मेरठ-सहारनपुर शिक्षक MLC सीट से डॉ. कुलदीप मलिक ने नामांकन दाखिल किया। शिक्षक नेताओं की परंपरा, शिक्षा और शिक्षक हितों के मुद्दों के बीच मुकाबला हुआ रोचक।

उत्तर प्रदेश विधान परिषद के मेरठ-सहारनपुर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव इस बार केवल राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला नहीं रह गया है। शिक्षक हितों, शिक्षा व्यवस्था, शिक्षकों के सम्मान और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दे भी चुनावी बहस के केंद्र में आते दिखाई दे रहे हैं। इसी बीच शिक्षक नेता और शिक्षाविद् डॉ. कुलदीप मलिक ने शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से अपना नामांकन पत्र दाखिल कर चुनावी मैदान में अपनी दावेदारी मजबूती से पेश कर दी है। डॉ. मलिक लंबे समय से शिक्षा, पर्यावरण और सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रहे हैं। पिछले दिनों पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनके समर्थन में सर्व समाज की बैठक और समर्थन की खबर भी सामने आई थी। ऐसे में उनका निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव को और अधिक दिलचस्प बना रहा है।
डॉ. कुलदीप मलिक की राजनीतिक दावेदारी को केवल एक चुनाव लड़ने के निर्णय के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। उनके समर्थकों का कहना है कि वह उन शिक्षक नेताओं की परंपरा से प्रेरणा लेते हैं, जिन्होंने शिक्षक समुदाय की समस्याओं को केवल संगठनात्मक स्तर पर नहीं बल्कि विधान परिषद जैसे संवैधानिक मंच पर मजबूती से उठाया। शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से चुने जाने वाले प्रतिनिधि की भूमिका सामान्य राजनीतिक प्रतिनिधि से अलग होती है। उसके सामने शिक्षकों की सेवा संबंधी समस्याएं, पुरानी पेंशन, पदोन्नति, वेतन विसंगतियां, विद्यालयों की स्थिति, शिक्षा की गुणवत्ता और शिक्षक सम्मान जैसे मुद्दे प्रमुख होते हैं। इसी वजह से डॉ. मलिक का यह चुनावी अभियान शिक्षकों के बीच उनके पुराने सामाजिक और शैक्षिक सरोकारों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जोड़ने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

कुलदीप मलिक के नामांकन को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि उन्होंने शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव को केवल राजनीतिक दलों के समर्थन अथवा विरोध तक सीमित रखने के बजाय शिक्षक और शिक्षा के वास्तविक मुद्दों के इर्द-गिर्द केंद्रित करने की बात कही। उनका चुनावी अभियान इस सवाल को सामने रख रहा है कि शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से चुना जाने वाला एमएलसी आखिर किसकी आवाज बनेगा—किसी राजनीतिक दल की या शिक्षक समुदाय की? यही सवाल इस चुनाव में उनकी दावेदारी को अलग पहचान देता है।
डॉ. कुलदीप मलिक पिछले दिनों भाजपा प्रत्याशी एवं वर्तमान एमएलसी श्रीचंद शर्मा की शैक्षणिक योग्यता से जुड़े दस्तावेजों को लेकर सवाल उठाने के कारण भी चर्चा में रहे हैं। चेतना मंच ने इस मामले में प्रकाशित रिपोर्टों में बताया था कि मलिक ने श्रीचंद शर्मा की शैक्षणिक पृष्ठभूमि से जुड़े दस्तावेजों की जांच की मांग उठाई थी। इस मुद्दे ने मेरठ-सहारनपुर शिक्षक सीट के चुनाव को सामान्य चुनावी मुकाबले से आगे बढ़ाकर शैक्षणिक योग्यता, शिक्षक प्रतिनिधित्व और सार्वजनिक जवाबदेही की बहस से भी जोड़ दिया है। हालांकि किसी भी प्रत्याशी के संबंध में अंतिम निष्कर्ष अधिकृत दस्तावेजों और सक्षम संस्थाओं के निर्णय के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।

डॉ. कुलदीप मलिक के पक्ष में पिछले दिनों ग्रेटर नोएडा में सर्व समाज की एक बैठक भी आयोजित हुई थी। चेतना मंच की रिपोर्ट के अनुसार इस बैठक में विभिन्न वर्गों के लोगों ने उनके समर्थन का प्रस्ताव पारित किया था। बैठक में शिक्षा, पर्यावरण और सामाजिक क्षेत्र में उनके लंबे समय से किए जा रहे कार्यों का उल्लेख भी किया गया था। यही वजह है कि अब देखना महत्वपूर्ण होगा कि सामाजिक क्षेत्र में बनी उनकी पहचान शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं के बीच चुनावी समर्थन में कितना परिवर्तित होती है।
मेरठ-सहारनपुर शिक्षक सीट पर भाजपा ने वर्तमान एमएलसी श्रीचंद शर्मा को फिर मैदान में उतारा है, जबकि सपा की ओर से नितिन कुमार तोमर समेत अन्य प्रत्याशियों ने भी नामांकन दाखिल किया है। कुलदीप मलिक निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं। नामांकन की अंतिम तिथि 6 अक्टूबर है। इसके बाद नामांकन पत्रों की जांच होगी और चुनावी मुकाबले की वास्तविक तस्वीर और स्पष्ट होगी। मेरठ-सहारनपुर शिक्षक सीट पर 23 अक्टूबर को मतदान प्रस्तावित है।

कुलदीप मलिक के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि सामाजिक और शिक्षक हितों से जुड़े आंदोलनों में बनी उनकी पहचान को वह मतदान में बदल पाते हैं या नहीं। दूसरी ओर भाजपा के प्रत्याशी श्रीचंद शर्मा के पास संगठन की ताकत और पूर्व एमएलसी के रूप में राजनीतिक अनुभव है। सपा भी अपने प्रत्याशी के जरिए मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश करेगी। ऐसे में निर्दलीय प्रत्याशी कुलदीप मलिक की चुनौती आसान नहीं है। लेकिन शिक्षक राजनीति में अक्सर केवल राजनीतिक दल का नाम ही निर्णायक नहीं होता। प्रत्याशी की व्यक्तिगत स्वीकार्यता, शिक्षक संगठनों से संबंध, मुद्दों की समझ और मतदाताओं के बीच सक्रियता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
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कुलदीप मलिक ने नामांकन दाखिल करके अपना राजनीतिक इरादा स्पष्ट कर दिया है। अब आने वाले दिनों में उनका अभियान किस दिशा में जाता है, किन मुद्दों को प्रमुखता मिलती है और शिक्षक मतदाताओं के बीच उन्हें कितना समर्थन मिलता है—यह चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू होगा। एक बात स्पष्ट है कि मेरठ-सहारनपुर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का यह चुनाव इस बार केवल भाजपा बनाम विपक्ष की लड़ाई नहीं दिखाई दे रहा। शिक्षक हित, व्यक्तिगत छवि, सामाजिक स्वीकार्यता और शिक्षक नेतृत्व की विश्वसनीयता भी इस मुकाबले के प्रमुख आधार बनने जा रहे हैं। कुलदीप मलिक के नामांकन के साथ अब यह सवाल भी सामने है—क्या शिक्षक नेताओं की पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाने का दावा करने वाला एक निर्दलीय चेहरा राजनीतिक दलों के मजबूत संगठनात्मक ढांचे को चुनौती दे पाएगा? यही सवाल 23 अक्टूबर के मतदान तक इस चुनाव की राजनीतिक चर्चा के केंद्र में रहने वाला है।
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