उत्तर प्रदेश के इस खास नगर में आज भी बलुआ पत्थर से बनाई गई रामायणकाल तथा महाभारत काल की मूर्तियां मौजूद हैं। उत्तर प्रदेश का यह खास नगर भारत की सांस्कृतिक विरासत को अपने अस्तित्व के साथ समेटे हुए है।

UP News : अनेक बार चर्चा होती है कि रामायण तथा महाभारत असली कहानी है अथवा काल्पनिक कहानी है। उत्तर प्रदेश में एक ऐतिहासिक नगर ऐसा भी है जो रामायण काल तथा महाभारत काल का जीता-जागता गवाह है। उत्तर प्रदेश के इस खास नगर में आज भी बलुआ पत्थर से बनाई गई रामायणकाल तथा महाभारत काल की मूर्तियां मौजूद हैं। उत्तर प्रदेश का यह खास नगर भारत की सांस्कृतिक विरासत को अपने अस्तित्व के साथ समेटे हुए है।
यहां हम उत्तर प्रदेश के जिस नगर की चर्चा कर रहे हैं वह नगर उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में स्थापित है। उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिला मुख्यालय से 33 किलोमीटर दूर देवगढ़ नगर में लगभग वर्ष 470 में बुंदेली मूर्तिकारों द्वारा स्थानीय लाल बलुआ पत्थर पर उकेरी गई भगवान विष्णु के दशावतारों की प्रतिमाएं अयोध्या में बने भव्य राम मंदिर में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के दौरान चर्चा में आई थीं। इन दोनों के बीच वास्तुकला और भारतीय संस्कृति के निरंतर प्रवाह का गहरा संबंध बताया गया। लेकिन देवगढ़ मंदिर जहां पंचायतन शैली का सबसे पुराना उदाहरण है। वहीं अयोध्या का मंदिर आधुनिक नागर शैली का सबसे बड़ा प्रतीक है। विडंबना यह है कि दशावतार मंदिर के गर्भगृह में किसी देवता की मूर्ति प्रतिष्ठापित नहीं है। इतिहासकारों के अनुसार अयोध्या व देवगढ़, दोनों का अस्तित्व वैदिक काल से है। देवगढ़ वेत्रवती यानी बेतवा नदी के तट पर, तो अयोध्या सरयू के तट पर बसा है।
उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में स्थित देवगढ़ नगर में दशावतार मंदिर भारतीय सभ्यता, कला और स्थापत्य के स्वर्णिमकाल की निशानी है। इस पर शोध करने वाले नेहरू कॉलेज ललितपुर के प्राचार्य डॉ. ओम प्रकाश शास्त्री बताते हैं कि गुप्तकाल में देवगढ़ यानी देवताओं की मूर्ति गढऩे के केंद्र के रूप में पूरे भारत में मशहूर था। यहां की मूर्तियों में भारतीय दर्शन के धार्मिक चिह्न हाथी, शंख, कमल, पुष्प, चक्र, वनमाला आदि का भी समावेश किया गया है। उनका दावा है कि देवगढ़ में पर्वत के ऊपर की समतल भूमि पर अनेक मंदिर बने हुए हैं। मुगल शासकों द्वारा बहुत सारे मंदिर ध्वस्त किए गए, जिनके भग्नावशेष अब भी दिखाई देते हैं, जिनमें एक वाराह मंदिर भी है। महाकवि कालिदास के मेघदूतम में भी देवगढ़ का उल्लेख है। आचार्य आदिनाथ, प्रो विल्सन, डॉ. फ्लीट समेत कई विद्वानों ने भी अपनी पुस्तकों में इसका उल्लेख किया है।
उत्तर प्रदेश के इस नगर देवगढ़ को इतिहासकार दशावतार मंदिर को इसलिए भी श्रेष्ठ मानते हैं, क्योंकि यहां रामायण व महाभारतकालीन देव प्रतिमाओं का अनूठा संगम है। विष्णु शेषनाग के सहस्रफणों की छाया में लेटे हुए हैं। लक्ष्मी जी उनके पैर दबा रही हैं। द्रौपदी व पांच पांडव एक साथ दर्शाए गए हैं, वहीं गजेंद्र की करुण पुकार पर गरुड़ की पीठ पर सवार होकर गजराज की रक्षा के लिए भगवान विष्णु का आना दिव्यतम भाव है। दूसरे फलक में बदरिकाश्रम का दृश्य अंकित है। वैसे तो दशावतार मंदिर लंबे समय से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित है, लेकिन समय और मौसम की मार के अलावा शासन की उपेक्षा ने भी इसे नुकसान पहुंचाया है। बताया जाता है कि वर्ष 1989 में इस मंदिर से नृसिंह की मूर्ति चोरी हो गई थी, जिसकी कीमत तब ढाई करोड़ रु. आंकी गई थी। बाद में खंडित अवस्था में वह मूर्ति बरामद की गई और उसे देवगढ़ के संग्रहालय में रखा गया है। यदि पत्थरों में बसती इस विरासत को अयोध्या की तरह विकसित किया जाए, तो यह बुंदेलखंड का प्रमुख सांस्कृतिक पर्यटन केंद्र बन सकता है। UP News