उपलब्ध जानकारी के अनुसार, समिति ने निर्माण एजेंसी राजकीय निर्माण निगम से कुछ बिंदुओं पर जवाब मांगे, लेकिन समय की कमी के चलते नोएडा अथॉरिटी के अधिकारियों से विस्तृत पूछताछ नहीं हो सकी।

Noida News : नोएडा के सेक्टर-95 में स्थित राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल एवं ग्रीन गार्डन एक बार फिर खर्च की फाइलों और रिकॉर्ड की खामियों को लेकर चर्चा में आ गया है। CAG की आपत्तियों पर सुनवाई कर रही लोक लेखा समिति (PAC) ने अब नोएडा अथॉरिटी से इस परियोजना पर हुए व्यय का पूरी डिटेल के साथ हिसाब तलब किया है। समिति ने सिर्फ रकम का आंकड़ा ही नहीं, बल्कि निर्माण से जुड़े अन्य अहम बिंदुओं पर भी विस्तृत जानकारी तलब कर नोएडा प्राधिकरण की फाइलों को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
यह स्मारक 2007 से 2011 के बीच तैयार हुआ था, लेकिन ऑडिट आपत्तियों ने इसके निर्माण को लेकर शुरुआत से ही सवाल खड़े कर दिए। इन्हीं संकेतित अनियमितताओं पर PAC लगातार सुनवाई कर रही है। इसी सिलसिले में बुधवार को लखनऊ में बैठक बुलाई गई, मगर हैरानी की बात यह रही कि चर्चा महज 10–15 मिनट में ही समाप्त हो गई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, समिति ने निर्माण एजेंसी राजकीय निर्माण निगम से कुछ बिंदुओं पर जवाब मांगे, लेकिन समय की कमी के चलते नोएडा अथॉरिटी के अधिकारियों से विस्तृत पूछताछ नहीं हो सकी। इस बीच नोएडा अथॉरिटी के एसीईओ सतीश पाल ने कहा है कि अगली सुनवाई में समिति द्वारा मांगे गए सभी रिकॉर्ड्स और विवरण नोएडा अथॉरिटी की ओर से प्रस्तुत किए जाएंगे।
मामले की सबसे बड़ी गांठ नोएडा में MoU और वास्तविक खर्च के बीच दिख रहे भारी अंतर पर आकर अटकती है। नोएडा अथॉरिटी के मुताबिक, अलग-अलग चरणों में निर्माण एजेंसी को करीब 723 करोड़ रुपये जारी किए गए, जिसे राजकीय निर्माण निगम को MoU के तहत भुगतान बताया जा रहा है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि नोएडा अथॉरिटी की फाइलों में मौजूद MoU की रकम सिर्फ 84 करोड़ रुपये दर्ज बताई जा रही है और इसके बाद के निर्माण कार्यों से जुड़े अन्य MoU रिकॉर्ड में नदारद हैं। इसी विरोधाभास ने सवालों की पूरी श्रृंखला खड़ी कर दी है। नोएडा अथॉरिटी के कुछ अधिकारी 84 करोड़ को चारदीवारी जैसे सीमित कामों से जोड़ते हैं, जबकि परियोजना से जुड़े पूर्व अधिकारियों का दावा है कि कुल खर्च 1000 करोड़ रुपये से ऊपर गया और इसमें शासन व नोएडा अथॉरिटी दोनों स्तरों से धनराशि लगी। उधर, निर्माण सामग्री को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आए हैं। कहा जा रहा है कि गुलाबी पत्थर की सप्लाई चुनार (मिर्जापुर) से हुई, लेकिन दस्तावेजों में उसे राजस्थान के बयारना से दिखाकर ढुलाई/परिवहन के नाम पर अतिरिक्त भुगतान लिया गया। आरोप है कि इस मद का भुगतान भी नोएडा अथॉरिटी के खजाने से हुआ, जिससे पूरा प्रकरण अब रिकॉर्ड, भुगतान और जवाबदेही के सवालों में और गहराता जा रहा है।
सूत्रों के हवाले से नोएडा में इस परियोजना की फाइलों में एक बड़ा ब्लाइंड स्पॉट सामने आता है। बताया जाता है कि 2012 में तत्कालीन चीफ प्रोजेक्ट इंजीनियर की रिपोर्ट में दर्ज था कि 2009–10 तक करीब 679 करोड़ रुपये खर्च हो चुके थे, लेकिन इसके बाद के चरणों से जुड़े बिल-बाउचर नोएडा अथॉरिटी के रिकॉर्ड में नहीं मिले। यहीं पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है इसके बाद खर्च हुई रकम किसके आदेश पर, किस स्वीकृति के आधार पर और किन दस्तावेजों के सहारे जारी की गई, इसका लिखित ट्रेल नोएडा अथॉरिटी की फाइलों में स्पष्ट नहीं दिखता। मामला यहीं नहीं रुकता। सूत्र बताते हैं कि करीब 9 साल पहले शासन की ऑडिट रिपोर्ट में भी इस परियोजना पर गंभीर आपत्तियां दर्ज की गई थीं। उस रिपोर्ट में भी यही सवाल उभरा था कि 84 करोड़ के MoU के मुकाबले खर्च का आंकड़ा लगभग 1000 करोड़ तक कैसे पहुंच गया और यदि अतिरिक्त काम हुए भी तो उनकी प्रक्रियागत मंजूरी, एग्रीमेंट्स और भुगतान के प्रमाण आखिर कहां हैं?
इस पूरे प्रकरण में लखनऊ विजिलेंस की जांच भी चल रही है। जानकारी के मुताबिक, विजिलेंस रिपोर्ट के आधार पर पिछले साल कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई की बात भी सामने आई थी। अब PAC की ताजा मांग के बाद उम्मीद है कि नोएडा अथॉरिटी को दस्तावेजी रिकॉर्ड के जरिए यह स्पष्ट करना होगा कि रकम किस मद में, किस स्वीकृति के तहत और किस जिम्मेदारी के साथ खर्च हुई। Noida News