BJP नेता मनोज गुप्ता के नोएडा विधानसभा सीट से टिकट के दावे ने सियासी हलचल बढ़ा दी है। पंकज सिंह के टिकट को लेकर उठे इस दावे पर नोएडा में चर्चाएं तेज हैं।

Noida News : नोएडा के नागरिकों की एक तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। नोएडा के नागरिकों की इस तीखी प्रतिक्रिया के ऊपर राजनैतिक विश्लेषकों ने भी अपनी हामी भरी है। नोएडा में सक्रिय तमाम राजनैतिक विश्लेषक इस बात को लेकर बहुत हैरान हैं कि नोएडा में लम्बे अर्से से राजनीति कर रहा भारतीय जनता पार्टी (BJP) का एक नेता अचानक कैसे मानसिक रूप से (पागल होना) बीमार हो गया है। दरअसल नोएडा में राजनीति करने वाले BJP के इस नेता ने अचानक एक दावा ठोंक दिया है। इस नेता के द्वारा ठोंका गया दावा नोएडा के किसी भी नागरिक अथवा नोएडा में सक्रिय किसी भी राजनीतिक विश्लेषक के गले से नीचे नहीं उतर रहा है।
हम यहां बात कर रहे हैं भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता मनोज गुप्ता की। दरअसल BJP के नेता मनोज गुप्ता ने अचानक यह दावा कर दिया है कि उन्हें नोएडा के विधायक पंकज सिंह का टिकट काटकर BJP की तरफ से विधायकी का टिकट दे दिया जाए। इस दावे को आप भी विस्तार से समझ लीजिए। मनोज गुप्ता ने नोएडा में सक्रिय एक प्रसिद्ध सामाजिक संगठन अग्रवाल मित्र मंडल के माध्यम से समाचार पत्रों तथा न्यूज पोर्टल पर एक समाचार चलवाया है। इस समाचार को चेतना मंच के न्यूज पोर्टल https://chetnamanch.com/ पर 9 सितंबर 2026 को दोपहर 2 बजकर 24 मिनट पर अपलोड किया गया है। यहां नीले रंग में दिए गए लिंक में उस पूरे समाचार को आप एक बार भी फिर पढ़ सकते हैं। लिंक.
नोएडा विधानसभा क्षेत्र की बड़ी खबर, BJP नेता का बड़ा दावा
ऊपर दिए गए लिंक में आपने जो समाचार पढ़ा उस समाचार को लेकर चेतना मंच को नोएडा शहर के लाखों लोगों की प्रतिक्रियाएं मिली हैं। इन प्रतिक्रियाओं में 90 प्रतिशत से अधिक प्रतिक्रियाएं मनोज गुप्ता के खिलाफ हैं। नोएडा शहर के हजारों की संख्या में नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, राजनेताओं, उद्योगपतियों, व्यापारियों तथा प्रशासनिक अधिकारियों ने कहा है कि ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अपने ‘‘चेले’’ रवि प्रधान के फरार हो जाने के बाद मनोज गुप्ता को कोई मानसिक समस्या पैदा हो गई है। इसी कारण मनोज गुप्ता इस प्रकार की बचकाना घोषणा करते घूम रहे हैं। नोएडा क्षेत्र में लम्बे अर्से से सक्रिय एक वरिष्ठ पत्रकार ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए मनोज गुप्ता की घोषणा को एक बहुत पुरानी कहावत से जोड़ा है। उस पुरानी कहावत वाली प्रतिक्रिया को हम यहां नीचे हू-ब-हू प्रकाशित कर रहे हैं
