लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में कथित धर्मांतरण, महिला डॉक्टरों के उत्पीड़न और धार्मिक भेदभाव का मामला अब बड़ा विवाद बन गया है। उत्तर प्रदेश एसटीएफ की करीब 10 महीने चली जांच के बाद शासन को भेजी गई सात पेज की रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले आरोपों का उल्लेख किया गया है।

UP News : उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) से सामने आया कथित धर्मांतरण और महिला डॉक्टरों के उत्पीड़न का मामला अब एक बड़े संस्थागत विवाद का रूप ले चुका है। प्रदेश के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान में करीब 10 महीने तक चली उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स (STF) की जांच के बाद जो रिपोर्ट सामने आई है, उसने विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली, विभागीय अधिकारियों की भूमिका और महिला डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस पूरे प्रकरण में सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि एसटीएफ की रिपोर्ट में हिंदू महिला डॉक्टरों और कर्मचारियों के साथ कथित धार्मिक भेदभाव का भी उल्लेख किया गया है। आरोप है कि हिंदू रेजिडेंट डॉक्टरों को छठ पूजा जैसे महत्वपूर्ण पर्व पर ही नहीं, बल्कि परिवार के सदस्यों के अंतिम संस्कार जैसे बेहद संवेदनशील अवसरों पर भी छुट्टी देने में आनाकानी की जाती थी। इसके विपरीत कुछ मुस्लिम डॉक्टरों और कर्मचारियों को नमाज पढ़ने तथा रिश्तेदारों के निकाह में शामिल होने के लिए आसानी से छुट्टी दिए जाने की बात रिपोर्ट में दर्ज बताई गई है। यह मामला अब सिर्फ कुछ महिला डॉक्टरों की शिकायतों तक सीमित नहीं रह गया है। एसटीएफ की जांच में कथित यौन शोषण, ब्लैकमेलिंग, धर्म परिवर्तन के लिए दबाव, शिकायतकर्ताओं को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने और आरोपियों को विभागीय संरक्षण दिए जाने जैसे गंभीर आरोपों का उल्लेख किया गया है। UP News
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KGMU में महिला डॉक्टरों और कर्मचारियों की शिकायतों के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने मामले की जांच एसटीएफ को सौंपी थी। जांच की जिम्मेदारी एडिशनल एसपी प्रमेश शुक्ला को दी गई थी। करीब 10 महीने तक चली जांच के बाद एसटीएफ चीफ एवं एडीजी कानून-व्यवस्था अमिताभ यश की ओर से सात पेज की संस्तुति रिपोर्ट शासन को भेजी गई। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार जांच में केजीएमयू के पैथोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी, रेडियोलॉजी और गांधी वार्ड से जुड़े लगभग 12 प्रकरणों का उल्लेख किया गया है। इन मामलों में महिला रेजिडेंट डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और अन्य महिला कर्मचारियों की शिकायतें शामिल हैं। रिपोर्ट में पांच कथित मुख्य आरोपियों और कुछ अन्य विभागीय अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भूमिका की भी चर्चा की गई है। UP News
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इस पूरे मामले में पैथोलॉजी विभाग के रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. रमीज मलिक उर्फ रमीजुद्दीन नायक का नाम प्रमुखता से सामने आया है। एसटीएफ रिपोर्ट के हवाले से प्रकाशित खबरों के अनुसार उन पर कई महिला डॉक्टरों को प्रेम संबंध में फंसाने, उनका कथित शारीरिक एवं मानसिक शोषण करने और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने के आरोप हैं। पैथोलॉजी विभाग की महिला रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. देवव्रती मिश्रा की शिकायत पर 23 दिसंबर 2025 को लखनऊ के चौक थाने में मुकदमा दर्ज हुआ था। इस मामले में डॉ. रमीज की 9 जनवरी 2026 को गिरफ्तारी किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। जांच रिपोर्ट में अन्य महिला डॉक्टरों की शिकायतों का भी उल्लेख है। इनमें डॉ. मानसी सक्सेना, डॉ. कृतिका पांडेय और डॉ. मुस्कान के नाम का जिक्र मीडिया रिपोर्टों में किया गया है। इन शिकायतों में कथित ब्लैकमेलिंग, उत्पीड़न और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने जैसे आरोप शामिल हैं। UP News
