भाजपा नेता हरिश्चंद्र भाटी गुर्जर समाज में अपनी मजबूत पहचान और प्रभाव के साथ नई भूमिका में सक्रिय हैं। गुर्जर समाज की एकता, युवाओं के भविष्य, शिक्षा, रोजगार और संगठन को लेकर उनके अभियान ने किस तरह नई चर्चा को जन्म दिया है। जानिए इस खास रिपोर्ट में।

Noida News : उत्तर प्रदेश की राजनीति, नोएडा के सामाजिक जीवन और गुर्जर समाज की सक्रिय राजनीति में हरिश्चंद्र भाटी एक ऐसा नाम हैं, जिसकी राजनीतिक यात्रा कई दशकों में अलग-अलग पड़ावों से होकर गुजरी है। कभी सत्ता की राजनीति के प्रमुख चेहरों में रहे हरिश्चंद्र भाटी आज अपने जीवन के उत्तरार्ध में जिस भूमिका में दिखाई दे रहे हैं, वह केवल राजनीतिक पद पाने की कोशिश से अलग नजर आती है। वर्तमान समय में वह अखिल भारतीय गुर्जर महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर गुर्जर समाज की एकता, संगठन, शिक्षा, रोजगार, व्यवसाय और सामाजिक सम्मान की बात कर रहे हैं। हाल के महीनों में उनकी सक्रियता ने उन्हें एक बार फिर गुर्जर समाज की राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है। उनकी इस नई सामाजिक सक्रियता के पीछे एक व्यक्तिगत त्रासदी भी जुड़ी है उनके पुत्र आशीष भाटी का असामयिक निधन। Noida News
हरिश्चंद्र भाटी के लिए वर्ष 2025 का वह समय बेहद पीड़ादायक रहा, जब उनके पुत्र आशीष भाटी का निधन हो गया। आशीष भाटी नोएडा प्राधिकरण में महत्वपूर्ण पद पर कार्यरत थे। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार वह नोएडा प्राधिकरण में करीब 18 वर्षों से कार्यरत थे और संस्थागत विभाग में एजीएम/डीजीएम स्तर की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। उनका निधन डेंगू के उपचार के दौरान दिल्ली के निजी अस्पताल में हुआ था। आशीष भाटी की शिक्षा भी उच्च स्तर की थी। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने सिंधिया स्कूल और एमिटी यूनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त करने के बाद लंदन से एमबीए किया था। नोएडा प्राधिकरण में लंबे कार्यकाल के दौरान उन्हें विकास परियोजनाओं से जुड़े समर्पित अधिकारी के रूप में याद किया गया। आशीष के निधन के बाद नोएडा और ग्रेटर नोएडा के राजनीतिक तथा सामाजिक क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई थी। उनके अंतिम संस्कार में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं और क्षेत्र के अनेक प्रमुख लोगों ने पहुंचकर श्रद्धांजलि दी थी। एक पिता के लिए जवान बेटे को खोने का दर्द कितना गहरा होता है, इसे शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं है। लेकिन हरिश्चंद्र भाटी ने इस व्यक्तिगत पीड़ा को अपने भीतर समेटते हुए उसे एक व्यापक सामाजिक संकल्प में बदलने का रास्ता चुना। Noida News
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हरिश्चंद्र भाटी की वर्तमान सक्रियता को इसी दृष्टि से देखा जा रहा है।उनके सामने जीवन का एक कठिन प्रश्न थाव्यक्तिगत त्रासदी के बाद आगे का रास्ता क्या हो? उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन को समाप्त करने के बजाय उसे समाज के लिए और अधिक सक्रिय करने का रास्ता चुना। यही कारण है कि पिछले समय में हरिश्चंद्र भाटी गुर्जर समाज के विभिन्न कार्यक्रमों में लगातार दिखाई दे रहे हैं। उनका संदेश है कि समाज को केवल राजनीतिक संख्या के रूप में नहीं बल्कि शिक्षित, संगठित, आर्थिक रूप से मजबूत और सामाजिक रूप से जागरूक समुदाय के रूप में आगे बढ़ना होगा। जनवरी 2026 में ग्रेटर नोएडा के तिलपता गांव में अखिल भारतीय गुर्जर महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उनके स्वागत का कार्यक्रम भी हुआ था, जिसने स्थानीय स्तर पर उनकी नई सामाजिक भूमिका की सक्रियता को सामने रखा। Noida News
