सुप्रीम कोर्ट ने CJP प्रदर्शन मामले में गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस समेत संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा। दिल्ली मेट्रो के 45 स्टेशनों पर पाबंदी, इंटरनेट सेवाओं, बैरिकेडिंग और नागरिकों की आवाजाही को लेकर अदालत के निर्देशों से जुड़ी पूरी खबर पढ़ें।

Delhi News : दिल्ली में सीजेपी (CJP) प्रदर्शन को लेकर उठे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने 11 अक्टूबर 2026 को विशेष सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और संबंधित प्रशासनिक एजेंसियों से जवाब मांगा है। प्रदर्शन के दौरान मेट्रो स्टेशनों पर पाबंदियां, रेलवे सेवाओं, लोगों की आवाजाही, इंटरनेट की उपलब्धता और हिरासत में लिए गए लोगों से जुड़े सवाल अदालत के सामने उठे। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर सार्वजनिक परिवहन और नागरिकों की आवाजाही पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध कानून के दायरे में होने चाहिए। जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने संबंधित अधिकारियों से हलफनामा दाखिल कर यह बताने को कहा कि 9 अक्टूबर के आदेश के उल्लंघन को लेकर उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों शुरू नहीं की जानी चाहिए ? अदालत ने मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रखने, बैरिकेडिंग की समीक्षा करने, इंटरनेट सेवाओं को कानून के अनुरूप चालू रखने और गैरकानूनी हिरासत से बचने सहित कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें एक ओर सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की प्रशासनिक जिम्मेदारी है, तो दूसरी ओर आम नागरिकों की स्वतंत्र आवाजाही, शांतिपूर्ण सभा और न्याय तक पहुंच जैसे संवैधानिक अधिकारों का सवाल भी जुड़ा हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली में मेट्रो और रेल सुविधाएं सामान्य रूप से संचालित होनी चाहिए। सार्वजनिक व्यवस्था में व्यवधान की आशंका होने पर कानून के अनुसार आवश्यक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, लेकिन परिवहन सेवाओं पर व्यापक रोक लगाने के औचित्य पर विचार करना होगा। प्रदर्शन के मद्देनजर मेट्रो स्टेशनों पर लगाई गई पाबंदियों को लेकर अदालत में सवाल उठे। सुनवाई के दौरान बताया गया कि दिल्ली मेट्रो के कुल 303 स्टेशनों में से 45 स्टेशनों पर प्रवेश और निकास सीमित किया गया था। अदालत ने संबंधित अधिकारियों से यह स्पष्ट करने को कहा कि किन स्टेशनों पर प्रतिबंध लगाया गया और किन्हें खुला रखा गया। यह मुद्दा इसलिए भी अहम है, क्योंकि मेट्रो और रेल सेवाओं पर प्रतिबंध का असर केवल प्रदर्शनकारियों पर नहीं, बल्कि नौकरीपेशा लोगों, विद्यार्थियों, मरीजों, कारोबारियों और रोजाना यात्रा करने वाले लाखों लोगों पर पड़ सकता है।
अदालत ने शहर में लोगों की आवाजाही सुचारू बनाए रखने और बैरिकेड लगाने की आवश्यकता की तत्काल समीक्षा करने को कहा। पीठ ने स्पष्ट किया कि यातायात नियमों और कानून-व्यवस्था की आवश्यकताओं के अधीन लोगों को स्वतंत्र रूप से आने-जाने की सुविधा मिलनी चाहिए। दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था के तहत लगाए गए बैरिकेड यदि जरूरत से अधिक रास्तों को बाधित करते हैं, तो उनका आम नागरिकों पर पड़ने वाला प्रभाव भी देखा जाना चाहिए। अदालत के निर्देश का उद्देश्य सुरक्षा व्यवस्था और नागरिकों की सामान्य आवाजाही के बीच कानूनसम्मत संतुलन बनाए रखना है।
सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट सेवाएं चालू रखने का निर्देश दिया। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून के तहत आवश्यक कार्रवाई करने की प्रशासनिक शक्तियां समाप्त नहीं होतीं। आज इंटरनेट केवल मनोरंजन या सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है। बैंकिंग, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन पढ़ाई, कारोबार, समाचारों के प्रसार और आपातकालीन संचार जैसी अनेक गतिविधियां इस पर निर्भर करती हैं। ऐसे में इंटरनेट पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध कानून और परिस्थितियों के अनुरूप होना चाहिए। अदालत का रुख यह स्पष्ट करता है कि सार्वजनिक व्यवस्था की चिंता के बावजूद प्रतिबंधों के लिए कानूनी आधार और उचित प्रक्रिया महत्वपूर्ण हैं।
सुनवाई के दौरान प्रदर्शनकारियों और अन्य लोगों को हिरासत में लिए जाने के आरोप भी उठाए गए। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के बिना हिरासत में नहीं लिया जा सकता। विशेष रूप से उन क्षेत्रों में शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों की सभा के संबंध में कानूनी प्रावधानों का पालन जरूरी है, जहां भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत प्रतिबंध लागू नहीं हैं। यह निर्देश नागरिक स्वतंत्रता और पुलिस की शक्तियों से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न को सामने लाता है। पुलिस की जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, लेकिन हिरासत और प्रतिबंधों की कार्रवाई भी कानून के अनुरूप होनी चाहिए। गौरतलब है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार भी कानून के अधीन है। प्रदर्शनकारियों को निर्धारित नियमों