नोएडा के सेक्टर-118 में देर रात तक कैफे खुलने और पुलिस कार्रवाई के बाद दोबारा संचालित होने के दावों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। नशे और कथित संरक्षण के आरोपों की जांच की मांग तेज हो गई है।

Noida News : नोएडा शहर के नागरिकों को जागरूक करने, नोएडा शहर में सक्रिय तथाकथित समाजसेवकों को नींद से जगाने, नोएडा के राजनेताओं खासतौर से नोएडा के सांसद डॉ. महेश शर्मा तथा नोएडा के विधायक व भाजपा के प्रसिद्ध नेता पंकज सिंह, नोएडा के भाजपा अध्यक्ष महेश चौहान सहित तमाम नेताओं को उनकी जिम्मेदारी की याद दिलाने की मकसद से चेतना मंच ने अपने न्यूज पोर्टल https://chetnamanch.com/. पर 4 सितंबर 2026 को दोपहर 1.59 बजे पर एक स्टोरी प्रकाशित की गई थी। इस स्टोरी का शीर्षक था ‘‘नोएडा वाले सावधान, नोएडा शहर में मौजूद है अपराध का एक कोना’’ इस समाचार के प्रकाशन के 4 दिन बाद भी समाचार का रत्ती भर भी असर नहीं हुआ। इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी समाचार का असर ना होने के बाद चेतना मंच की टीम को लगा कि इस मामले में टीम के प्रयासों में जरूर कुछ कमी रह गई होगी। इस मकसद से हमारी टीम ने इस मामले का पूरा विवरण और अधिक आसान शब्दों में प्रकाशित करने का फैसला किया है।
दरअसल नोएडा के थाना सेक्टर-113 के क्षेत्र में एक सेक्टर-118 पड़ता है। यह 118 सेक्टर कोई विधिवत सेक्टर ना होकर अवैध धंधों, अवैध कारोबार तथा नोएडा शहर में रहने वाली युवा पीढ़ी खासतौर से Zen-G को बर्बाद कर रहा है। जब हम Zen-G को बर्बाद करने की बात कर रहे हैं तो उसका अर्थ यह है कि नोएडा के सेक्टर-113 थाने की पुलिस के संरक्षण में नोएडा के बदनाम कोने सेक्टर-118 में ‘‘ड्रग्स की सप्लाई का बहुत बड़ा धंधा चल रहा है।’’ ड्रग्स (यानि सूखा नशा) प्रयोग करके नोएडा शहर तथा नोएडा के सर्फाबाद, होशियारपुर तथा सोरखा आदि गाँव में युवक तथा युवतियां बड़ी संख्या में नशेड़ी बन रहे हैं। इन युवाओं को नशेड़ी बनाने के धंधे का संचालन करने वाली पूरी व्यवस्था के पीछे नोएडा का ही अपना एक युवक तथा उसकी ‘‘टीम’’ है। इस टीम के ऊपर नोएडा के सेक्टर-113 थाने में तैनात कोतवाल तथा कोतवाली के ‘‘ठेकेदार’’ का हाथ है।
नशे के इस कारोबार का मूल केन्द्र ‘‘फुरसत के पल’’ नाम का एक कैफे है। यह तथाकथित कैफे नोएडा के बदनाम कोने सेक्टर-118 में चलाया जा रहा है। इस कैफे के आस-पास इसकी ब्रांच के रूप में ढ़ेर सारे छोटे-बड़े कैफे हैं। इन तथाकथित कैफे में रोज रात के समय 11.00 बजे से लेकर सुबह के 4.00 बजे तक नोएडा की युवा पीढ़ी ZEN-G को वह सब कुछ परोसा जाता है जिसकी कल्पना करके भी युवा पीढ़ी के परिजन कांप सकते हैं। इन तथाकथित कैफे में आपको सूखा नशा (ड्रग्स), गीला नशा (अवैध शराब), सुरा तथा सुन्दरी (विदेशी मंहगी शराब तथा सेक्स वर्कर (Sex worker) सब कुछ मिल जाएगा। इस कारोबार के अड्डे पर सब कुछ अवैध ही अवैध है। इस अवैध धंधे को चलाने के पैटर्न के विषय में पता करने पर यह ज्ञात हुआ कि नोएडा शहर में स्थित थाना सेक्टर-113 की पुलिस इस अवैध धंधे के संरक्षण के बदले प्रति माह 10 लाख रूपए की वसूली करती है। जहां से थाने की पुलिस को 10 लाख रूपए की कमाई होती हो वहां पर असली कमाई का अंदाजा शहर में सोए पड़े ‘‘समाज के ठेकेदार’’ भली-भांति लगा ही सकते हैं (शायद)।