हरिश्चंद्र भाटी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनकी पहचान केवल सामाजिक कार्यकर्ता की नहीं है। उनका लंबा राजनीतिक अनुभव भी उनके साथ है।
इसी वजह से जब वह गुर्जर समाज की एकता की बात करते हैं तो उनके संदेश का राजनीतिक प्रभाव भी दिखाई देता है। समाज के विभिन्न वर्गों, राजनीतिक विचारधाराओं और अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े लोगों को एक मंच पर लाने का प्रयास उनके वर्तमान अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है। यहां एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि समाज की एकता का अर्थ किसी एक राजनीतिक दल के साथ खड़ा होना नहीं है। बल्कि हरिश्चंद्र भाटी की मौजूदा मुहिम में शिक्षा, रोजगार, व्यवसाय, सामाजिक सम्मान और संगठन जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी जा रही है। हाल में बागपत में अखिल भारतीय गुर्जर महासभा की ओर से पदाधिकारी नियुक्त किए जाने के दौरान भी 29 अक्टूबर को दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में प्रस्तावित गुर्जर स्वाभिमान रैली को सफल बनाने का आह्वान किया गया। Noida News
हरिश्चंद्र भाटी के नेतृत्व में 29 अक्टूबर 2026 को दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में प्रस्तावित बड़ा गुर्जर समाज कार्यक्रम अब उनकी राष्ट्रीय सामाजिक सक्रियता का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। हालिया कार्यक्रमों में महासभा के पदाधिकारियों और समाज के लोगों से इस आयोजन में बड़ी संख्या में पहुंचने का आह्वान किया जा रहा है। अगस्त 2026 के एक कार्यक्रम में हरिश्चंद्र भाटी ने समाज की सबसे बड़ी ताकत एकता, आपसी भाईचारे और मजबूत संगठन को बताया तथा युवाओं के शिक्षा के साथ रोजगार और व्यवसाय में आगे बढ़ने की जरूरत पर जोर दिया। यह आयोजन इसलिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है क्योंकि इसमें गुर्जर समाज की राष्ट्रीय स्तर पर एक संगठित सामाजिक आवाज प्रदर्शित करने का प्रयास दिखाई देता है।
हरिश्चंद्र भाटी का नोएडा से संबंध केवल राजनीतिक नहीं है। उनका परिवार, उनका सामाजिक जीवन और उनके पुत्र आशीष भाटी की लंबे समय तक नोएडा प्राधिकरण में सेवा इन सभी कारणों से उनका नाम नोएडा के सामाजिक और सार्वजनिक जीवन से गहराई से जुड़ा रहा है। आशीष भाटी के निधन ने इस संबंध को भावनात्मक आयाम भी दे दिया है। नोएडा प्राधिकरण में उनके लंबे कार्यकाल और उनके सहकर्मियों तथा क्षेत्र के लोगों के बीच बनी पहचान का उल्लेख कई रिपोर्टों में हुआ है। यही वजह है कि आज जब हरिश्चंद्र भाटी गुर्जर समाज की राष्ट्रीय एकता की बात करते हैं तो नोएडा उनके अभियान की पृष्ठभूमि में स्वाभाविक रूप से दिखाई देता है।
हरिश्चंद्र भाटी के सार्वजनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उन्होंने राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहने के बावजूद वह मुकाम हमेशा हासिल नहीं किया जिसकी अपेक्षा उनके समर्थक करते रहे। अब जब वह अपने राजनीतिक अनुभव, सामाजिक स्वीकार्यता और गुर्जर समाज में सक्रिय भूमिका को एक साथ लेकर आगे बढ़ रहे हैं, तो स्वाभाविक रूप से उनके भविष्य की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं शुरू होना कोई असामान्य बात नहीं है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी हो सकती है कि केंद्र की सरकार भविष्य में उनके अनुभव और सामाजिक स्वीकार्यता को देखते हुए उन्हें किसी संवैधानिक पद की जिम्मेदारी दे सकती है। राज्यपाल अथवा उपराज्यपाल जैसे पदों के लिए उनके नाम की चर्चा को फिलहाल केवल राजनीतिक अटकल/संभावित चर्चा के रूप में ही देखा जाना चाहिए; ऐसी कोई आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है। यदि कभी ऐसा निर्णय होता है तो यह उनके लिए व्यक्तिगत राजनीतिक उपलब्धि से अधिक उनके लंबे सार्वजनिक जीवन की एक नई संवैधानिक भूमिका होगी।
