पीलीभीत की सदर विधानसभा क्षेत्र में 10,470 मतदाताओं के नामों में कथित गड़बड़ी के मामले में दो SDM निलंबित हैं। पांच AERO की भूमिका की जांच और फार्म-8 से सुधार की प्रक्रिया पर नजर है।

UP News : उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले की सदर विधानसभा क्षेत्र में मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी का मामला लगातार तूल पकड़ रहा है। अमरिया तहसील के 150 मतदान केंद्रों पर 10,470 मतदाताओं के नामों में बदलाव किए जाने के आरोपों के बाद प्रशासनिक कार्रवाई शुरू हो गई है। मामले में तत्कालीन निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) और एसडीएम रहे मयंक गोस्वामी तथा हेमंत कुमार चौधरी को निलंबित किया जा चुका है। अब जांच की आंच अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। इस मामले में पांच सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (AERO) की भूमिका भी जांच के दायरे में बताई जा रही है। हालांकि, दो एसडीएम के निलंबन के बाद भी कई सवाल अनुत्तरित हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि मतदाता सूची में इतने बड़े पैमाने पर बदलाव किस प्रक्रिया के तहत किए गए और इसके पीछे किसी अन्य व्यक्ति या समूह की भूमिका थी या नहीं?
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अमरिया तहसील के 150 पोलिंग बूथों से जुड़े 10,470 मतदाताओं के नामों में कथित बदलाव का मामला सामने आने के बाद प्रशासन ने तत्कालीन एसडीएम स्तर के दो अधिकारियों पर कार्रवाई की है। मयंक गोस्वामी और हेमंत कुमार चौधरी को निलंबित किया जा चुका है। इसके साथ ही पांच AERO की भूमिका को लेकर भी जांच की जा रही है। माना जा रहा है कि जांच में यदि अन्य अधिकारियों या कर्मचारियों की जिम्मेदारी सामने आती है तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई हो सकती है। हालांकि, अभी जांच के अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आए हैं।
मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी का मामला राजनीतिक रूप भी ले चुका है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं ने आरोप लगाया है कि इस पूरे प्रकरण में केवल सरकारी अधिकारियों की भूमिका नहीं थी, बल्कि दो बाहरी लोगों का भी कथित हस्तक्षेप हो सकता है। विपक्षी नेताओं के बयानों में एक जनप्रतिनिधि के करीबी और एक रिश्तेदार का जिक्र किया गया है। आरोप है कि इन लोगों की पहुंच एक प्रभावशाली व्यक्ति के आवास तक थी। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और न ही किसी व्यक्ति की भूमिका आधिकारिक तौर पर साबित हुई है।
इस पूरे प्रकरण में सबसे अहम सवाल यह है कि मतदाता सूची में कथित बदलाव से किसे राजनीतिक या चुनावी फायदा पहुंच सकता था। क्या यह प्रशासनिक स्तर पर हुई लापरवाही थी या इसके पीछे किसी तरह की सुनियोजित साजिश थी? इन सवालों का जवाब जांच पूरी होने के बाद ही सामने आ सकेगा। फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह स्पष्ट नहीं है कि नामों में बदलाव किसके निर्देश पर किए गए और इससे किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल को लाभ पहुंचाने की कोशिश हुई थी या नहीं। इस संबंध में पुलिस और प्रशासन की ओर से जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाने का इंतजार है।
प्रशासन का तत्काल ध्यान मतदाता सूची में प्रभावित बताए जा रहे 10,470 नामों को सही कराने पर है। इसके लिए निर्वाचन आयोग की निर्धारित प्रक्रिया के तहत फार्म-8 के माध्यम से नाम और अन्य विवरणों में संशोधन कराया जाएगा। निर्वाचन से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों को इस प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित करने को कहा गया है। अब निगाहें जांच की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच में केवल निलंबित अधिकारियों की जिम्मेदारी सामने आती है या कथित गड़बड़ी से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका भी उजागर होती है।
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