Thursday, 18 April 2024

Religious News: सीता की उत्पत्ति – मिथक से सत्य की ओर !

डा०डी के गर्ग प्रचलित कथाएं: सीता जी के जन्म को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं इन्हीं में से एक कथा…

Religious News: सीता की उत्पत्ति – मिथक से सत्य की ओर !

डा०डी के गर्ग

प्रचलित कथाएं:

सीता जी के जन्म को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं इन्हीं में से एक कथा हम आपको बता रहे हैं। एक बार राजा जनक धरती जोत रहे थे| तब राजा जनक को धरती में से सोने की डलिया में मिट्टी में लिपटी हुई सुंदर कन्या मिली| राजा जनक की कोई संतान नहीं थी| इसलिए उस कन्या को हाथों में लेकर उन्हें पिता प्रेम की अनुभूति हुई| राजा जनक ने उस कन्या को सीता नाम दिया और उसे अपनी पुत्री के रूप में अपना लिया|

सत्यता की परख :

जनक के हल जोतने पर भूमि के अन्दर फाल का टकराना तथा उससे एक कन्या का पैदा होना और फिर उसी का नाम सीता रखना आदि असंभव होने से प्रक्षिप्त है ।

इसके कई कारण है –

१ राजा का कार्य प्रजा के सुख दुःख को देखना, राज्य की नीति बनाना ,सीमाओं की रक्षा करना , आसपास के राज्यों में मधुर सम्बन्ध बनाना ,सलाहकार समिति से समय समय पर वार्ता करना आदि। राजा के पास उसकी सेवा श्रुषा और प्रत्येक कार्य के लिए सेवक होते है। ये विस्वास नहीं होता की राजा जनक खेत में हल चलकर जुताई कर रहे होंगे ।
२ ईश्वर ने प्रारम्भ में अमैथुनी सृष्टि की रचना की ,ये बात वेद सम्मत है परन्तु सृष्टि के प्रारम्भ के के बाद इस बात पर विश्वास करना ,ऐसी कल्पना करना भी पूरी तरह से अवैज्ञानिक और तर्क सम्मत नहीं है ।
३ रामायण के प्रमाणिक लेखक महर्षि बाल्मीकि की रामायण में ऐसा कोई उल्लेख नहीं मिलता।
४ अन्य ग्रंथो में भी इस बात के प्रमाण नहीं मिलते की सीता का जन्म एक घड़े हुआ जो अचानक जुताई के दौरान राजा जनक को प्राप्त हुआ।
इस विषय में अब निष्पक्ष विश्लेषण करते है।

१.पहला विचार ये की इस कथा में अलंकार का प्रयोग हुआ है। हिंदी में एक -एक शब्द के कई कई अर्थ निकलते है। और कोई भी नाम वैसे ही नहीं रख दिया जाता। इस विषय में प्रसिध्द पौराणिक विद्वान स्वामी करपात्री जी ने स्वरचित ”रामायण मीमांसा’ ( पृ ० ८९ ) में लिखा है – “पुराणकार किसी व्यक्ति का नाम समझाने के लिए कथा गढ़ लेते है। जनक पुत्री सीता के नाम को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने वैदिक सीता ( = हलकृष्ट भूमि) से सम्बन्ध जोड़कर उसका जन्म ही भूमि से हुआ। जैसे किसी बेटी का नाम उसके माता पिता भूमिका रखे दे, सूर्य देवी रख दे ,ऐसी तरह राजा जनक ने अपनी पुती का नाम सीता रख दिया। सीता शब्द के कई अर्थ होते है जिसमे एक अर्थ है – संज्ञा स्त्रीलिंग [संस्कृत]

1. वह रेखा जो जमीन जोतते समय हल की फाल के धँसने से पड़ती जाती है

वह भूमि जिसपर राजा की खेती होती हो । राजा की निज की भूमि
सीता शब्द से ऐसी अर्थ को लेकर अनर्थ करके कहानी गढ़ दी गयी ।

2 दूसरा विचार यह हो सकता है कि किसी ने कारणवश यह कन्या खेत में फेक दी हो और संयोगवश वह जनक को मिल गई हो अथवा किसी ने ‘खेत में पडी लावारिस कन्या मिली है’ यह कहकर जनक को सौप दी हो फिर उन्होंने उसे पाल लिया हो । महर्षि कण्व को शकुन्तला इसी प्रकार मिली थी। और प्राप्ति के समय पक्षियों द्वारा संरक्षित एवं पालित (न कि प्रसूत) होने से उसका नाम शकुन्तला रख दिया था ।