हरिश्चंद्र भाटी की पहचान एक शिक्षित और अनुभवी सार्वजनिक व्यक्ति की भी रही है। अधिवक्ता के रूप में उनकी पृष्ठभूमि ने उन्हें सार्वजनिक जीवन में संवाद, तर्क और संगठन की समझ दी। राजनीति ने उन्हें सत्ता और प्रशासन के कामकाज को करीब से देखने का अवसर दिया और सामाजिक सक्रियता उन्हें समाज के व्यापक वर्गों से जोड़ रही है।आज उनका सबसे बड़ा अभियान शायद यही है कि गुर्जर समाज केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग करने वाला समुदाय न रहे, बल्कि शिक्षा, प्रशासन, उद्योग, व्यवसाय, रोजगार और सामाजिक नेतृत्व में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराए।
उनके हालिया कार्यक्रमों में भी यही संदेश दिखाई देता है।
हरिश्चंद्र भाटी के वर्तमान जीवन को समझने के लिए आशीष भाटी की स्मृति को अलग करके नहीं देखा जा सकता। एक पिता ने अपने जवान बेटे को खोया। यह ऐसी निजी क्षति है जिसे कोई उपलब्धि पूरा नहीं कर सकती। लेकिन सार्वजनिक जीवन में सक्रिय व्यक्ति के लिए उस पीड़ा को किस दिशा में ले जाना है, यह उसका व्यक्तिगत निर्णय होता है। हरिश्चंद्र भाटी ने उस पीड़ा को समाज के बीच जाने और लोगों को जोड़ने के संकल्प में बदलने का प्रयास किया है। आज वह देश के अलग-अलग हिस्सों में गुर्जर समाज के कार्यक्रमों में पहुंच रहे हैं। संगठन को मजबूत करने, युवाओं को आगे बढ़ाने और समाज को शिक्षा तथा आर्थिक प्रगति की दिशा में ले जाने की बात कर रहे हैं।
हरिश्चंद्र भाटी के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि गुर्जर समाज की एकता का अभियान केवल बड़े आयोजनों और नारों तक सीमित न रह जाए। यदि उनका अभियान शिक्षा, रोजगार, उद्यमिता, सामाजिक सुधार और युवाओं के नेतृत्व विकास तक पहुंचता है, तो यह उनकी सामाजिक यात्रा को एक स्थायी दिशा दे सकता है। 29 अक्टूबर का तालकटोरा स्टेडियम कार्यक्रम इस दृष्टि से एक महत्वपूर्ण परीक्षा भी होगा। यदि देश के अलग-अलग राज्यों से समाज के लोग एक मंच पर आते हैं और संगठनात्मक ढांचे को गांव से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक मजबूत करने की ठोस योजना सामने आती है, तो हरिश्चंद्र भाटी की वर्तमान भूमिका को गुर्जर समाज के राष्ट्रीय नेतृत्व के एक नए अध्याय के रूप में देखा जा सकता है।
हरिश्चंद्र भाटी की कहानी केवल एक राजनेता की कहानी नहीं है। यह एक ऐसे सार्वजनिक व्यक्ति की कहानी है जिसने राजनीति में उतार-चढ़ाव देखे, निजी जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी झेली और फिर उसी पीड़ा से सामाजिक ऊर्जा पैदा करने का प्रयास किया। नोएडा से शुरू होकर देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंच रहा उनका गुर्जर एकता अभियान अब उन्हें गुर्जर समाज की राजनीति और सामाजिक संगठन के केंद्र में ला रहा है। अब देखना यह होगा कि 29 अक्टूबर का तालकटोरा स्टेडियम कार्यक्रम इस अभियान को कितनी व्यापक राष्ट्रीय दिशा देता है और हरिश्चंद्र भाटी अपने अनुभव, संगठनात्मक क्षमता और सामाजिक स्वीकार्यता को आने वाले वर्षों में किस रूप में आगे ले जाते हैं।:
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