एसटीएफ की जांच में केवल पैथोलॉजी विभाग ही नहीं, बल्कि केजीएमयू के दूसरे विभागों से जुड़े मामले भी सामने आए हैं।
गांधी वार्ड का मामला: रिपोर्ट में नर्सिंग स्टाफ नफीस पर एक महिला कर्मचारी को कथित रूप से प्रेमजाल में फंसाकर उसका शारीरिक एवं मानसिक शोषण करने और धर्म परिवर्तन के बाद निकाह करने का दबाव बनाने का आरोप है। इसी वार्ड के फुरकान पर भी एक अन्य महिला कर्मचारी को कथित रूप से धर्म परिवर्तन और निकाह के लिए प्रेरित करने के आरोपों का उल्लेख किया गया है।
माइक्रोबायोलॉजी विभाग: यहां संविदा पर कार्यरत कंप्यूटर ऑपरेटर ज्योति राव ने कर्मचारी शफात अली खान के विरुद्ध छेड़छाड़, पीछा करने और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने की शिकायत की थी। रिपोर्ट में शिकायत के बाद उनकी संविदा समाप्त किए जाने का भी उल्लेख है। इस मामले ने शिकायत करने वाली महिला कर्मचारियों की संस्थान में सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
रेडियोलॉजी विभाग: इस विभाग के रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. रिजवान पर दो महिला डॉक्टरों को कथित रूप से ब्लैकमेल करने और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने के आरोप सामने आए हैं। शिकायत करने पर परीक्षा में असफल करने और करियर खराब करने की धमकी दिए जाने की बात भी रिपोर्ट में बताई गई है। इन सभी मामलों में आरोपों की स्वतंत्र जांच और संबंधित पक्षों का जवाब सामने आना जरूरी है। UP News
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि एसटीएफ की जांच केवल कथित उत्पीड़न करने वाले डॉक्टरों और कर्मचारियों तक सीमित नहीं रही। रिपोर्ट में कुछ वरिष्ठ अधिकारियों और विभागाध्यक्षों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। पैथोलॉजी विभाग के तत्कालीन विभागाध्यक्ष प्रोफेसर सुरेश बाबू और एडिशनल प्रोफेसर डॉ. सुमायरा कयूम के संबंध में शिकायतों को दबाने, आरोपित डॉक्टर का पक्ष लेने और पीड़ित डॉक्टरों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के आरोपों का उल्लेख किया गया है। इसके अतिरिक्त डॉ. वाहिद अली और केजीएमयू के कुछ अन्य अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भूमिका को लेकर भी रिपोर्ट में सवाल उठाए जाने की खबरें प्रकाशित हुई हैं। एसटीएफ का आरोप है कि कुछ शिकायतों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं की गई और संबंधित आरोपियों को विभागीय स्तर पर संरक्षण मिलने की आशंका रही। UP News
एसटीएफ की जांच से जुड़ी मीडिया रिपोर्टों में 'इस्लामिक मेडिकोज' नामक समूह का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट में केजीएमयू और आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज से जुड़े कुछ पूर्व एवं वर्तमान मेडिकल छात्रों और डॉक्टरों के बीच संपर्कों की पड़ताल किए जाने की जानकारी सामने आई है। कुछ डॉक्टरों के कथित आपसी संपर्क, विचारधारा और बाहरी संबंधों की भी जांच का उल्लेख किया गया है। इस मामले में डॉ. नसीम खान सहित कुछ अन्य व्यक्तियों के संदर्भ भी मीडिया रिपोर्टों में सामने आए हैं। हालांकि किसी समूह का उल्लेख जांच रिपोर्ट में होना अपने आप में उसके प्रत्येक सदस्य के विरुद्ध अपराध सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है। कथित नेटवर्क, उसकी गतिविधियों और वित्तीय संबंधों की स्वतंत्र पुष्टि तथा विधिक जांच आवश्यक है। UP News