चेतना मंच की टीम ने इस पूरे अवैध कारोबार की जड़ तक जाने का प्रयास किया तो पता चला कि इस अवैध धंधे का संचालन नोएडा के सर्फाबाद गाँव में ही रहने वाले एक खानदानी परिवार का युवक कर रहा है। उस युवक के दादाजी का नाम मिश्री लाल यादव था। उसके पिता का नाम रोहताश यादव तथा उस युवक को पूरे क्षेत्र में ‘‘घोटा पहलवान’’ के नाम से जाना जाता है। जानकार सूत्रों का दावा है कि ‘‘घोटा पहलवान’’’ ने अपने ही पूर्वजों की खसरा नम्बर-317, 318 तथा 319 पर मौजूद राज्य सरकार में निहित भूमि पर अवैध कब्जा करके कैफे चलाने का ठेका अपनी एक ‘‘टीम’’ को दे रखा है। यहां चल रहे कैफे से ‘‘घोटा पहलवान’’ तथा उसकी टीम को हर महीने करोड़ों रुपये की कमाई होती है। जानकार सूत्रों का कहना है कि नोएडा के ही गाँव का यह युवक किसी जमाने में इस क्षेत्र के चर्चित माफिया रवि काना से भी बड़ा माफिया बनकर पूरे नोएडा क्षेत्र पर ‘‘राज’’ करना चाहता है। यही कारण है कि इस युवक ने नोएडा के अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनेताओं, पत्रकारों तथा पुलिस को अपना संरक्षक बना रखा है। इस प्रकार नोएडा के इस बदनाम कोने में ‘‘राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट’’ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है।
आपको बता दें कि चेतना मंच की टीम एक बार फिर बीते रात इस बदनाम कोने में गई। चेतना मंच की टीम में एक युवती पत्रकार भी थी। उस युवती पत्रकार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि नोएडा के सेक्टर-118 स्थित स्टार क्रिकेट ग्राउंड में चल रहे ‘फुरसत के पल’ समेत अन्य कैफे को लेकर हमारी पड़ताल अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जहां सवाल सिर्फ कैफे के देर रात खुलने का नहीं है। सवाल है, पुलिस की लगातार कार्रवाई के बावजूद यह कैफे आखिर बार-बार खुल कैसे रहा है? पिछले तीन दिनों से पुलिस मौके पर पहुंच रही है, कैफे बंद करा रही है। आज भी यही हुआ। कैफे खुला मिला, पुलिस को बुलाया गया तो बंद कराया गया। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। पुलिस गई और कैफे फिर खुल गया। दोबारा पुलिस को बुलाना पड़ा। पुलिस फिर पहुंची और कैफे बंद हुआ। अब जरा इस पूरे घटनाक्रम को जोडक़र देखिए। तीन दिन से पुलिस को इस कैफे की जानकारी है। पुलिस मौके पर जाकर इसे बंद करा रही है। इसके बावजूद कैफे फिर खुल रहा है। तो सवाल यह नहीं कि पुलिस को पता था या नहीं। सवाल यह है कि पुलिस की कार्रवाई के बाद भी कैफे संचालक में दोबारा कैफे खोलने की इतनी हिम्म्त कहां से आ रही है? कौन है जो इसे बार-बार खुलने की हिम्मत दे रहा है? क्या सिर्फ कैफे संचालक अपनी मर्जी से पुलिस की कार्रवाई को चुनौती दे रहा है? या फिर इसके पीछे कोई ऐसा नेटवर्क है, जिसे स्थानीय स्तर पर किसी तरह का संरक्षण हासिल है? क्या स्थानीय पुलिस को ये कैफे संचालक हर दिन के हिसाब से घूंस के रूप में पैसा पहुंचाते हैं? क्या स्थानीय पुलिस अपनी पुलिस कमिश्नर श्रीमती लक्ष्मी सिंह को भी चुनौती दे रही है? यदि नहीं तो थाना सेक्टर-113 को जानकारी होने के बाद भी ये कैफे देर रात तक कैसे खुल रहे हैं और वहां सैकड़ों लडक़े लड़कियों का जमावड़ा कैसे लगता है? क्योंकि सवाल तो उठता है कि अगर संरक्षण है, तो किसका? अब बात सिर्फ कैफे की नहीं, संरक्षण के पूरे खेल की समझाइए। हमारी पिछली पड़ताल में कैफे के भीतर नशे के सेवन से जुड़े सबूत सामने आए