RLD के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी ने उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिलें में स्थित रामपुर मनिहारान की स्वाभिमान रैली में गुर्जर समाज और किसानों के बीच RLD की ताकत दिखाई। इस दौरान जयंत चौधरी ने अपने दादा जी स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह जी की " अजगर " वाली व्यवस्था को वापस कायम करने की दिशा में काम किया ।

UP News : पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में राष्ट्रीय लोकदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी इन दिनों एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। 3 सितंबर को सहारनपुर के रामपुर मनिहारान में आयोजित ‘स्वाभिमान रैली’ ने केवल राष्ट्रीय लोकदल का शक्ति प्रदर्शन नहीं किया, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बदलते सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों की ओर भी संकेत किया है। खास बात यह रही कि गुर्जर समाज की महत्वपूर्ण राजनीतिक-सामाजिक जमीन पर आयोजित इस बड़े कार्यक्रम में जयंत चौधरी ने किसान, गन्ना, युवा, शिक्षा और सामाजिक सम्मान के मुद्दों को एक साथ जोड़ने की कोशिश की। रामपुर मनिहारान की इस रैली को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पश्चिमी यूपी की राजनीति में राष्ट्रीय लोकदल की पहचान लंबे समय से जाट और किसान राजनीति से जुड़ी रही है। लेकिन अब जयंत चौधरी जिस तरह गुर्जर, किसान और अन्य ग्रामीण समाजों के बीच अपनी राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाने में जुटे हैं, उससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या RLD अपने पारंपरिक जाट आधार से आगे निकलकर चौधरी चरण सिंह की उस व्यापक किसान राजनीति को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रही है, जिसमें अलग-अलग किसान बिरादरियां एक राजनीतिक मंच पर आती थीं। UP News
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रामपुर मनिहारान में आयोजित स्वाभिमान रैली का आयोजन अखिल भारतीय गुर्जर विद्या प्रचारिणी सभा की ओर से किया गया था। रैली के लिए गोचर कृषि इंटर कॉलेज के मैदान में बड़े स्तर पर तैयारियां की गई थीं और पार्टी कार्यकर्ताओं ने इससे पहले आसपास के गांवों में व्यापक जनसंपर्क अभियान भी चलाया था। यही वजह है कि इस आयोजन को केवल सामान्य राजनीतिक सभा के बजाय पश्चिमी यूपी में RLD के सामाजिक विस्तार की कोशिश के तौर पर देखा गया। जयंत चौधरी ने अपने भाषण में गन्ने और किसानों के मुद्दे को प्रमुखता दी। उन्होंने विपक्ष, विशेषकर समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए गन्ने के दाम को लेकर खुलकर मांग करने की चुनौती दी। उन्होंने यह भी कहा कि किसानों की आवाज को मजबूत करने के लिए उनकी ‘लॉबी’ मजबूत होनी चाहिए। यहां जयंत की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू दिखाई देता है जातीय पहचान को किसान के व्यापक मुद्दे से जोड़ना। यही वह राजनीति है, जिसके जरिए कभी चौधरी चरण सिंह ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश से निकलकर उत्तर भारत में अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाई थी। UP News
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पश्चिमी यूपी की राजनीति को समझने के लिए ‘अजगर’ शब्द बेहद महत्वपूर्ण है। AJGAR का अर्थ अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत से है। राजनीतिक इतिहास में इस सामाजिक गठजोड़ के मूल विचार को किसान नेता सर छोटूराम से जोड़ा जाता है, जबकि बाद में चौधरी चरण सिंह ने इसे अपनी किसान राजनीति में इस्तेमाल कर व्यापक राजनीतिक आधार तैयार किया। चौधरी चरण सिंह की राजनीति का मूल आधार केवल जाट राजनीति नहीं था। उनका बड़ा लक्ष्य ग्रामीण समाज और किसान समुदायों को राजनीतिक शक्ति में बदलना था। इसी व्यापक सामाजिक गठजोड़ ने उन्हें उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती देने की ताकत दी।
