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अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में दान से जुड़ी कथित अनियमितताओं को लेकर उठे सवालों ने मंदिर प्रबंधन व्यवस्था पर गंभीर बहस छेड़ दी है। आरोपों और जांच के बीच यह मांग तेज हो रही है कि बड़े धार्मिक स्थलों के संचालन के लिए अधिक पारदर्शी और संस्थागत मॉडल अपनाया जाए।

UP News : अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में दान से जुड़ी कथित अनियमितताओं को लेकर उठे सवालों ने मंदिर प्रबंधन व्यवस्था पर गंभीर बहस छेड़ दी है। आरोपों और जांच के बीच यह मांग तेज हो रही है कि बड़े धार्मिक स्थलों के संचालन के लिए अधिक पारदर्शी और संस्थागत मॉडल अपनाया जाए। इसी संदर्भ में 44 साल पुराना काशी विश्वनाथ मंदिर सुधार मॉडल एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है, जिसे कई लोग आज के हालात से जोड़कर देख रहे हैं। UP News
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यह कहानी जनवरी 1983 की है, जब वाराणसी स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर से शिवलिंग के चारों ओर लगा करीब 2.6 किलोग्राम सोने का “अर्घा” चोरी हो गया था। घटना के सामने आते ही स्थानीय स्तर पर भारी आक्रोश फैल गया और प्रशासन पर सख्त कार्रवाई का दबाव बढ़ गया। तत्कालीन सरकार ने मामले को गंभीरता से लेते हुए तेज जांच के आदेश दिए। पुलिस कार्रवाई के तहत 22 जनवरी 1983 तक 11 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया और चोरी गया अधिकांश सामान भी बरामद कर लिया गया। UP News
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इस घटना ने मंदिर की पारंपरिक महंत-आधारित व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। जनता और प्रशासनिक दबाव के बीच राज्य सरकार ने बड़ा कदम उठाने का निर्णय लिया। 28 जनवरी 1983 को अध्यादेश जारी कर मंदिर के प्रबंधन में बदलाव की प्रक्रिया शुरू की गई। इसके बाद बाद में “उत्तर प्रदेश श्री काशी विश्वनाथ मंदिर अधिनियम, 1983” लागू किया गया, जिसके तहत मंदिर का संचालन एक नए ट्रस्ट सिस्टम के अधीन कर दिया गया। नए सिस्टम के तहत एक ट्रस्ट बोर्ड का गठन किया गया, जिसमें धार्मिक प्रतिनिधियों के साथ वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी को भी शामिल किया गया। मंदिर के रोजमर्रा के संचालन के लिए एक कार्यकारी समिति बनाई गई। इस बदलाव के बाद मंदिर प्रबंधन में कई सुधार देखे गए। दान की पारदर्शिता बढ़ी, सुविधाओं में सुधार हुआ और प्रशासनिक नियंत्रण मजबूत किया गया। UP News
नई व्यवस्था लागू होने के बाद मंदिर की वित्तीय स्थिति में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला। जहां पहले दान की राशि सीमित मानी जाती थी, वहीं बाद में इसमें पारदर्शिता के साथ वृद्धि दर्ज की गई। सरकार ने शुरुआती दौर में ट्रस्ट को आर्थिक सहयोग भी दिया, जिससे मंदिर के ढांचे और सुविधाओं को बेहतर करने में मदद मिली। सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया गया और मंदिर परिसर में प्रशासनिक उपस्थिति भी बढ़ाई गई। तत्कालीन समाज कल्याण मंत्री के अनुसार, पुराने सिस्टम में पुजारियों को बेहद कम मानदेय मिलता था, जिसे बाद में बढ़ाकर नियमित वेतन व्यवस्था में बदला गया। इसके साथ ही मंदिर परिसर में बुनियादी सुविधाओं जैसे रोशनी, पंखे और साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया गया। श्रद्धालुओं और गरीबों के लिए भोजन व्यवस्था जैसी सामाजिक पहलें भी शुरू की गईं। UP News
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