घोड़े को नाल ठोंकी जा रही थी तो मेढक़ी ने भी उठाया पैरभारत की लोकभाषा और ग्रामीण जीवन से निकली कहावतों में व्यंग्य, हास्य और गहरी सीख छिपी होती है। ऐसी ही एक बेहद चर्चित कहावत है“घोड़े को नाल ठोकी जा रही थी तो मेंढकी ने भी पैर उठा दिया।” यह कहावत उस स्थिति पर कही जाती है, जब कोई व्यक्ति अपनी क्षमता, हैसियत या सामर्थ्य से कहीं बड़ा काम अपने जिम्मे लेने की कोशिश करता है। यानी जहां किसी बड़े और सक्षम व्यक्ति की जरूरत है, वहां कोई ऐसा व्यक्ति भी उसी भूमिका में आने की कोशिश करे, जिसके पास न तो उसके बराबर क्षमता है और न ही वैसा सामर्थ्य। इस कहावत के पीछे एक मजेदार लोककथा सुनाई जाती है। कहा जाता है कि एक जगह एक घोड़े के पैरों में नाल ठोकी जा रही थी। घोड़ा मजबूत था और उसके पैरों में लोहे की नाल लगाने के लिए लोहार हथौड़े और कील का इस्तेमाल कर रहा था। तभी वहां एक मेंढकी भी आ पहुंची। उसने घोड़े के पैर में नाल ठोकी जाती देखी तो उसने भी अपना पैर आगे कर दिया और मानो कहने लगी—“मेरे पैर में भी नाल ठोक दो।” वहां मौजूद लोग यह देखकर हंस पड़े। उन्होंने कहा कि नाल घोड़े के मजबूत खुर के लिए होती है। मेंढक के छोटे और नाजुक पैर में भला लोहे की नाल कैसे ठोकी जा सकती है? वहां तो एक कील भी ठीक से नहीं टिक पाएगी। यहीं से इस कहावत का व्यंग्य पैदा होता है—जिस काम के लिए जिस स्तर की क्षमता और सामर्थ्य चाहिए, वह हर किसी के बस की बात नहीं होती। केवल किसी बड़े व्यक्ति को कोई बड़ा काम करते देखकर उसी काम में अपना पैर आगे कर देना बुद्धिमानी नहीं, बल्कि हास्यास्पद स्थिति पैदा कर सकता है। जब कोई व्यक्ति अपनी वास्तविक क्षमता से कहीं अधिक बड़ा दावा करने लगे, किसी ऐसे काम की जिम्मेदारी लेने की कोशिश करे जिसके लिए वह सक्षम नहीं है, अथवा किसी बड़े पद और बड़े व्यक्ति की बराबरी करने की कोशिश करे, तब व्यंग्य के तौर पर कहा जाता है— “घोड़े को नाल ठोकी जा रही थी, मेंढकी ने भी पैर उठा दिया।” इस कहावत में “घोड़ा” बड़े सामर्थ्य, क्षमता और योग्यता का प्रतीक है, जबकि “मेंढकी” ऐसे व्यक्ति का प्रतीक बन जाती है जो अपनी वास्तविक स्थिति को समझे बिना उसी काम में कूद पड़ता है। भारतीय राजनीति में तो यह कहावत आए दिन चरितार्थ होती दिखाई देती है। राजनीति में किसी बड़े अभियान, बड़े आंदोलन, बड़े पद या बड़ी राजनीतिक लड़ाई की जिम्मेदारी उठाना केवल इच्छा का विषय नहीं होता। उसके लिए जनाधार, संगठन, राजनीतिक अनुभव, स्वीकार्यता और परिस्थितियों को संभालने की क्षमता भी जरूरी होती है। लेकिन जब कोई व्यक्ति इन तमाम कसौटियों पर बहुत पीछे होने के बावजूद किसी बड़े राजनीतिक लक्ष्य को अपने कंधों पर उठाने का दावा करने लगे, तब पुराने लोगों को यही कहावत याद आती है— “घोड़े को नाल ठोकी जा रही थी, मेंढकी ने भी पैर उठा दिया।” राजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि राजनीति में सवाल केवल पैर उठाने का नहीं होता, सवाल यह भी होता है कि जिस काम के लिए पैर उठाया गया है, क्या उसे संभालने की ताकत भी उस पैर में है? नोएडा के नागरिक राजनीतिक विश्लेषक तथा घोड़े व मेढक़ी वाली बात बताने वाले पत्रकार का कहना है कि आज की तारीख में यह कहावत नोएडा में सक्रिय भाजपा के नेता मनोज गुप्ता के ऊपर पूरी तरह से चरितार्थ हो रही है।
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