Noida News : शिव और विष्णु दोनों ही ऐसे देव हैं जो एक दूसरे की आराधना करते हैं। शिव विष्णु के अराध्य देव हैं। ऐसे ही विष्णु शिव के आराध्य देव हैं। होली की शुरूआत भगवान राम से हुई थी। जब राम वन गमन को गए थे। जरा सोच कर देखिए तो? वनों में होता ही क्या है? पेड़, जंगली जानवर ना रहने की सुविधा न खाने की ना पीने की ना ही जीने की। ऐसे में जीवन आसान नहीं होता। तो वे अपने आप को फोकस रखने की शक्ति के लिए सुबह उठकर एक दूसरे के माथे पर चंदन का तिलक लगते थे। वही परंपरा आज भी है कि लोग होली पर चंदन का तिलक लगाते हैं।
भगवान राम जैसे दिवाली के लिए जाने जाते हैं। दिवाली उनके विजयी होकर वापस अयोध्या लौटने पर मनाई गई थी। ऐसे ही भगवान कृष्ण होली के लिए। रंगों भरी होली भगवान कृष्ण ने शुरू की थी जिसको हम आज तक खेलते आ रहे हैं। एक बार भगवान कृष्ण को होली खेलते देखकर मां पार्वती ने शिव से इच्छा जाहिर की महादेव में भी होली खेलना चाहती हूं। शिव शमशान में बैठे थे। उन्होंने कहा देवी मैं तो योगी और राख ही मेरी भस्म है लेकिन पार्वती का दिल रखने के लिए उन्होंने कहा कि हम तो राख से ही होली खेलेंगे। और उसके बाद शिव ने पार्वती तथा अपने गण इत्यादी के साथ शमशान में राख के साथ ही होली खेली थी । आप सभी जानते हैं यह शिव का गीत बहुत प्रचलित है होली खेलें मसाने में..
दिगंबर खेले मसाने में होली
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और मसाने में जो उन्होंने नाचते गाते होली खेली वह आज भी प्रचलित है। यही कारण है कि गांव देहात या शिव भक्त राख से भी होली खेलकर शिव को याद करते हैं। इसी प्रकार से होली का त्योहार पूरे शहर नोएडा में अलग-अलग तरह से मनाया गया। RWA क्योकी नोएडा प्राधिकरण की आंख कान और नाक होते हैं। जो सच्चे समाज सेवी हैं। वे भी दिल से चाहते हैं समाज को जोडना तथा आगे बढ़ाना। इसलिये वे लगभग हर तीज त्योहार पर अपनी RWA में या अपने सेक्टर के कम्युनिटी सेंटर में विभिन्न प्रकार के रंगारंग कार्यक्रम रखते हैं। जिसके कारंण होली दिवाली तीज इत्यादी में लगभग सभी परिवार, युवा, महिलाएं बच्चे सभी आपस में मिलजुल कर तैयारियां करते हैं फिर धूम धाम से मनाते भी हैं। इन्हें मनाया भी जाना चाहिए यहीं से शुरुआत होती है घरों में परिवारों में संस्कारों के बनने की या बिगड़ने की।Noida News
पढ़ाई करियर के साथ साथ यह भी बहुत जरूरी होता है परिवार संस्था को आगे बढ़ाने के लिए देखा तो यह भी जाता है कि कुछ बच्चे युवा अपने परिवारों से जुड़े ही नहीं होते उसका कहीं एक छोटा सा कारण यह भी हो सकता है कि उन परिवारों ने अपने घर में ऐसा कुछ किया ही नहीं होता कि जिसमें बच्चे बड़े जुड़कर सहयोग देते हुए किसी परंपरा को निभाते जैसे कि यदि घर में हम कोई पाठ पूजा भजन कीर्तन रखते हैं तो हमारे घर के बड़े से लेकर बच्चे जो जिस कार्य को कर सकता है वह उसमें अपनी भागीदारी निभाता ही है। इस तरह से उनको अपने अड़ोस पड़ोस रिश्तेदारी से जुड़ना आता है। लेकिन कुछ सेल्फ सेंटर्ड लोग होते हैं जो सिर्फ करियर पर ही या ऐसा करके क्या मिलेगा? क्यों किया जाये? उसका ही परिणाम होता है कि बच्चे किसी से जुड़ ही नहीं पाते कैरियर बनाते हैं। बनते ही जहां उन्हें रोजगार मिलता है वहां जाकर फिर वही के हो जाते हैं। क्योंकि लगाव किसी से रहा ही नहीं होता। इसी प्रकार हमारे समाज में भी। हमारे नोएडा में भी कुछ सेक्टर ऐसे हैं जहां RWA कब्ज़ा सा कर लेती हैं। वहां के रेजिडेंट्स पर अपना हक बनाए रखने के लिए वह विभिन्न अन्य गतिविधियां अपनाते हैं लेकिन सेक्टर के रेजिडेंटस को जुड़ने नहीं देते। यही कारण है कि जब वहां के सीनियर उस सेक्टर को बनाने वाले नहीं रह जाते अपनी आयु पूरी कर स्वर्ग गमन कर जाते हैं तो उनके बच्चे बाहर विदेशों से कहीं से भी आकर बिना अपने अड़ोस पड़ोस से लगाव रखें किसी को भी वह घर जो की उनके लिए तो मकान ही रह जाता है। वे बेचकर चले जाते हैं। तब अड़ोस- पड़ोस के लोग ठगे से देखते रह जाते हैं कि यह क्या हुआ? चाहे वो होटल हो, ओयो हो या कुछ भी ?Noida News