आज जब जयंत चौधरी गुर्जर समाज के बीच रामपुर मनिहारान जैसे महत्वपूर्ण स्थान पर बड़ी सभा करते हैं, किसान और गन्ने के सवाल को केंद्र में रखते हैं और चौधरी चरण सिंह की विरासत को बार-बार राजनीतिक विमर्श में लाते हैं, तो राजनीतिक विश्लेषक इसमें उनके दादा की राजनीति की छाया तलाश रहे हैं।
हालांकि इसे सीधे-सीधे पुराने ‘अजगर’ फॉर्मूले की वापसी कहना जल्दबाजी होगी। आज की राजनीति 1970 के दशक की राजनीति से काफी अलग है। लेकिन सामाजिक विस्तार की दिशा में जयंत की कोशिश निश्चित रूप से उस पुराने विचार की याद दिलाती है। UP News
जयंत चौधरी के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती यही रही है कि RLD की पहचान पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुख्य रूप से जाट-केंद्रित पार्टी के रूप में न रह जाए।
रामपुर मनिहारान की रैली इस लिहाज से महत्वपूर्ण है। गुर्जर समाज के बीच जाकर जयंत ने यह संकेत देने की कोशिश की कि RLD का राजनीतिक संदेश केवल जाट समाज तक सीमित नहीं है। इससे पहले भी जयंत चौधरी की राजनीति में सामाजिक समरसता और विभिन्न किसान बिरादरियों को जोड़ने की कोशिश दिखाई देती रही है। 2026 में भी पार्टी की गतिविधियों को लेकर सामने आई राजनीतिक रिपोर्टों में अलग-अलग सामाजिक समूहों को RLD से जोड़ने की रणनीति की चर्चा हुई है। यानी जयंत के सामने अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ‘जाट RLD के साथ हैं या नहीं?’ बल्कि बड़ा सवाल यह है कि ‘जाट के साथ कौन-कौन से दूसरे किसान और ग्रामीण सामाजिक समूह RLD के साथ आ सकते हैं?’ UP News
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस समय सामाजिक गठबंधनों की राजनीति फिर से केंद्र में है। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी PDA के सामाजिक समीकरण को अपनी राजनीति का महत्वपूर्ण आधार बनाए हुए हैं। जयंत चौधरी ने रामपुर मनिहारान में PDA पर तंज कसते हुए कहा कि इसकी परिभाषा बदलती रहती है, जबकि NDA का ‘N’ नहीं बदलेगा। इसके साथ ही उन्होंने अखिलेश यादव को गन्ने के दाम के मुद्दे पर खुली चुनौती दी। इस बयान को केवल तत्काल राजनीतिक हमला मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उस राजनीति की झलक भी दिखाई देती है जिसमें जयंत अपने लिए किसान + ग्रामीण समाज + क्षेत्रीय अस्मिता + NDA गठबंधन का अलग राजनीतिक स्पेस तैयार करना चाहते हैं। यही कारण है कि आने वाले समय में पश्चिमी यूपी में RLD और सपा के बीच राजनीतिक दूरी का असर भी महत्वपूर्ण हो सकता है। UP News
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में गुर्जर समाज राजनीतिक रूप से प्रभावशाली सामाजिक समूहों में शामिल है। सहारनपुर से लेकर मेरठ, मुजफ्फरनगर, शामली, गौतमबुद्ध नगर, बुलंदशहर, गाजियाबाद और आसपास के क्षेत्रों तक गुर्जर मतदाताओं की राजनीतिक भूमिका अनेक विधानसभा क्षेत्रों में महत्वपूर्ण मानी जाती है।
ऐसे में जयंत चौधरी का रामपुर मनिहारान में गुर्जर समाज के कार्यक्रम में पहुंचना केवल एक सामाजिक कार्यक्रम में भागीदारी नहीं माना जा सकता। यह एक राजनीतिक संदेश भी है RLD पश्चिमी यूपी में अपना सामाजिक आधार बड़ा करना चाहती है। यही वह बिंदु है जहां ‘अजगर’ वाली पुरानी राजनीतिक स्मृति और जयंत चौधरी की मौजूदा रणनीति एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई देती है। UP News
रामपुर मनिहारान में जयंत चौधरी ने चौधरी चरण सिंह की विरासत को किसी एक परिवार तक सीमित मानने से इनकार करते हुए किसान समाज को उनकी विरासत का हिस्सा बताया। उन्होंने पाल, यादव, गुर्जर, जाट सहित विभिन्न किसान समुदायों को इस विरासत से जोड़ने की बात कही। यही बात जयंत की मौजूदा राजनीति को समझने की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी हो सकती है। अगर RLD केवल जाट राजनीति तक सीमित रहती है तो उसका प्रभाव पश्चिमी यूपी के एक सीमित सामाजिक दायरे में रहता है। लेकिन अगर जाट के साथ गुर्जर, किसान और दूसरे ग्रामीण समुदायों में भी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ती है तो पार्टी का प्रभाव कई गुना बढ़ सकता है। जयंत इसी दिशा में कदम बढ़ाते दिखाई दे रहे हैं। UP News