थे। ऐसे में पुलिस की जिम्मेदारी सिर्फ कैफे बंद कराने तक खत्म नहीं होती। उसे यह भी देखना होगा कि ऐसी गतिविधियां आखिर लगातार चल कैसे रही थीं और इनके पीछे कौन लोग हैं। जब 11.00 बजे के बाद सारी दुकानें बंद हो जाती हैं तो ये कैफे किसके परमिशन से सुबह 4-5 बजे तक खुलते हैं? अगर कोई आर्थिक लेन-देन या संरक्षण का नेटवर्क है तो उसकी भी जांच होनी चाहिए। क्या स्थानीय स्तर पर कैफे को चलाने के लिए किसी को पैसा दिया जा रहा है? अगर नहीं, तो फिर लगातार पुलिस कार्रवाई के बावजूद इसे बार-बार खोलने की हिम्मत कहां से आ रही है? इन सवालों का जवाब पुलिस की जांच से ही मिल सकता है। लेकिन आज एक और कहानी सामने आई। कैफे संचालक की ओर से करीब 7-8 लोगों को मौके पर बुलाया गया। हमारी गाड़ी वहां पहुंचते ही ये लोग पास आए और बहस शुरू कर दी। इनमें एक व्यक्ति ने खुद को आज तक, दूसरे ने टाइम्स नाउ के रिपोर्टर और एक अन्य ने NDTV PCR का कर्मचारी बताया। अपने-अपने संस्थानों के नाम का हवाला देकर हम पर दबाव बनाने की कोशिश की गई। लेकिन सवाल यह है कि, एक कैफे को लेकर मीडिया संस्थानों के नाम की जरूरत क्यों पड़ी? ये लोग वहां किसके बुलावे पर पहुंचे थे? कैफे संचालक से इनका क्या संबंध है? और अगर वे वास्तव में संबंधित संस्थानों से जुड़े हैं, तो क्या उन्हें पता था कि वहां किस मामले को लेकर विवाद चल रहा है? सबसे गंभीर सवाल, क्या किसी बड़े मीडिया संस्थान का नाम किसी कैफे को पुलिस कार्रवाई से बचाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था? और अगर इसके पीछे पैसे का लेन-देन है, तो किसे कितना पैसा दिया गया और बदले में क्या मदद ली जा रही थी? इन सवालों का जवाब भी जांच से सामने आना चाहिए। हमने किसी संस्थान के नाम से दबाव में आने के बजाय कानून का सहारा लिया और पुलिस से अपना काम करने का अनुरोध किया। अब पुलिस के सामने सिर्फ कैफे बंद कराने की चुनौती नहीं है। उसे यह पता लगाना होगा कि तीन दिन की लगातार कार्रवाई के बावजूद कैफे दोबारा किसके भरोसे खुल रहा है? कौन इसे हिम्मत दे रहा है? किसका संरक्षण है? और क्या इस पूरे मामले में किसी तरह का आर्थिक लेन-देन हुआ है? क्योंकि अगर पुलिस आती है तो कैफे बंद होता है और पुलिस के जाते ही फिर खुल जाता है, तो यह सिर्फ एक कैफे की मनमानी नहीं लगती। यह उस व्यवस्था पर सवाल है, जहां कानून का दरवाजा बंद होते ही कोई दूसरा दरवाजा खुल जाता है। अब देखना यह है कि पुलिस उस दरवाजे तक पहुंचती है या नहीं।
यहां एक बात स्पष्ट करना जरूरी है। इस खबर का संकलन कर रही हमारी टीम ने पूरे घटनाक्रम को रिकॉर्ड किया है। मौके पर मौजूद कैफे संचालक से जुड़े लोगों और मीडिया संस्थानों का नाम बताकर हमारी टीम से बहस एवं दबाव बनाने वाले व्यक्तियों से जुड़ी जानकारी भी हमारे पास उपलब्ध है। भविष्य में हमारी टीम के किसी सदस्य के साथ कोई अप्रिय घटना, धमकी या किसी तरह की बाधा उत्पन्न होती है, तो उसके जिम्मेदार यही लोग होंगे। हम दबाव में खबर रोकने वाले नहीं हैं। कानून के दायरे में रहकर सवाल पूछना हमारा अधिकार भी है और जिम्मेदारी भी।
इस प्रकरण में चेतना मंच के न्यूज पोर्टल पर 4 सितंबर 2026 दोपहर 1.59 बजे प्रकाशित हुए समाचार को आप यहां दोबारा पढ़ सकते हैं।
नोएडा वाले सावधान : नोएडा शहर में मौजूद है अपराध का एक बड़ा कोना
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