उत्तर प्रदेश की धर्मनगरी चित्रकूट के रैपुरा गांव में दशहरे पर रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता, बल्कि उसकी प्रतिमा की पूजा-अर्चना की जाती है। ग्रामीणों के अनुसार, यह परंपरा करीब 300 साल पुरानी है।

300 साल पुरानी परंपरा, गांव में रावण की प्रतिमा स्थापित कर की जाती है पूजा-अर्चना
UP News : धर्मनगरी चित्रकूट में एक ऐसा गांव भी है, जहां दशहरे पर रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता। यहां के लोग प्रभु श्रीराम की पूजा-अर्चना करते हैं और रामलीला का मंचन भी होता है। प्रतीकात्मक रूप से श्रीराम द्वारा रावण वध का प्रसंग भी प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। झांसी-मिर्जापुर राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे बसे रैपुरा गांव में रावण की विद्वता, ज्ञान और पराक्रम के सम्मान की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। मानिकपुर तहसील के रैपुरा गांव में विजयादशमी पर रावण दहन के बजाय उसकी प्रतिमा की पूजा-अर्चना की जाती है। ग्रामीणों का मानना है कि रावण प्रकांड विद्वान और महान ज्ञानी था। उसकी विद्वता से प्रेरणा लेने के उद्देश्य से गांव के लोग प्रतिमा के सामने शीश नवाते हैं और ज्ञान व शक्ति का आशीर्वाद मांगते हैं। UP News
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ग्राम प्रधान जगदीश पटेल के अनुसार, गांव में रावण की प्रतिमा स्थापित होने का इतिहास करीब 300 साल पुराना माना जाता है। बताया जाता है कि कई सौ साल पहले यहां चीकन दास जी महाराज रहते थे। उनकी समाधि का निर्माण कराया गया था। अनुमान है कि उसी समय रावण की प्रतिमा भी स्थापित की गई थी। तभी से गांव में रावण की पूजा की परंपरा चली आ रही है। UP News
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रैपुरा गांव की रामलीला भी जिले की पुरानी रामलीलाओं में गिनी जाती है। पहले स्थानीय ग्रामीण ही रामलीला में विभिन्न पात्रों का अभिनय करते थे, लेकिन अब बाहर से कलाकार बुलाए जाते हैं। रामलीला देखने के लिए गांव के अलावा आसपास के क्षेत्रों से भी सैकड़ों लोग पहुंचते हैं। खास बात यह है कि रामलीला में प्रभु श्रीराम की आराधना और रावण वध का मंचन होने के बावजूद दशहरे पर रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता। UP News
रैपुरा गांव की एक और खास पहचान यहां के युवाओं की प्रशासनिक सेवाओं और अन्य क्षेत्रों में उपलब्धियां हैं। ग्रामीणों के बीच मान्यता है कि रावण की विद्वता के सम्मान और उसकी प्रतिमा की पूजा से गांव में शिक्षा के प्रति रुचि बढ़ी है। गांव से करीब तीन दर्जन आईएएस और पीसीएस अधिकारी निकलने की बात कही जाती है। गांव से जुड़े आईएएस अधिकारियों में सीपी सिंह और अभिजीत सिंह के नाम बताए जाते हैं। वहीं, तेज प्रताप सिंह, तेज स्वरूप सिंह, राज स्वरूप सिंह, रामकिशोर शुक्ला और यादवेंद्र शुक्ला पीसीएस अधिकारी हैं। इसके अलावा प्रह्लाद सिंह और प्रदीप पांडेय बीडीओ, नाथूराम सिंह रेंजर के पद पर कार्यरत बताए जाते हैं। गांव के कई लोग चिकित्सा क्षेत्र में भी सेवाएं दे रहे हैं। इनमें डॉ. लक्ष्मी, डॉ. अखिलेश सिंह, डॉ. बलबीर सिंह, डॉ. अश्वनी कुमार, डॉ. संदीप कुमार, डॉ. आशा सिंह और डॉ. आशुतोष सिंह के नाम शामिल हैं। रैपुरा की यह परंपरा धार्मिक आस्था के साथ रावण के ज्ञान और विद्वता के प्रति सम्मान का अनूठा उदाहरण है। यही वजह है कि विजयादशमी पर यहां रावण दहन के बजाय उसकी प्रतिमा की पूजा की जाती है। UP Newsव
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