रामपुर मनिहारान के भाषण में जयंत चौधरी ने गन्ने के सवाल को जिस तरह उठाया, वह भी उनकी राजनीतिक रणनीति का संकेत देता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गन्ना और चीनी उद्योग का बेहद महत्वपूर्ण स्थान है। इसलिए किसान राजनीति की बात करते हुए गन्ने का सवाल जयंत के लिए स्वाभाविक राजनीतिक हथियार है। उन्होंने विपक्ष पर तंज कसते हुए गन्ने के दाम पर खुलकर बोलने की चुनौती दी और एथेनॉल को लेकर भी विपक्ष के रुख पर सवाल उठाया। भाषण के अंत में उनका ‘G फॉर गन्ना’ वाला अंदाज भीड़ से सीधा संवाद स्थापित करने की कोशिश के रूप में देखा गया। अर्थात जयंत जातीय राजनीति को केवल जाति तक सीमित रखने के बजाय उसे किसान और आर्थिक मुद्दों से जोड़ना चाहते हैं। UP News
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 अभी सामने हैं, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दलों की गतिविधियां तेज हो चुकी हैं। सहारनपुर और आसपास के क्षेत्रों में जयंत चौधरी की सक्रियता, अखिलेश यादव की गतिविधियां और दूसरे दलों की राजनीतिक कवायद यह बताती है कि पश्चिमी यूपी आने वाले विधानसभा चुनाव में बेहद महत्वपूर्ण राजनीतिक क्षेत्र रहने वाला है। जयंत चौधरी के लिए चुनौती भी बड़ी है और अवसर भी। यदि वे जाट समाज के पारंपरिक समर्थन को बरकरार रखते हुए गुर्जर, किसान, ग्रामीण युवा और दूसरे सामाजिक समूहों में अपनी स्वीकार्यता बढ़ा पाते हैं, तो RLD पश्चिमी यूपी की राजनीति में अपने प्रभाव का दायरा बढ़ा सकती है और अगर यह विस्तार सफल होता है तो इसका असर केवल कुछ विधानसभा सीटों तक सीमित नहीं रहेगा। यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गठबंधन की राजनीति, उम्मीदवारों के चयन और चुनावी सीटों के बंटवारे तक को प्रभावित कर सकता है। UP News
जयंत चौधरी की राजनीति को देखकर यह कहना कि चौधरी चरण सिंह का पुराना ‘अजगर’ फॉर्मूला उसी रूप में वापस आ गया है, अभी राजनीतिक रूप से जल्दबाजी होगी। लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि जयंत अपने दादा की राजनीति के मूल तत्व किसान, गांव, सामाजिक सम्मान और विभिन्न किसान बिरादरियों को एक व्यापक राजनीतिक मंच पर लाने को नए दौर के हिसाब से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। रामपुर मनिहारान की तस्वीर इसी बदलाव का संकेत देती है। एक तरफ मंच पर गुर्जर समाज का बड़ा जमावड़ा, दूसरी तरफ जयंत चौधरी का किसान और गन्ने का मुद्दा, और तीसरी तरफ अखिलेश यादव के PDA के खिलाफ NDA के साथ अपनी राजनीतिक स्थिति स्पष्ट करना इन तीनों को जोड़कर देखें तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जयंत चौधरी की नई राजनीतिक लाइन साफ दिखाई देती है। यही वजह है कि पश्चिमी यूपी की राजनीति में अब सवाल केवल यह नहीं है कि जयंत चौधरी कितनी सीटें जीतेंगे। बड़ा सवाल यह है कि क्या वह चौधरी चरण सिंह की तरह अपनी राजनीति को एक जाति से निकालकर व्यापक किसान-सामाजिक गठबंधन में बदल पाएंगे? रामपुर मनिहारान की ‘स्वाभिमान रैली’ ने कम से कम इतना संकेत जरूर दे दिया है कि जयंत चौधरी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन को नए सिरे से मजबूत करने के अभियान में पूरी ताकत से उतर चुके हैं और यदि यह अभियान सफल हुआ, तो 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी की सियासी तस्वीर में ‘जयंत फैक्टर’ पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण दिखाई दे सकता है। UP News
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