का पालन करना होता है और प्रशासन को भी अपनी कार्रवाई के लिए वैधानिक आधार सुनिश्चित करना होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों तक नागरिकों और वकीलों की पहुंच बाधित नहीं होने देने पर भी जोर दिया। शीर्ष अदालत के परिसर के आसपास BNSS की धारा 163 लागू होने का उल्लेख करने वाला बोर्ड हटाने का निर्देश भी दिया गया, यदि वह अब तक लगा हुआ हो। सुनवाई में वकीलों, पत्रकारों और अन्य पेशेवरों के कामकाज में बाधा आने की शिकायतें भी उठाई गईं। अदालत ने आश्वासन और संबंधित परिस्थितियों पर विचार करते हुए कहा कि इन लोगों को अपने पेशेवर दायित्वों के निर्वहन में बाधित नहीं किया जाना चाहिए। न्यायालय तक पहुंच केवल एक प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि न्याय पाने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए सुरक्षा व्यवस्था बनाते समय इस पहलू का ध्यान रखना आवश्यक है। Delhi News
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सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि 9 अक्टूबर को दिए गए पूर्व निर्देशों के बावजूद 10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान मेट्रो सेवाओं, आवाजाही और हिरासत से संबंधित परिस्थितियों ने गंभीर सवाल खड़े किए। पीठ ने संबंधित अधिकारियों से हलफनामा और अनुपालन रिपोर्ट मांगी है। अदालत ने पूछा है कि कथित उल्लंघन के मामले में अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए। यहां यह समझना जरूरी है कि कारण बताओ नोटिस जारी होना किसी अधिकारी को दोषी ठहरा देने के समान नहीं है। संबंधित अधिकारियों का पक्ष सुनने और उपलब्ध तथ्यों की जांच के बाद ही अदालत आगे की कार्रवाई पर निर्णय लेगी। Delhi News
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सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से बताया गया कि दिल्ली मेट्रो के 303 स्टेशनों में से 45 पर प्रवेश और निकास सीमित किया गया था। सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि शेष नेटवर्क पर सेवाएं चल रही थीं। इस पर अदालत ने स्टेशनों की स्थिति का विस्तृत विवरण और नक्शा मांगा, ताकि यह समझा जा सके कि प्रतिबंधों से यात्रियों की आवाजाही और पूरे नेटवर्क की कनेक्टिविटी पर क्या प्रभाव पड़ा। इस मामले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसी सेवा का तकनीकी रूप से चालू होना और यात्रियों के लिए उसका व्यावहारिक रूप से सुलभ होना दो अलग-अलग बातें हो सकती हैं। अदालत इसी तरह के तथ्यों को स्पष्ट करना चाहती है। Delhi News
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दिल्ली में सीजेपी प्रदर्शन से जुड़ा यह मामला सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन की चर्चा को केंद्र में लाता है। भारतीय संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा से संबंधित अधिकार प्रदान करता है, लेकिन इन अधिकारों पर कानून के तहत कुछ उचित प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं। संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर निर्धारित आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने परिवहन सेवाओं के संचालन के संदर्भ में भी सार्वजनिक व्यवस्था और संवैधानिक प्रावधानों को ध्यान में रखने की बात कही। इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी भी परिस्थिति में प्रतिबंध नहीं लगाए जा सकते। बल्कि प्रतिबंधों का आधार, उनका दायरा, उनकी आवश्यकता और नागरिकों पर उनका प्रभाव कानून के अनुरूप होना चाहिए। Delhi News
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सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को अपना पक्ष रखने और अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर 2026 को सूचीबद्ध होने की जानकारी सामने आई है। आगे की सुनवाई में अदालत के सामने यह स्पष्ट करने का सवाल होगा कि पहले दिए गए निर्देशों का किस सीमा तक पालन हुआ, मेट्रो स्टेशनों पर प्रतिबंध लगाने की परिस्थितियां क्या थीं और हिरासत तथा आवाजाही से जुड़े आरोपों पर संबंधित अधिकारियों का क्या जवाब है। अधिकारियों के जवाब और अदालत की आगे की टिप्पणियों से यह तय करने में मदद मिलेगी कि मामले में आगे किस प्रकार की न्यायिक कार्रवाई आवश्यक है। Delhi News
इस पूरे घटनाक्रम का महत्व किसी एक राजनीतिक संगठन या प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। इसका संबंध उन नागरिकों से भी है, जो रोजाना सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करते हैं, इंटरनेट पर निर्भर रहते हैं, अपने काम के लिए शहर में आवागमन करते हैं या न्यायालयों तक पहुंचना चाहते हैं। कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है। साथ ही, सुरक्षा के नाम पर उठाए गए कदमों से आम लोगों को होने वाली असुविधा और उनके अधिकारों पर पड़ने वाले प्रभाव की समीक्षा भी जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों से यही संदेश निकलता है कि सार्वजनिक सुरक्षा और नागरिक अधिकारों से जुड़े मामलों में प्रशासनिक निर्णय कानून के दायरे में होने चाहिए और उनके औचित्य पर न्यायिक समीक्षा संभव है। Delhi News
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