इस पूरे प्रकरण में धार्मिक आधार पर छुट्टियों में कथित भेदभाव का मुद्दा विशेष रूप से चर्चा में है। एसटीएफ रिपोर्ट के हवाले से प्रकाशित खबरों के अनुसार हिंदू रेजिडेंट डॉक्टरों को छठ पूजा के अवसर पर छुट्टी लेने में परेशानी का सामना करना पड़ता था। यहां तक कि परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु होने पर अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए छुट्टी मांगने पर भी उन्हें अपमानजनक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था। इसके विपरीत मुस्लिम डॉक्टरों और कर्मचारियों को नमाज पढ़ने और रिश्तेदारों के निकाह में शामिल होने के लिए छुट्टी आसानी से दिए जाने का आरोप है। यदि जांच में ये आरोप प्रमाणित होते हैं तो यह किसी भी सरकारी अथवा सार्वजनिक चिकित्सा संस्थान की कार्यसंस्कृति और कर्मचारियों के साथ समान व्यवहार के सिद्धांत पर गंभीर सवाल खड़े करेगा। किसी भी संस्थान में कर्मचारियों को धार्मिक पहचान के आधार पर अलग-अलग सुविधाएं देना उचित नहीं हो सकता। छुट्टी के नियम सभी कर्मचारियों पर समान रूप से लागू होने चाहिए। UP News
एसटीएफ की रिपोर्ट सामने आने के बाद अब शासन स्तर पर भी कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी मिली है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार चिकित्सा शिक्षा अनुभाग-दो के संयुक्त सचिव आनंद कुमार त्रिपाठी ने 30 अक्टूबर 2026 को केजीएमयू के कुलसचिव को पत्र भेजकर जांच रिपोर्ट में चिह्नित डॉक्टरों, शिक्षकों और कर्मचारियों के विरुद्ध नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। शासन ने केजीएमयू अधिनियम 2002 और परिनियमावली 2011 के तहत आवश्यक कार्रवाई करने तथा की गई कार्रवाई की अनुपालन रिपोर्ट शासन को उपलब्ध कराने को कहा है। इस घटनाक्रम से स्पष्ट है कि मामला अब केवल संस्थान के आंतरिक प्रशासन तक सीमित नहीं है। शासन भी एसटीएफ की संस्तुतियों के आधार पर आगे की कार्रवाई चाहता है। UP News
किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी उत्तर प्रदेश का एक प्रतिष्ठित चिकित्सा एवं शैक्षणिक संस्थान है। यहां प्रदेश के अलग-अलग जिलों से हजारों मरीज उपचार के लिए पहुंचते हैं। देशभर के विद्यार्थी यहां चिकित्सा शिक्षा और प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। ऐसे संस्थान में महिला डॉक्टरों और कर्मचारियों के उत्पीड़न, धर्म परिवर्तन के लिए दबाव, शिकायतों को दबाने और धार्मिक आधार पर कथित भेदभाव की शिकायतें सामने आना गंभीर विषय है। चिकित्सा संस्थानों में डॉक्टरों और कर्मचारियों को सुरक्षित एवं निष्पक्ष वातावरण उपलब्ध कराना प्रशासन की जिम्मेदारी है। यदि किसी कर्मचारी के खिलाफ गंभीर शिकायत मिलती है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। शिकायतकर्ता को डराने, उसका करियर प्रभावित करने अथवा शिकायत को दबाने की कोशिश के आरोप भी उतनी ही गंभीरता से जांचे जाने चाहिए। UP News
एसटीएफ की सात पेज की रिपोर्ट शासन को भेजे जाने और 30 अक्टूबर को कार्रवाई के निर्देश जारी होने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि केजीएमयू प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है। क्या जांच में चिह्नित अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई होगी? क्या महिला डॉक्टरों और कर्मचारियों की शिकायतों की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी? क्या धार्मिक आधार पर छुट्टियों में भेदभाव के आरोपों की भी विस्तृत पड़ताल होगी? और क्या संस्थान में शिकायत करने वाले कर्मचारियों को सुरक्षा तथा निष्पक्ष सुनवाई का भरोसा मिल पाएगा? इन सवालों के जवाब आने अभी बाकी हैं। फिलहाल एसटीएफ की रिपोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों में शामिल केजीएमयू की प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। अब जरूरी है कि शासन सभी आरोपों की निष्पक्ष जांच कराए, दोष सिद्ध होने पर जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कानून और नियमों के अनुसार कार्रवाई करे तथा किसी भी निर्दोष व्यक्ति के साथ अन्याय न होने दे। UP News
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