्सा रह चुके हैं। अब राज्यसभा के लिए उनका चुना जाना इस राजनीतिक सफर का नया अध्याय माना जा रहा है। यहीं से 30 मार्च की अहमियत शुरू होती है। चूंकि वे अभी विधान परिषद के सदस्य होने के आधार पर मुख्यमंत्री हैं, इसलिए राज्यसभा के लिए निर्वाचित होने के बाद उन्हें एक सदन चुनना होगा। नियमानुसार उन्हें 30 मार्च 2026 तक किसी एक सदन की सदस्यता छोड़नी पड़ेगी। अगर वे समय सीमा के भीतर फैसला नहीं करते, तो राज्यसभा की सदस्यता पर असर पड़ सकता है।

विपक्ष को उम्मीद क्यों बंधती रहती है?

इसके पीछे सबसे बड़ा कारण खुद नीतीश कुमार का राजनीतिक अतीत है। उन्होंने कई बार ऐसे फैसले लिए हैं, जिनकी कल्पना उनके विरोधियों और सहयोगियों दोनों ने नहीं की थी। कभी भाजपा के साथ, कभी राजद के साथ, फिर वापसी नीतीश कुमार की राजनीति ने हमेशा गठबंधन की स्थिर परिभाषाओं को चुनौती दी है। यही वजह है कि विपक्ष आज भी पूरी तरह दरवाजा बंद मानने को तैयार नहीं है। राजद और तेजस्वी यादव को अतीत में दो बार नीतीश कुमार के राजनीतिक फैसलों का सीधा लाभ मिल चुका है। इसलिए भले ही आज राजनीतिक परिस्थितियां अलग हों, लेकिन विपक्ष के भीतर यह उम्मीद अब भी जिंदा है कि बिहार की राजनीति में अंतिम शब्द अभी बाकी है।

नीतीश कुमार पर भरोसा करने से पहले लोग क्यों हिचकते हैं?

इस सवाल का जवाब उनके राजनीतिक रिकॉर्ड में छिपा है। नीतीश कुमार ने अपने सार्वजनिक जीवन में कई बार ऐसी राजनीतिक करवटें ली हैं, जिन्होंने सहयोगियों को चौंकाया है। वे लंबे समय तक एक बात कहते हैं और फिर परिस्थितियों के अनुसार अलग रास्ता चुन लेते हैं। यही उनकी ताकत भी रही है और यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पहेली भी। यही कारण है कि भले ही वे अब यह कह रहे हों कि भाजपा के साथ ही रहेंगे, लेकिन उनके विरोधी ही नहीं, कई तटस्थ पर्यवेक्षक भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं दिखते। बिहार की राजनीति में उनकी छवि ऐसे खिलाड़ी की बन चुकी है, जो आखिरी पल तक अपने पत्ते पूरी तरह खोलते नहीं।

भाजपा ने अब तक उन्हें क्यों दिया पूरा सम्मान?

नीतीश कुमार को लेकर एक बड़ा तथ्य यह भी है कि भाजपा ने कई मौकों पर उन्हें उनकी संख्या से अधिक राजनीतिक महत्व दिया। 2020 में भाजपा के पास अधिक विधायक होने के बावजूद मुख्यमंत्री की कुर्सी नीतीश कुमार को सौंपी गई। इसके बाद भी गठबंधन में उनके राजनीतिक सम्मान का ध्यान रखा गया। लोकसभा चुनावों में भी भाजपा ने जदयू को बराबरी का संदेश देने की कोशिश की। यही वजह है कि एनडीए के भीतर फिलहाल ऐसा कोई खुला संकेत नहीं दिखता कि भाजपा उन्हें किनारे करने की जल्दी में है। हालांकि राजनीति में संकेत अक्सर सतह के नीचे चलते हैं, इसलिए अटकलों को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता।

क्या बिहार छोड़ना नीतीश कुमार के लिए आसान होगा?

यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे भावनात्मक और राजनीतिक पक्ष है। नीतीश कुमार की पहचान सिर्फ एक नेता के तौर पर नहीं, बल्कि बिहार-केंद्रित राजनेता के रूप में बनी है। केंद्र की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बावजूद उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा दांव बिहार पर लगाया। सड़क, पुल, बिजली, कानून-व्यवस्था, महिला सशक्तिकरण और प्रशासनिक सुधार जैसे मुद्दों पर उनके काम को बिहार की राजनीति में अलग पहचान मिली। उन्होंने बार-बार यह संदेश दिया कि उनकी प्राथमिकता दिल्ली नहीं, बिहार है। यही कारण है कि बिहार के साथ उनका रिश्ता केवल सत्ता का नहीं, बल्कि राजनीतिक भावनात्मक जुड़ाव का भी माना जाता है। ऐसे में जब वे राज्यसभा के जरिए राष्ट्रीय राजनीति की ओर जाते दिख रहे हैं, तो स्वाभाविक है कि सवाल उठे क्या यह बिहार की सक्रिय राजनीति से उनकी दूरी की शुरुआत है? या फिर यह सिर्फ एक रणनीतिक कदम है?

क्या मुख्यमंत्री रहते हुए राज्यसभा सदस्य बने रह सकते हैं?

तकनीकी रूप से कुछ सीमित परिस्थितियों में रास्ते निकल सकते हैं, लेकिन राजनीतिक और नैतिक दृष्टि से मामला इतना सरल नहीं है। एक ओर संवैधानिक स्थिति है, दूसरी ओर जनता के सामने राजनीतिक संदेश का प्रश्न। नीतीश कुमार लंबे समय से बिहार की राजनीति में नैतिकता, सुशासन और संतुलन की भाषा बोलते रहे हैं। ऐसे में वे कौन-सा रास्ता चुनते हैं, यह केवल कानूनी नहीं बल्कि उनकी राजनीतिक विरासत से भी जुड़ा फैसला होगा।

30 मार्च को आखिर बिहार क्या देखेगा?

30 मार्च 2026 तक नीतीश कुमार को फैसला करना ही होगा। यही वजह है कि इस तारीख को बिहार की राजनीति में निर्णायक माना जा रहा है। इस दिन तक तस्वीर साफ हो सकती है कि वे बिहार की सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहते हैं या राज्यसभा के जरिए नई राजनीतिक भूमिका में जाना चाहते हैं। अगर वे विधान परिषद की सदस्यता छोड़ते हैं, तो यह संकेत होगा कि वे नई दिशा में बढ़ रहे हैं। अगर वे किसी दूसरी रणनीति के साथ सामने आते हैं, तो बिहार की राजनीति एक बार फिर अप्रत्याशित मोड़ ले सकती है। Bihar News

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