3. तीसरा विचार जो ज्यादा उचित और तर्क संगत प्रतीत होता है – इसको समझने के लिए इस कथा को ध्यान से धीरे धीरे पढ़े। —
राजा जनक को हल चलते हुए कुम्भ से एक कन्या प्राप्त हुई ।

यहाँ अलंकार की भाषा का प्रयोग देखिये -हल का अर्थ है समाधान करना , जैसे प्रश्न पत्र हल करते है। समस्या का हल किया जाता है।
कुम्भ का अर्थ है घड़ा। जब बच्चा माता के गर्भ में होता है तो पेट कुम्भ की भाटी हो जाता है ,और भारत के कई स्थानो पर बच्चे को कुम्भ से प्राप्ति भी कहते है।
देखो लेखक ने किस तरह एक घटना को लिखा –जब राजा जनक अपने निजी भवन में सभासदो को समस्याओं का हल सुझा रहे थे तभी अचानक उनकी पत्नी को प्रसव हुआ और पुत्री ने जन्म लिया। और राजा ने इस पुत्री का नाम सीता रख दिया।

4 बाल्मीकि रामायण में सीता को राजा जनक की आत्मजा कहा है-: सीता की उत्पति पृथिवी से कैसे मानी जा सकती है, जबकि बाल्मीकि रामायण में अनेक स्थलों में उसे जनक की आत्मजा एवं औरस पुत्री तथा उर्मिला की सहोदरा कहा गया है –

वर्धमानां ममात्मजाम् (बाल० ६६|१५) ;
जानकात्मजे (युद्ध० ११५|१८) ;
जनकात्मजा (रघुवंश १३|७८)
महाभारत में लिखा है –
विदेहराजो जनक: सीता तस्यात्मजा विभो
(३|२७४|९)
अमरकोश (२|६|२७) में ‘आत्मज’ शब्द का अर्थ इम प्रकार लिखा है –

आत्मनो देहाज्जातः = आत्मजः अर्थात जो अपने शरीर से पैदा हो, वह आत्मज कहाता है। आत्मा क्षेत्र (स्त्री) का पर्यायवाची है ; क्षेत्र और शरीर पर्यायवाची है।
`क्षीयते अनेन क्षेत्रम` स्त्री को क्षेत्र इसलिए कहते हैं की वह संतान को जनने से क्षीण हो जाती है। पुरुष बीजरूप होने से क्षीण नहीं होता ।
रघुवंश सर्ग ५, श्लोक ३६ में लिखा है –
ब्राह्मे मुहूर्ते किल तस्य देबी कुमारकल्पं सुषुवे कुमारम् ।
अत: पिता ब्रह्मण एव नाम्ना तमात्मजन्मानमजं चकार ।।

5 महामना पं० मदनमोहन मालवीय की प्रेरणा से संवत २००० में विक्रमद्विसहस्राब्दी के अवसर पर संस्थापित अखिल भारतीय विक्रम परिषद द्वारा नियुक्त कालिदास ग्रंथावली के संपादक मण्डल के प्रमुख साहित्याचार्य पं ० सीताराम चतुर्वेदी ने उक्त श्लोक में आये “आत्मजन्मान्म” का अर्थ रघु की रानी की कोख से जन्मा किया हैं । तव जनक की ‘आत्मजा’ का अर्थ पृथिवी से उत्पन्न कैसे हो सकता है ? ब्रह्म मुहुर्त में जन्य लेने के कारण रघु ने अपने पुत्र का नाम अज(अज ब्रह्मा का पर्यायवाची है, क्योंकि ब्रह्मा का भी जन्म नहीं होता) रखा। अज का अर्थ जन्म न लेने वाला होता है। कोई मूर्ख ही कह सकता है कि अज का यह नाम इसलिए रखा गया था, क्योंकि वह पैदा नहीं हुआ था। आत्मज या आत्मजा उसी को कह सकते हैं जो स्त्री – पुरुष के रज-वीर्य से स्त्री के गर्म से उत्पन्न हो
5 धरती को फोड़कर निकलने बालों की “उद्भिज्ज” संज्ञा है। तृण, औषधि, तरु, लता आदि उद्भिज्ज कहलाते हैं । मनुष्य, पश्वादि, जरायुज, अण्डज और स्वेदज प्राणियों के अन्तर्गत है । मनुष्य वर्ग में होने के कारण सीता की उत्पत्ति पृथिवी से होना प्रकृति विरुध्द होने से असंभव है।

