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उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों को लेकर कानूनी और प्रशासनिक असमंजस गहराता जा रहा है। ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त होने के बाद राज्य सरकार ने अस्थायी व्यवस्था के तहत प्रशासक नियुक्त करने का निर्णय लिया था।

UP News : उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों को लेकर कानूनी और प्रशासनिक असमंजस गहराता जा रहा है। ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त होने के बाद राज्य सरकार ने अस्थायी व्यवस्था के तहत प्रशासक नियुक्त करने का निर्णय लिया था। लेकिन इस फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चुनौती देते हुए स्पष्ट किया है कि कार्यकाल समाप्त होने के बाद निर्वाचित ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में बनाए रखना संवैधानिक रूप से उचित नहीं है। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब राज्य सरकार ने इसे चुनौती देने की तैयारी शुरू कर दी है। संभावना है कि अगले सप्ताह सरकार इस आदेश के खिलाफ अपील दाखिल करेगी। UP News
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इलाहाबाद हाईकोर्ट की एकल पीठ, न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह 13 जुलाई तक पंचायत चुनावों की विस्तृत रूपरेखा अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे।
25 जून के आदेश में अदालत ने कहा कि संवैधानिक प्रावधानों के तहत पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल किसी भी स्थिति में पांच वर्ष से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 243(E) और 243(K) का हवाला देते हुए इस स्थिति को स्पष्ट किया। UP News
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सरकारी सूत्रों के अनुसार, उत्तर प्रदेश पंचायतीराज अधिनियम 1947 की धारा 12(3-ए) के तहत विशेष परिस्थितियों में, जब समय पर चुनाव संभव न हों, तब प्रशासक या प्रशासनिक समिति की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है। यह संशोधन वर्ष 1994 में लागू हुआ था और इसका उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया में देरी की स्थिति में प्रशासनिक व्यवस्था को सुचारू बनाए रखना था। हालांकि, पूर्व में प्रेम लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में अदालत यह स्पष्ट कर चुकी है कि इस प्रावधान का इस्तेमाल चुनावों को अनिश्चितकाल तक टालने या निर्वाचित प्रतिनिधियों के कार्यकाल को बढ़ाने के लिए नहीं किया जा सकता। इसी व्याख्या के चलते मौजूदा विवाद और गहरा गया है, जिससे सरकार और न्यायपालिका के बीच कानूनी स्थिति जटिल हो गई है। उत्तर प्रदेश में पंचायत प्रशासन को लेकर स्थिति अब स्पष्ट लेकिन संवेदनशील बनी हुई है। ग्राम प्रधानों का निर्धारित कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो चुका है, जिसके बाद राज्य सरकार ने व्यवस्था बनाए रखने के लिए अधिकतम छह महीने की अवधि तक प्रशासकों की नियुक्ति की है। ये प्रशासक केवल दैनिक प्रशासनिक कार्यों तक सीमित रहेंगे और किसी भी बड़े या नीतिगत फैसले के लिए जिला मजिस्ट्रेट की अनुमति लेना अनिवार्य होगा। इस अस्थायी व्यवस्था के बीच पंचायत चुनावों की समय-सीमा और भविष्य की राजनीतिक दिशा को लेकर चर्चाएं और तेज हो गई हैं। UP News
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