6 पाणिग्रहण संस्कार के समय जिस प्रकार रामचन्द्र जी की पीढियों का वर्णन किया गया था उसी प्रकार सीता की भी २२ पीढियों का वर्णन किया गया। यदि सीता की उत्पत्ति पृथिवी ये हुई होती तो पृथ्वी से पहले की पीढ़िया कैसे बनती ? इसे शाखोच्चार कहते है । राजस्थान में विवाह के अवसर पर दोनो पक्षों के पुरोहित आज भी २२ के ही नहीं, ३०-४० पीढ़ियों तक के नामो का उल्लेख करते हैं । साधारणतया सौ वर्ष में चार पुरुष समझे जा सकते हैं। इस प्रकार ४० पीढियों में लगभग एक हजार वर्ष बनते है। अर्थात् सर्वसाधारण लोग भी मुहांमुही सैकडों वर्षो के पारिवारिक इतिहास का ज्ञान रख सकते थे। जिसका २२ पीढ़ियों का क्रमिक इतिहास ज्ञात है उसे कीड़े-मकौडों या पेड़-पौधों की तरह पृथिवी से उत्पन्न हुआ नहीं माना जा सकता। वस्तुतस्तु सीता के पृथिवी से उत्पन्न होने
सम्बन्धी गप्प का स्रोत विष्णु पुराण, अंश ४, अध्याय ४, वाक्य २७-२८ है जिसका वाल्मीकि रामायण में प्रक्षेप कर दिया गया है। जन्म को पृथ्वी से मानकर सीता का अंत भी पृथ्वी में समाने की कल्पना करके ही किया गया है ।

7.अमैथुनी सृष्टि : सीता को अनेक स्थलों में `अयोनिजा’ कहा गया है । पृथिवी से उत्पन्न होने का अर्थ माता-पिता के बिना अर्थात स्त्री-पुरुष के संयोग के बिना उत्पन्न होना है। इसी को अयोनिज सृष्टि कहते है, क्योंकि इसमें गर्भाशय से बाहर निकलने में योनि नामक मार्ग का प्रयोग नहीं होता । सृष्टि के आदि काल में समस्त सृष्टि अमैथुनी होती हैं –
यहाँ यह तथ्य जरूर जोड़ा जाता है की सृष्टि चाहे मैथुनी हो अथवा अमैथुनी – प्राणियों के शरीरो की रचना परमेश्वर सदा माता पिता के संयोग से ही करता है। पर दोनों में अंतर केवल इतना है की आदि सृष्टि में माता (जननी) पृथ्वी होती है और वीर्य संस्थापक सूर्य (ऋग्वेद १|१६४|३) में कहा है –

“द्यौर्मे पिता जनिता माता पृथ्वी महीयम”

अर्थात सृष्टि के आदि काल में प्राणियों के शरीरो का उत्पादक पिता रूप में सूर्य था और माता रूप में यह पृथ्वी। परमात्मा ने सूर्य और पृथ्वी – दोनों के रज वीर्य के संमिश्रण से प्राणियों के शरीरो को बनाया। जैसे इस समय बालक माता के गर्भ में जरायु में पड़ा माता के शरीर में रस लेकर बनता और विकसित होता है, वैसे ही आदि सृष्टि में पृथ्वी रुपी माता के गर्भ में बनता रहता है। इसी शरीर को साँचा रुपी शरीर भी कहा जाता है जिससे हमारे जैसे मैथुनी मनुष्य उत्पन्न होते रहते हैं।
सीता का जन्म सृष्टिक्रम चालु होने और साँचे तैयार होने के बाद त्रेता युग में हुआ था, अतः सीता के अयोनिजा होने का प्रश्न ही नहीं उठता। जनक उनके पिता थे और रामचरितमानस के अनुसार सुनयना उनकी माता का नाम था।
मेरी सभी बंधुओ से विनती है, कृपया लोकरीति, मिथक, दंतकथाओं आदि पर आंखमूंदकर विश्वास करने से अच्छा है खुद अपनी धार्मिक पुस्तको और सत्य इतिहास को पढ़ कर गपोड़ कथाओ से दूर रहे। ताकि कोई विधर्मी हमारे सत्य इतिहास और महापुरषो महा विदुषियों पर दोषारोपण न कर सके।

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